शायद ही कोई बाप अपने बच्चे से कभी ये कह पाता है कि वो उसे कितना प्यार करता है, कितनी चिंता करता है जब वो घर से बाहर निकलता है और उसे कितना मिस करता है जब वो कुछ दिनों के लिए कहीं चला जाता है। बच्चे के जन्म के साथ ही, बाप की आंखों में सपने पलने लगते हैं, लेकिन शायद ही कभी वो इन सपनों को बांट पाता है, बता पाता है कि वो उन्हें दुनिया-जहान की खुशियां देना चाहता है, भले ही खुद वो सालभर में एक जोड़ा कपड़ा भी बमुश्किल खरीद पाता हो ।
लेकिन मां, मां ऐसी नहीं होती, उसे जताना आता है, बताना आता है और शायद इसी लिए समाज ने, हमने-आपने, ममता शब्द को केवल मां तक ही सीमित कर दिया है। पिता की भूमिका बस एक पैसा कमाकर घर चलाने वाले आदमी की रह गई है, और जिसे घर का तथाकथित मुखिया भी बस इसी वजह से माना जाता है।
अक्सर छोटे बच्चों से ये सवाल किया जाता है कि मम्मी अधिक प्यार करती हैं या पापा...मां के पक्ष में ही ज्यादा वोट आते हैं। घर से दूर रहने वाले बच्चों को भी बस मां की ही याद आती है, और बाप की उस वक्त जब कड़की छाई हो। दिनभर में करीब दर्जन बार हम मां की लोरी, मां के खाने और मां के आंचल की बात करते हैं और बाप के लिए.... कभी-कभार, और वो भी कुछ इस तरह की ‘यार बापू का फोन आया था, लगता है रिजल्ट देख लिया है, इस बार तो एक्सट्रा पैसे मिलने से रहे..।‘
अक्सर मां के दिखने वाले दुलार के आगे, बाप के दिल का प्यार खो सा जाता है या फिर हमारे एहसास इतने खोखले हो चुके हैं कि हमें जो दिखता है हम बस उसे ही सम्पूर्ण मानते फिरते हैं। बाप की छवि एक सख्त, गुस्सैल और रीजनिंग पर्सनैलिटी से आगे कभी बढ़ ही नहीं पाती और समय के साथ दूरियां इतनी बढ़ जाती हैं कि, एक ही घर में बाप-बेटे/बेटी अजनबियों सा बर्ताव करने लगते हैं और संवाद कहीं खो से जाते हैं। लेकिन क्या वाकई एक बाप अपने बच्चों को, मां से कम प्यार करता है...? अक्सर मैं मां को याद कर-करके दुखी होती रहती हूं और ऐसा बहुत कम होता है जब पापा के लिए रोती हूं। कल पूरे 6 महीने बाद जब पापा से मिली तो आंखे भर आईं। हालांकि मुलाकात बिल्कुल मेहमानों वाले अन्दाज में, बेहद संक्षिप्त थी लेकिन महज उन दो घण्टों में पापा को एक हिचकिचाती और संकोची मां-सा महसूस किया। संकोच की वजह मुझे पता थी, शायद उन्होंने कल पहली बार ये पूछा था कि तुम कैसी हो, खाना ढंग से खाया करो, बहुत कमजोर हो गई हो और वो सारे सवाल जो आमतौर पर मांएं पूछती हैं। इससे पहले तक हम जब भी मिलते थे उनकी आंखे ही सारे सवाल पूछ लेती और खुद ब खुद मुझे देखकर जवाब भी तय कर लेती थीं।
दो घण्टे की मुलाकात में ज्यादा वक्त मेट्रो में ही बीता। नोएडा सिटी सेंटर से आनन्द विहार के बीच का फासला तय करते हुए। रात हो चुकी थी, मैं पापा को बस अड्डे छोड़ने जा रही थी, मेट्रो में ये उनकी पहली यात्रा थी तो मुझे पूरा भरोसा था कि वो भटक जाएंगे सो छोड़ने चली गई। खचाखच भीड़ थी और मैने पापा का हाथ पकड़ रखा था लेकिन पापा की सारी चौकसी इस बात पर थी कि कहीं कोई भीड़ का फायदा उठा कर उनकी बेटी के साथ छेड़खानी ना कर दे। आनन्द विहार के दो नम्बर गेट से एक्जिट करते ही बस अड्डा आ गया और साथ ही जुदा होने का वक्त भी। कुछ वक्त चुपचाप रहने के बाद पापा ने कहा जाओ तुम देर हो रही है, वैसे भी रात हो चुकी है और ऐसा कहते कहते उनका गला भर आया।
इसके पहले भी कई बार मैं उन्हें और वो मुझे छोड़ने आए थे लेकिन रूंआसा होता हुआ पहली देख रही थी, और मेरी आंखे भी भर आईं। पापा ने तुरन्त खुद को सम्भालते हुए कहा, इतनी बड़ी हो गई हो और रोती हो..; बेवकूफ कहीं की, अब जाओ जल्दी और मैं चली आई, रास्तेभर यादों को समेटते। आज सुबह फोन पर पापा को पूछा कि वो कल रो क्यों रहे थे तो उन्होंने इस बात से तुरन्त इन्कार कर दिया लेकिन मुझे पता है कि कल उनके भीतर का ढेर सारा प्यार ही आंसू बनकर बाहर आ गया था। महसूस किया कि मां की जगह अगर बाप नहीं ले सकता तो बाप की जगह मां भी नही ले सकती। एक पिता भी अपनी औलाद से उतना ही प्यार करता है जितना कोई मां, बस हम उसे आइडेंटीफाई नहीं कर पाते और सिर्फ मां को ही ममता की मूरत मानते हैं लेकिन बाप के अन्दर भी उतनी ही ममता होती है, फर्क है तो बस देखने और दिखाने का।
निदा फ़ाजली की नज्म है, ‘तुम्हारी कब्र पर’। पहले भी बहुत बार पढ़ी है और ऐसा नहीं है कि उर्दू ज़बान होने के कारण समझ नहीं आई लेकिन वो एक एहसास कभी नहीं जगा, कि मैं खुद को इस नज़्म से जोड़कर देख पाती। लेकिन आज जब दुबारा ये नज़्म पढ़ी तो खुद को इसके बेहद करीब पाया।
तुम्हारी कब्र पर मैं
फ़ातेहा पढ़ने नही आया,
मुझे मालूम था, तुम मर नही सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर
जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,
वो तुम कब थे?
कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था ।
मेरी आँखे
तुम्हारी मंज़रो मे कैद है अब तक
मैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँ
वो, वही है
जो तुम्हारी नेक-नामी और बद-नामी की दुनिया थी ।
कहीं कुछ भी नहीं बदला,
तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में सांस लेते हैं,
मैं लिखने के लिये जब भी कागज कलम उठाता हूं,
तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूं |
बदन में मेरे जितना भी लहू है,
वो तुम्हारी लगजिशों नाकामियों के साथ बहता है,
मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जेहन रहता है,
मेरी बीमारियों में तुम मेरी लाचारियों में तुम |
तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है,
वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है,
तुम्हारी कब्र में मैं दफन तुम मुझमें जिन्दा हो,
कभी फुरसत मिले तो फातहा पढनें चले आना |
साभार : निदा फ़ाज़ली
(तुम्हारी कब्र पर)