Saturday, August 13, 2011

बहुत खास है ये डोर...


रक्षाबन्‍ध्‍ान, एक डोर जो भाई-बहन के पवि‍त्र रि‍श्‍ते के और मजबूत बनाती है....।
आज के दि‍न घर से दूर होना अखर रहा है। पि‍छले एक हफ्ते से छोटा भाई लगातार फोन करके मेरा स्‍टेटस पता करता रहा कि‍ मैं आ रही हूं या नहीं; बहुत छोटा है मुझसे, सो उसे ये नहीं समझा सकती क्‍यों नहीं आ पा रही हूं....।
पता है मुझे, उसने मेरे बगैर रहने की आदत डाल ली है लेकि‍न फि‍र भी उस एक वक्‍त वो रोएगा जरूर...। मोहल्‍ले की कि‍सी और लड़की से राखी भी नहीं बंधवाएगा...और फि‍र मुझे फोन करके आंसू बहाएगा...लेकि‍न वो जानता है कि‍ वो मेरे लि‍ए कि‍तना खास है तो कुछ वादे लेकर चुप हो जाएगा..और भूल जाएगा की उसकी दीदी उसके पास नहीं है। फि‍र खुद ही मेरी भेजी राखी अपनी नन्‍हीं सी कलाई पर बांधकर मुझे बताएगा...। गि‍फ्ट मांगने पर कैडबरी खरीदने का वादा करके खेलने भाग जाएगा....। लेकि‍न मुझे ये एहसास दे जाएगा कि‍ मैं उसके लि‍ए कि‍तनी जरूरी हूं और वो मेरे लि‍ए कि‍तना खास...। जि‍न्‍दगी में यही कुछएक पल ऐसे होते हैं जब आपको आपका होना सार्थक लगता है। सहेजि‍ए इन पलों को, इस रि‍श्‍ते को क्‍योंकि‍ हर रि‍श्‍ते से खास है ये.... राखी की बहुत-बहुत बधाई।
कुछ रचनाएं ऐसी होती हैं जि‍न्‍हें पढ़कर एक जुड़ाव महसूस होता है। भाई-बहन के प्‍यारे से बन्‍धन पर राजेश जोशी की ये कवि‍ता मुझे बहुत पसंद है, भाई-बहन के रि‍श्‍ते का हर रंग है इस कवि‍ता में-
बचपन में जब बहन
अपने ससुराल जाने लगती
तो मैं बाहर जाने वाली सीढ़ि‍यों पर बैठकर बहुत रोता
मैं उसका बक्‍सा पकड़कर लूम जाता और मचलने लगता
मुझे समझाना जब बहुत मुश्‍कि‍ल हो जाता
और डांट का भी मुझ पर कोई असर नहीं होता
तो लालच दि‍या जाता और मैं अक्‍सर उसमें फंस जाता
दो पैसे की पि‍परमेंट की गोलि‍यों के लालच में
मैं नुक्‍कड़ की दुकान तक भाग जाता
और इसी बीच बहन चुपके से तांगे में बैठकर चली जाती
शादी से पहले वो ही मुझे स्‍कूल के लि‍ए तैयार करती
हर दि‍न वह अलग अलग ढ़ंग से मेरे बाल ओंछती
मां ये काम कभी न कर पाती
वो रहती थी तो मुझे पहाड़े लि‍खने में मदद करती
कभी कभी तो वो खुद ही मेरे पहाड़े लि‍ख दि‍या करती
13 के पहाड़े पढ़कर मेरी गाड़ी हमेशा अटक जाती
और उसके बाद के तो ज्‍यादातर पहाड़े कठि‍न होते
गणि‍त वाले महेश माट साहब से मुझे बहुत डर लगता था
वो उंगलि‍यों में पैसिंल फंसाकर
जब उन्‍हें दबाते
तो मेरी चीख नि‍कल जाती
मैं बहुत देर तक अपनी उंगलि‍यां सहलाता रहता
और बहन के चले जने पर तब मुझे और ज्‍यादा गुस्‍सा आता
मैं कभी समझ नहीं पाता था कि
जब सारे लोग घर में रहते हैं
तो एक बहन ही बार बार क्‍यों चली जाती है।
मेरे जन्‍म के बारे में एक कि‍स्‍सा अक्‍स्‍ार सुनाया जाता
जब मैं पैदा हुआ तो चि‍ल्‍ला चि‍ल्‍लाकर
वो ही सारे मुहल्‍ले को बता आयी थी
कि‍ भइया हुआ है
कि‍ उसी ने मेरे पैदा होने पर थाली बजायी थी
वो रहती थी तो लगता था कि‍ मैं सुरक्षि‍त हूं
कि‍सी भी बात पर डांट या मार पड़ने पर
वह कहीं न कहीं से प्रकट हो जाती
और मुझे पकड़कर ले जाती
शुरू में ससुराल जाने से कुछ देर पहले ही
उसका रोना शुरू हो जाता
देहरी पर वो मां के गले लगकर
बहुत जोर से रोती
मां को समझाने वाली स्‍त्रि‍यां बर बार यही कहती
बेटि‍यों को तो जाना ही होता है कि‍ वे पराया धन है
मैं इन वाक्‍यों के बार बार हि‍स्‍से करने की कोशि‍श करता
पर कभी कुछ समझ नहीं पाता
ना जने उसके भीतर इतना रोना कहां छि‍पा हुआ था
कि‍ वह कभी भी रो सकती थी
जबकि‍ सब उसको हंसने पर टोकते रहते थे
दि‍न जैसे जैसे बीतते गए उसका रोना कम होता गया
पता नहीं कब मैंने अपने बाल अपने आप ओंछना सीख लि‍या
कब मैं अपने पहाड़े अपने आप लि‍खने लगा
कब ससुराल बहन का अपना घर हो गया
फि‍र एक दि‍न उसकी गोद में उसका बच्‍चा सोने लगा
फि‍र वो अपने बच्‍चे को स्‍कूल जने के लि‍ए तैयार करने लगी
उसका होमवर्क करवाने लगी
पता ही नहीं चला कि‍ कब मैं उसके बगैर रहना सीख गया
अब एक ही शहर में रहते हुए मैं उससे फोन पर बात करता हूं
कभी कभी बचपन के कि‍स्‍से नि‍कल अने पर वह हंसती और मैं भी
कुछ झेंपता हुआ सा हंसता हूं।
                                                             साभार राजेश जोशी

Friday, August 12, 2011

कब तक आजाद होते रहेगें हम?


बहुत दिनों बाद आज बाहर निकलना हुआ और समझदारी दिखाते हुए आईटीओ जाने के लिए कोई और विकल्प न चुनकर मैट्रो से ही जाना तय किया। मैट्रो स्टेशन के बाहर महिलाओं और पुरूषों की दो लम्बी... कतारें लगी हुई थीं। पुरूष कतार कुछ ज्यादा ही दूर तक थी और इसें देखकर भारत में लिंगानुपात की विषमता साफ नजर आ रही थी। धीरे-धीरे रेंगते हुए मेरा नम्बर भी आ ही गया। बाकी दिनों की अपेक्षा चैकिंग करने वाली महिला कुछ ज्यादा ही अलर्ट थी, सिर से लेकर पैर तक अच्छी तरह चैकिंग करने के बाद ही उसने मुझे पास  किया। कुल मिलाकर इतना तो स्पष्ट था कि आज वाकई चैकिंग ही हो रही है ना की रोज जैसा मजाक। लेकिन तभी छठी इन्द्रीय के तार घनघना उठे। कहीं कोई बम-वम वो नहीं फट गया न...! ऐसी चौकसी देखकर हर देलहाइट और मुम्बईया यही अनुमान लगाता है, क्योंकि इस देश में चैकिंग होती ही उस वक्त है। फिर मैट्रो की आवाजाही सामान्य देख, इस बात का सन्तोष हुआ की सबकुछ ठीक-ठाक है लेकिन फि‍र इतनी तैनाती क्यों है?
याद आया की अगस्त माह है और 15 अगस्त के लिए ही ये सारा बन्दोबस्त हो रहा है। इस वर्ष 64 साल हो जाएंगे हमें आजाद हुए। लेकिन तभी विरोधाभास हावी हो गया की फिर क्यों आये दिन आजादी की दूसरी-तीसरी लड़ाई की बात कही जा रही है, क्यों जनता का आह्वान किया जा रहा है कि वो इस संघर्ष का हिस्सा बने और देश को आजाद कराए। क्या 64 साल साल पहले मिली आजादी महज एक धेखा थी? और अगर नहीं तो क्यों जे पी के आन्दोलन को दूसरी आजादी का संघर्ष कहा गया और क्यों इसके उपरान्त सन्1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार को भी सत्ता हस्तान्तरण से कहीं ज्यादा आजादी से जोड़कर पेश किया गया? और अब क्यों एक बार फि‍र हम आजाद होने को मचल रहे हैं? क्या हम वाकई कभी आजाद हुए ही नहीं? और अगर नहीं तो ये जश्न किसके लिए? क्या बस इसलिए की सत्ता गोरे हाथों से निकलकर काले हाथों में आ गई। क्योंकि वास्तविकता में इसके अलावा कभी कुछ नहीं बदला। अत्याचार और अनाचार जस के तस हैं, शायद कुछ ज्यादा ही और अगर कुछ बदला है तो बस उसका प्रारूप।
वर्तमान में आजादी की दूसरी लड़ाई के लिए तैयार हो रही है और पिछले कुछ दिनों से अन्ना और उनकी टीम लोगों के घर जा-जाकर उन्हें इस आजादी की लड़ाई में सम्मिलित होने का न्यौता दे रही हैं और अब तक के सर्वे यही कहते हैं कि आजादी की इस लड़ाई में लगभग पूरा देश अन्ना के साथ खड़ा है खासतौर पर युवा। जो अब भ्रष्टाचार की गुलामी को और सहन नहीं करना चाहते। आज टीवी से लेकर अखबार तक और फोन से लेकर वेब तक हर ओर इसी स्वतंत्रता संग्राम की गूंज है लेकिन क्या ये संग्राम आखिरी होगा? क्या इसके बाद हम पूर्णतः स्वतंत्र हो जाएंगे? शायद हो जाएं लेकिन क्या कोई आश्वासन है की हम फिर गुलाम नहीं होगें? इस बात की गारंटी तो स्वयं अन्ना और उनके सहयोगी भी नहीं दे सकते, वो ही क्या कोई नहीं दे सकता। इस बात की गारंटी व्यक्तिगत तौर पर दी भी नहीं जा सकती क्योंकि देश की आजादी और गुलामी के लिए कोई एक नहीं बल्कि हर एक जिम्मेदार है। आज अमीर और अमीर हो गए हैं और गरीब और गरीब। किसी के पास दो जून की रोटी का भी ठौर नहीं है तो किसी को व्यंजन से भरी थाल भी नहीं सुहाती और इन विषमताओं का कारण क्या है....क्या केवल राजनीतिज्ञ और राजनीति? काफी हद तक सत्ता ही इसके लिए जिम्मेदार है लेकिन हमारे योगदान को भी तो अनदेखा नहीं किया जा सकता। हम भी तब तक सोये रहते है जब सांस लेना मुहाल ना हो जाए और फि‍र जागते ही हाय तौबा मचाने लगते हैं। 16 अगस्त से जिस लड़ाई के लिए आज हम इतनी जोर शोर से तैयारी कर रहे हैं उसकी जरूरत ही न पड़ती अगर हम सब अपने हिस्से की ईमानदारी रखते और जिम्मेदारी  बरतते। और अगर तय ही कर लिया है कि हर दस साल बाद आजादी की लड़ाई लड़नी है तो जैसा अब तक चलता रहा है चलने दीजिए। 15 अगसत 2011 को आजादी की 64वीं सालगिराह मनाइयेगा और 16 से आजादी की लड़ाई लड़ियेगा। क्या ये उन शहीदो का अपमान नहीं लगता जिन्होंने स्वर्णिम भारत के सपने को साकार करने के लिए जान दे दी थी। तय हमें करना है कि इस बार वाकई क्या हम आजाद होना चाहते हैं या यूं ही भ्रष्टाचार, अराजकता, .......के गुलाम बने रहना।

फो(टो) हो : माधवराज शर्मा की औरत...

यह तस्वीर दिल्ली के दिल पर इठलाते हुए दौड़ने वाली मेट्रो ट्रेन की है. जब मैंने इस महिला के हाथ पर लिखे को पढ़ा तो मुझमें काफी उत्सुकता जगी. फौरन कैमरा क्लिक कर दिया, ऐसे कि वह जान न सके, महसूस न कर सके, और काम भी हो जाए. ताकि सनद रहे वाले अंदाज में इस औरत के हाथ पर दर्ज है... ''माधवराज शर्मा की औरत''. मतलब.. इस औरत का नाम है माधवराज शर्मा की औरत. माधवराज शर्मा इनके पति होंगे. और ये उस पति की औरत हैं, सो इनका नाम हो गया... माधवराज शर्मा की औरत. आज भी समाज में औरत अपने नाम से नहीं बल्कि अपने पति के नाम से जानी जाती है.
अत्याधुनिक तकनीक से बनी मेट्रो में सवार ऐसे जनों के मन में दर्ज जागरूकता का लेवल चिंतित करने वाला है. टेक्नोलाजी दिन ब दिन खुद को अपग्रेड कर रही है और हम उस अपग्रेडेशन को स्वीकार भी कर रहे हैं, अपना भी रहे हैं, पर तार्किकता और वैज्ञानिक सोच को बूझने-जानने को हम तैयार नहीं, और न ही इसे कोई सिखाने-बताने वाला है. जिनके कंधों पर देश के लोगों को शिक्षित और जागरूक करने का जिम्मा है, वे चाहते ही नहीं कि लोग चैतन्य हों, उन्नत चेतना वाले हों. इसी कारण कोई धर्म तो कोई जाति का डंका बजाकर अपने अपने जन को भरमा रहा है और उनके वोट दूह कर पांच साल के लिए रफूचक्कर हो जा रहा है. ''माधवराज शर्मा की औरत'' जैसी महिलाओं को देखकर हम भले ही अपने देश की विविधता पर मुग्ध हों, अपने देश की सो-काल्ड संस्कृति पर लट्टू हों, लेकिन सच तो यह है कि यह सब दुखदायी है, अपमानजनक है और औरतों को दोयम मानने-बताने वाला है

साक्षर नहीं, शिक्षित बनिये


आस्था और अंधविश्वास में एक सूत जितना ही फर्क होता है। जहां आस्था और विश्वास इन्सान को संबल देते हैं, भरोसा करना सिखाते हैं वहीं अंधविश्वास इन्सान को निष्क्रिय और कमजोर बना देता है। ईश्वर में विश्वास करना सही है, क्योंकि ईश्वर के प्रति आस्था मनुष्य की सोच को सकरात्मक बनाती है। लेकिन हाथ-पैर छोड़कर सिर्फ भगवान भरोसे बैठ जाना विश्वास नहीं अंधविश्वास है। कहा भी गया है कि ‘अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गये सबके दाता राम।’ सबकुछ छोड़-छाड़ कर भगवान के भरोसे बैठ जाना ईश्वर में आपके विश्वास को नहीं बल्कि आपकी अकर्मण्यता को बयान करता है। और वास्तविकता भी यही है कि कर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। इन्सान के कर्म ही उसके भविष्य और वर्तमान के लिए उत्तरदायी होते हैं। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने भी कर्म को ही सर्वोपरि बताया है।
लेकिन आज हर कोई शॉर्ट कट के पीछे भागा जा रहा है।  हर एक सोचता है कि कैसे कम से कम मेहनत करके ज्यादा से ज्यादा मुनाफा मिल जाए। कम मेहनत करके ज्यादा पाने की यही ललक इन्सान को पाखंडी ओझाओं और बाबाओं के पास ले जाती है। और जैसे ही वो इन ढ़ोंगी बाबाओं की चौखट पर पहला कदम रखता है, अंधविश्वास के दलदल में फंसता चला जाता है। जब तक होश आता है न विश्वास बचता है और न तो कुछ.......।
 21वीं सदी का समाज ज्यादा प्रतिस्पर्धी और प्रैक्टिकल है। ऐसे में भावनाओं और संवेदनाओं का स्थान परस्पर प्रतियोगिता ने ले लिया है। कुछ वर्षों पूर्व तक जो कुछ प्राथमिक था आज वही उपेक्षित है। जहां अब तक इन बाबाओं के पास वशीकरण, शादी कराने, तलाक दिलाने, सन्तान सुख दिलाने जैसी बातों के लिए कॉन्ट्रैक्ट लिये और दिये जाते थे अब वहीं इन्होंने अपने पोर्टफोलियों में भी व्यापक बदलाव कर लिया है। आप देख ही रहे होगें कि ग्राहक को फंसाने के लिए कितनी नयी-नयी बातों का उल्लेख है।
अभी तक के बाबा वशीकरण, सम्मोहन जैसी ही कुछ बातों को लेकर अपना धन्धा करते थे लेकिन अब इन बाबाओं ने खुद को इक्कीसवीं शताब्दी के अनुरूप ढ़ाल लिया है और कहते हैं न कि बिजनेसमैन वही सफल है जो बाजार के बदलाव को भांप सके और अपना माल बाजार की मांग के हिसाब से बेच सके। आज इन्सान शादी-विवाह से आगे का सेाचने लगा है । आज उसके लिए नौकरी, प्रमोशन, विदेश यात्रा जैसी बातें ज्यादा जरूरी हो गयी है। और इन्सान की इन्हीं नयी जरूरतों के अनुरूप आज के बाबाओं ने भी खुद के व्यवसाय में एक नये ट्रेंड को जन्म दिया है। इतना ही नहीं आम आदमी भी पूरे विश्वास के साथ अपनी परेशानियों का समाधन इन टोने-टोटकों में तलाशता है। अन्ततः इन्हीं धर्म के व्यापारियों के चक्कर में पड़कर कितनी ही जिन्दगियां तबाह हो जाती हैं। लेकिन सच्चाई तो यही है कि सफलता के लिए कोई शॅार्ट कट नहीं होता है। ईश्वर में आस्था रखना सही है लेकिन कुछ इस तरह, की उससे भरोसा बढ़े ना की अंधविश्वास।
पर सारा दोष किसी एक के मत्थे मढ़ देना भी सही नहीं होगा, सच्चाई ये भी है कि इन ढ़ोंगी बाबाओं के पास जाते भी तो हम-आप ही हैं। आज जबकि दावे किये जाते हैं कि समाज वैज्ञानिक तौर-तरीके अपना रहा है तो क्या कारण है कि इन ढ़ोंगी -पाखंडी बाबाओं की संख्या दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है। असल में हमारा समाज साक्षर तो रहा है लेकिन शिक्षित नहीं। साक्षर होकर किताबी ज्ञान तो मिल रहा है लेकिन विकास नहीं हो रहा और कहीं न कहीं यही भटकाव इन बाबाओं को बढ़ावा दे रहा है। ये बेवकूफ बनाते हैं और हम बनते हैं जिससे इनके खर्चे पूरे होते हैं। गांवों में कहा जाता है कि 'जब तक बेवकूफ इस धरती पर हैं चालाक भूखे नहीं मरेगा।’ और यहां बेवकूफ हैं हम। अब हमें ही यह सोचना और निर्धारित करना होगा कि हम चाहते क्या हैं, दूसरों के हाथों बेवकूफ बनना या फिर कर्म प्रधान बनकर आगे बढ़ना है।

अमूल बेबी के बोल कब फूटेगें


 रामदेव से लेकर अन्ना और भाजपा तक को कुछ न कुछ मिला... हर बार की तरह इस बार भी ठगी गई सिर्फ जनता : एक बार फिर जनता ठगी-सी खड़ी है. अवाक है और परेशान भी। अवाक, क्योंकि जिन हाथों में उसकी सुरक्षा का दायित्व था, उन्हीं हाथों से उसे ज़ख्म मिले हैं और परेशान इसलिए, कि आखिर वो जाए तो जाए कहां?

बाबा रामदेव ने जब अनशन की शुरुआत की तो, एक आस बंधी थी कि शायद इस बार हम भ्रष्टाचार को कड़ी टक्कर दे पाएं। लेकिन सरकार की दमनकारी नीति ने सब कुछ तितर-बितर कर दिया। इससे पूर्व अन्ना हजारे के आन्दोलन का हश्र भी कुछ ऐसा ही हुआ। हालांकि उनके अनशन पर किसी तरह का हमला नहीं हुआ लेकिन आज तक कोई परिणाम भी नहीं निकला। बैठकों का दौर जारी है और हर बैठक के साथ एक नये विवाद का जन्म भी।
बीते हफ्ते रामदेव के सत्याग्रह ने पूरे देश को एक सूत्रा में पिरोने का काम किया। ऐसा नहीं था कि इसमें केवल बाबा के समर्थक ही मौजूद थे। वे भी थे जो बाबा से भले कोई वास्ता न रखते हों पर देशहित की बात ने उन्हें भी रामलीला मैदान तक पहुंचा दिया। पर अब..... अब ना तो मुद्दे हैं और न ही उनका कोई सरपरस्त। काले धन का मुद्दा तो कभी का पीछे छूट गया है और अगर कुछ शेष है तो नवविवादित जूता काण्ड, सुषमा का नाच, भाजपा का प्रदर्शन, बाबा-भाजपा-संघ का रिश्ता, लाठी चार्ज, सुप्रीम कोर्ट और मानवाधिकार। लेकिन जिस विषय को लेकर जनता ने रामदेव बाबा का समर्थन किया था अब उनकी प्रासंगिकता धुंधली हो चुकी है।
सरकार की बात करें तो शायद ‘मौकापरस्त’ ही एक ऐसा शब्द मिले जो इसकी छवि का पर्याय बन सके। ये वही सरकार है और ये वही युवराज जो कभी आम जनता की आवाज बनने का दावा करते हैं तो कभी उनके साथ राज्य सरकार के विरोध में धरने पर बैठ जाते हैं। यही नहीं गिरफ्तारी तक देते हैं। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर तो सरकार की पोल बहुत पहले ही खुल चुकी है लेकिन शनिवार को जो हुआ, उसने सत्ता की रावणनीति को पूर्णतः स्पष्ट कर दिया। ‘अमूल बेबी’ तो लगता है बोलना ही भूल चुके हैं और दो दिन बाद जब प्रधनमंत्री के बोल फूटे तो बड़े ही नपे-तुले शब्दों में या यूं कहें कि डिक्टेटेड शब्दों में उन्होंने कहा कि हमारे पास कोई और चारा नहीं था। देश के प्रधनमंत्री की इस लाचारी पर तरस तो नहीं, गुस्सा जरूर आता है।
कहावत है कि ‘‘जाकै काज तेही को साजै और करे तो डंडा बाजै’’ लेकिन वरद हस्त की छाया में वे तो सुरक्षित है और डंडे की चोट पर है मासूम जनता। अगर सत्ता का ये हाल है तो विपक्ष भी पीछे नहीं है। गुमनामी के अन्धेरों में लगभग खो-सी गई भाजपा को भी टीवी स्क्रीन पर चमकने और अखबारों में हेडलाइन बनने का मुद्दा मिल गया है। उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले हैं और अब तक कोई ठोस मुद्दा ना होने के कारण भाजपा बुझी-बुझी नजर आ रही थी। लेकिन सत्याग्रह के मुद्दे ने उनमें भी नवसंचार कर दिया है। विपक्ष जनता की सोचने लगा है, और उसके लिए राष्ट्रपति तक से गुहार लगाने लगा है लेकिन ये नहीं कह सकतें कि ये सच्चाई है या ढोंग। जो भी हो एक सक्रीय विपक्ष नजर आने लगा है। पर यहां भी राजनीति ही हावी है और स्वयं का हित ही प्राथमिकता बना हुआ है।
रही बात अन्ना एण्ड पार्टी की तो, जो आवाज जन्तर-मन्तर से बुलन्द हुई अब चारदीवारी में ही दबकर रह गयी है। जब अन्ना ने अनशन शुरू किया था तो लगा कि देश में बदलाव की बयार आ गयी है और निश्चित तौर पर अब कुछ होकर रहेगा, लेकिन तमाम बुद्धजीवियों को ठेंगा दिखाते हुए अन्ततः सरकार वही कर रही है जो वो चाहती है।  अन्ना के चरित्र पर किसी को कोई शक नहीं लेकिन आपसी मतभेदों और सरकार की चालों में फंसकर अन्ना की टीम ने खुद ही अपनी मिट्टी-पलीद करवा ली है। कहीं न कहीं जनता का मोहभंग तो हुआ ही है और इसके लिए परिणामों से कहीं ज्यादा अन्ना और उनकी टीम की जल्दबाजी और अधूरी तैयारी जिम्मेदार है।
अब बात रामदेव के सत्याग्रह की। रामदेव ने सत्याग्रह तो बड़ी ही तैयारी से शुरू किया, और जब सत्ता के चार आला नेता उनके सम्मान में नतमस्तक दिखे तो लगा कि शायद इसबार काले धन का मुद्दा सुलझ जाए लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जो हुआ वो आपके और हमारे सामने है। रामदेव का अन्धानुकरण न करते हुए अगर सोचें तो क्या ऐसा नहीं लगता कि रामदेव को पहले ही अपनी सम्पत्ति का खुलासा कर देना चाहिए था और वैसे भी सांच को आंच क्या। अगर वे सच्चे हैं तो पहले या बाद में का कोई प्रश्न ही नहीं उठता और यदि उन्होंने किसी पत्र पर सहमति दी है तो उसका खुलासा, साफ-साफ तौर पर जनता से करते।
उन्हें क्यों ऐसा लगा कि ऐसा करने से वे कमजोर पड़ जाएंगे या जनता उनका साथ नहीं देगी? जो जनता भरोसा करके अपना कामधाम छोड़, भूखे-प्यासे आपके साथ खड़ी है क्या वो सच जानकर आपका साथ छोड़ देती? जनता रामदेव के साथ आयी क्योंकि ये मुद्दा उससे जुड़ा था और बाबा उसके लिए आवाज बुलन्द कर रहे थे, लेकिन कहीं न कहीं रामदेव ने बात छिपाकर जनता को छला तो है ही। अब सब कुछ सामने आ चुका है, शेष है तो सिर्फ राख के ढ़ेर पर पत्थरबाजी करने का दौर।
सरकार को जो करना था उसने किया और आज भी बिना किसी की परवाह किये वही कर रही है जो उसे करना है। भाजपा जिन टर्निंग प्वाइंट्स की खोज में थी वो उसे रामदेव के सत्याग्रह के रूप में बैठे-बिठाए मिल गया। अन्ना एण्ड ग्रुप को जो चाहिए था वो उसे मिला भी और खो भी गया। रामदेव को राजनीति में आने का रास्ता मिल गया और मुद्दा धुंआ हो गया, कल तक गर्मी दिखाने वाले बाबा आज केन्द्र को माफी देते नजर आ रहे हैं लेकिन जनता.....? जनता आज भी वहीं है जहां कल थी। आज भी भ्रष्टाचार उसी का निवाला छीन रहा है और सरकार भी उसी की गर्दन दबोच रही है। शनिवार के काण्ड ने उसके मन में रोष तो भरा है लेकिन साथ ही एक झिझक भी। झिझक, कि क्या उसे अब किसी आन्दोलन का हिस्सा बनना चाहिए? लेकिन अब अगर हम चुप रहे तो लाठियों की जगह गोलियां ही चलेंगी।
अब हमें ही ये समझना होगा कि वास्तव में ये हमारे हक की ही लड़ाई है और हमें ही इसकी कमान सम्भालनी होगी। अपने-अपने स्तर पर इस भ्रष्टाचार को दूर करने का प्रयास करना होगा और इसे अपनी आदत में शुमार करना होगा क्योंकि वार्षिक उत्सव के तौर पर मनाये जाने वाले इन आन्दोलनों का हश्र हम सबके सामने है। आने वाले कुछ दिनों में एक बार फिर सबकुछ सामान्य हो जाएगा। बाबा पतंजलि में ध्यान रमा लेंगे और राजनीतिक दल चुनावों में, लेकिन हमारा क्या? हमारे मुद्दों का क्या? वो तो आज भी जस के तस बने हुए हैं और अब अगर हमने कुछ नहीं किया तो संभव है ये धोखेबाज देश के साथ-साथ हमें भी बेच खाएं। तो इससे पहले की बहुत देर हो जाए आज से ही अपने स्तर पर भ्रष्टाचार की लड़ाई की शुरुआत करें।

Popular Posts