Saturday, August 27, 2011

पानी ले लो पानी....

शाहरूख खान की बहुत बड़ी फैन नहीं हूं लेकि‍न स्‍वदेश उन कुछएक फि‍ल्‍मों में से है जि‍से देखकर कुछ घण्‍टों तक सोचने को मजबूर हो जाती हूं। एक बेहद आम वि‍षय पर बनी फि‍ल्‍म, जि‍समें बहुत सी नई बाते हैं। जैसे; भारतीय संस्‍कृति‍ के सम्‍मान की बात की गई है लेकि‍न दूसरों की संस्‍कृति‍ पर बि‍ना कीचड़ उछाले, जाति‍-पाति के वि‍षय पर भी एक नई सोच दि‍खाई गई है। लेकि‍न ये एक सीन ऐसा है जि‍से हर दूसरे दिन यू ट्यूब पर डाउनलोड करके देखती हूं। एक बच्‍चा जो दोस्‍तों के साथ खेलने और पढ़ने की उम्र में पानी बेच रहा है, 25 पैसे का एक ग्‍लास.. खुद की सांस उखड़ी जा रही है लेकि‍न फि‍र भी पानी बेच रहा है। पांच रूपए का सि‍क्‍का मि‍ल जाने पर जि‍सका हि‍साब गड़बड हो जाता है....कि‍तना बेबस है वो बच्‍चा और कि‍तने बेबस होंगे उसके मां-बाप, अपनी गरीबी से।
भले ही ये एक फि‍ल्‍म का सीन भर है लेकि‍न खोजि‍ए और सोचि‍ए तो असलि‍यत यही है। ब्‍लॉग बनाया था, अपनी बातों को आपके सामने रखने के लि‍ए और आपके मतों को जानने के लि‍ए, इसीलि‍ए इस सीन को भी शेयर कर रही हूं। इसे देखकर आपके मन में जो पहला ख्‍याल आए, बताएं।

Friday, August 26, 2011

मां की ममता से कम नहीं है बाप का दुलार

शायद ही कोई बाप अपने बच्‍चे से कभी ये कह पाता है कि‍ वो उसे कि‍तना प्‍यार करता है, कि‍तनी चिंता करता है जब वो घर से बाहर नि‍कलता है और उसे कि‍तना मि‍स करता है जब वो कुछ दि‍नों के लि‍ए कहीं चला जाता है। बच्‍चे के जन्‍म के साथ ही, बाप की आंखों में सपने पलने लगते हैं, लेकिन शायद ही कभी वो इन सपनों को  बांट पाता है, बता पाता है कि‍ वो उन्‍हें दुनि‍या-जहान की खुशि‍यां देना चाहता है, भले ही खुद वो सालभर में एक जोड़ा कपड़ा भी बमुश्‍कि‍ल खरीद पाता हो ।
लेकि‍न मां, मां ऐसी नहीं होती, उसे जताना आता है, बताना आता है और शायद इसी लि‍ए समाज ने, हमने-आपने, ममता शब्‍द को केवल मां तक ही सीमि‍त कर दि‍या है। पि‍ता की भूमि‍का बस एक पैसा कमाकर घर चलाने वाले आदमी की रह गई है, और जि‍से घर का तथाकथि‍त मुखि‍या भी बस इसी वजह से माना जाता है।
अक्‍सर छोटे बच्‍चों से ये सवाल कि‍या जाता है कि‍ मम्‍मी अधि‍क प्‍यार करती हैं या पापा...मां के पक्ष में ही ज्‍यादा वोट आते हैं। घर से दूर रहने वाले बच्‍चों को भी  बस मां की ही याद आती है, और बाप की उस वक्‍त जब कड़की छाई हो। दि‍नभर में करीब दर्जन बार हम मां की लोरी, मां के खाने और मां के आंचल की बात करते हैं और बाप के लि‍ए.... कभी-कभार, और वो भी कुछ इस तरह की यार बापू का फोन आया था, लगता है रि‍जल्‍ट देख लि‍या है, इस बार तो एक्‍सट्रा पैसे मि‍लने से रहे..।
अक्‍सर मां के दि‍खने वाले दुलार के आगे, बाप के दि‍ल का प्‍यार खो सा जाता है या फि‍र हमारे एहसास इतने खोखले हो चुके हैं कि‍ हमें जो दि‍खता है हम बस उसे ही सम्‍पूर्ण मानते फि‍रते हैं। बाप की छवि‍ एक सख्‍त, गुस्‍सैल और रीजनिंग पर्सनैलि‍टी से आगे कभी बढ़ ही नहीं पाती और समय के साथ दूरि‍यां इतनी बढ़ जाती हैं कि‍, एक ही घर में बाप-बेटे/बेटी अजनबि‍यों सा बर्ताव करने लगते हैं और संवाद कहीं खो से जाते हैं। लेकि‍न क्‍या वाकई एक बाप अपने बच्‍चों को, मां से कम प्‍यार करता है...? अक्‍सर मैं मां को याद कर-करके दुखी होती रहती हूं और ऐसा बहुत कम होता है जब पापा के लि‍ए रोती हूं। कल पूरे 6 महीने बाद जब पापा से मि‍ली तो आंखे भर आईं। हालांकि‍ मुलाकात बि‍ल्‍कुल मेहमानों वाले अन्‍दाज में, बेहद संक्षि‍प्‍त थी लेकि‍न महज उन दो घण्‍टों में पापा को एक हि‍चकि‍चाती और संकोची मां-सा महसूस कि‍या। संकोच की वजह मुझे पता थी, शायद उन्‍होंने कल पहली बार ये पूछा था कि‍ तुम कैसी हो, खाना ढंग से खाया करो, बहुत कमजोर हो गई हो और वो सारे सवाल जो आमतौर पर मांएं पूछती हैं। इससे पहले तक हम जब भी मि‍लते थे उनकी आंखे ही सारे सवाल पूछ लेती और खुद ब खुद मुझे देखकर जवाब भी तय कर लेती थीं।
दो घण्‍टे की मुलाकात में ज्‍यादा वक्‍त मेट्रो में ही बीता। नोएडा सि‍टी सेंटर से आनन्‍द वि‍हार के बीच का फासला तय करते हुए। रात हो चुकी थी, मैं पापा को बस अड्डे छोड़ने जा रही थी, मेट्रो में ये उनकी पहली यात्रा थी तो मुझे पूरा भरोसा था कि‍ वो भटक जाएंगे सो छोड़ने चली गई। खचाखच भीड़ थी और मैने पापा का हाथ पकड़ रखा था लेकि‍न पापा की सारी चौकसी इस बात पर थी कि कहीं कोई भीड़ का फायदा उठा कर उनकी बेटी के साथ छेड़खानी ना कर दे। आनन्‍द वि‍हार के दो नम्‍बर गेट से एक्‍जि‍ट करते ही बस अड्डा आ गया और साथ ही जुदा होने का वक्‍त भी। कुछ वक्‍त चुपचाप रहने के बाद पापा ने कहा जाओ तुम देर हो रही है, वैसे भी रात हो चुकी है और ऐसा कहते कहते उनका गला भर आया।
इसके पहले भी कई बार मैं उन्‍हें और वो मुझे छोड़ने आए थे लेकि‍न रूंआसा होता हुआ पहली देख रही थी, और मेरी आंखे भी भर आईं। पापा ने तुरन्‍त खुद को सम्‍भालते हुए कहा, इतनी बड़ी हो गई हो और रोती हो..; बेवकूफ कहीं की, अब जाओ जल्‍दी और मैं चली आई, रास्‍तेभर यादों को समेटते। आज सुबह फोन पर पापा को पूछा कि वो कल रो क्‍यों रहे थे तो उन्‍होंने इस बात से तुरन्‍त इन्‍कार कर दि‍या लेकि‍न मुझे पता है कि‍ कल उनके भीतर का ढेर सारा प्‍यार ही आंसू बनकर बाहर आ गया था। महसूस कि‍या कि‍ मां की जगह अगर बाप नहीं ले सकता तो बाप की जगह मां भी नही ले सकती। एक पि‍ता भी अपनी औलाद से उतना ही प्‍यार करता है जि‍तना कोई मां, बस हम उसे आइडेंटीफाई नहीं कर पाते और सिर्फ मां को ही ममता की मूरत मानते हैं लेकि‍न बाप के अन्‍दर भी उतनी ही ममता होती है, फर्क है तो बस देखने और दि‍खाने का।
नि‍दा फ़ाजली की नज्‍म है, तुम्‍हारी कब्र पर। पहले भी बहुत बार पढ़ी है और ऐसा नहीं है कि‍ उर्दू ज़बान होने के कारण समझ नहीं आई लेकि‍न वो एक एहसास कभी नहीं जगा, कि‍ मैं खुद को इस नज्‍़म से जोड़कर देख पाती। लेकि‍न आज जब दुबारा ये नज्‍़म पढ़ी तो खुद को इसके बेहद करीब पाया।
तुम्हारी कब्र पर मैं
फ़ातेहा पढ़ने नही आया,
मुझे मालूम था, तुम मर नही सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर
जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,
वो तुम कब थे?
कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था ।
मेरी आँखे
तुम्हारी मंज़रो मे कैद है अब तक
मैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँ
वो, वही है
जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी ।
कहीं कुछ भी नहीं बदला,
तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में सांस लेते हैं,
मैं लिखने के लिये जब भी कागज कलम उठाता हूं,
तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूं |
बदन में मेरे जितना भी लहू है,
वो तुम्हारी लगजिशों नाकामियों के साथ बहता है,
मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जेहन रहता है,
मेरी बीमारियों में तुम मेरी लाचारियों में तुम |
तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है,
वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है,
तुम्हारी कब्र में मैं दफन तुम मुझमें जिन्दा हो,
कभी फुरसत मिले तो फातहा पढनें चले आना |

                                                   साभार : नि‍दा फ़ाज़ली
                                                       (तुम्‍हारी कब्र पर)


                                                                                              

Wednesday, August 24, 2011

तेरी चौखट मेरा मदीना......

कई बार कुछ गाने ऐसे होते हैं जो आपको, एक अजीब सा संतोष देते हैं। उन्‍हीं कुछएक गानों में से ये मेरा पसंदीदा है। हर शब्‍द अपने आप में प्‍यार का सागर है। खास तौर पर 'तेरी चौखट मेरा मदीना', इससे ज्‍यादा शायद ही कोई कि‍सी से अपने प्‍यार का इजहार कर सके। प्‍यार को अक्‍सर शब्‍दों में बयां करना मुश्‍कि‍ल हो जाता है और अगर करना हो तो शायद ही इससे बेहतर बोल कहीं और मि‍ल सकें।

Popular Posts