Friday, September 02, 2011

आज वो भी मुझसे कहीं खो गया....

मेरी हि‍फाजत के लि‍ए जो ताबीज़ तुमने मुझे पहनाया था 
आज वो भी मुझसे कहीं खो गया।
कुछ भी याद नहीं कहां खोजूं उसे, तुम्‍हारी तरह आज
वो भी मुझे छोड़ गया।
याद है, बचपन में तुम झाड़-फूंक करके, मेरी नजर उतारती
और मैं तुम्‍हे गंवार कहकर परेशान करती
ये ताबि‍ज़ भी जब, तुमने पहनाया मुझे
कि‍तना रूलाया और सताया था मैंने तुम्‍हें
लेकि‍न तुम्‍हारे जाने के बाद उसी में बसा लि‍या था तुम्‍हे
हर काम के पहले बस उसे ही नीहारा था मैने
तुम्‍हारी कमी तो थी लेकि‍न उसके पास होने से
तुम्‍हारा होना भी महसूस कि‍या था मैंने
आज वो भी मुझसे खो गया
तुम्‍हारी यादों की ति‍जोरी था वो
तुम्‍हारी छोटी-छोटी बात पर फि‍क्र करने का
एहसास था वो।
उसके खोते ही न जाने क्‍यो डर लगने लगा है
जैसे सच में मेरे साथ बुरा होने वाला है
आज तुम्‍हारी तरह मैं भी अंधवि‍श्‍वासी बन गई
देर से ही सही, पर आज समझ आ ही गया मुझे
मां, अंधवि‍श्‍वास नहीं वो तुम्‍हारा प्‍यार ही था
जब तुमने अपनी बाली बेचकर वो ताबि‍ज़ पहनाया था मुझे
आज वो भी मुझसे खो गया
और एक बार फि‍र तुम्‍हारे जाने का
दर्द मेरे भीतर जवां हो गया।




खाली हो क्‍या भइया....


उसके लि‍ए ये नया नहीं होगा, हर रोज़ वो ऐसी ही गालि‍यां सुनता होगा और गरीब होने के नाते अपनी गलती ना होने पर भी डरता होगा।
उस दि‍न एफएम में मॉर्निंग शि‍फ्ट थी, सुबह 7:30 तक हर हाल में स्‍टूडि‍यो पहुंचना था। आंख खुली लेकि‍न घड़ी देखकर मुंह भी खुला रह गया, सात बज चुके थे। आव देखा न ताव बाथरूम में घुस गई, तैयार होते-होते करीब 7:30 हो गए थे। एक सेब हाथ में पकड़कर दौड़ती हुई सड़क पर आ गई। दो रि‍क्‍शे वाले मोड़ पर ही खड़े दि‍ख गए, एक बूढ़ा और दूसरा जवान। पता नहीं कब और कैसे ये आदत बन गई कि‍ बूढ़े रि‍क्‍शेवाले के रि‍क्‍शे पर बैठना बुरा लगता है, आत्‍मग्‍लानि‍ सा भाव उठने लगता है मन में।
खैर पूछा भइया खाली हो और उसके मूक हां के बाद बि‍ना पैसे तय कि‍ये रि‍क्‍शे पर इस अनुरोध के साथ बैठी ‘’भइया प्‍लीज़ थोड़ा जल्‍दी ले लेना’’। रि‍क्‍शा थर्ड गि‍यर में चल रहा था, गाने के साथ। गाना भी ऐसा वैसा नहीं था, फि‍ल्‍म नाम का सबसे फेमस गाना चि‍ट्ठी आई है फुल वाल्‍यूम में। गाना अच्‍छा था तो मैंने अपनी ठेंपी (ईयरफोन) को बैग में ही छोड़ दि‍या। गाना खत्‍म होते ही, दूसरा गाना शुरू हो गया, तुम-सा कोई प्‍यारा कोई मासूम नहीं है.... बहुत दि‍न बाद सुनने को मि‍ला, अच्‍छा लग रहा था।
तभी मेरा फोन बज उठा, अम्‍मा (दादी) का फोन था। पूरी बातचीत भोजपुरी में ही थी जि‍सने रि‍क्‍शे वाले को ये पूछने पर मजबूर कर दि‍या कि‍ कवन जि‍ला के (कि‍स जि‍ले से हूं मैं)। बताया मऊ के। जवाब से उसका मनोबल जरूर बढ़ गया था तभी उसने अपना पूरा डाटा मेरे सामने रख दि‍या। आरा जि‍ला का रहने वाला था वो, 14 साल का था तो अपने चच्‍चा के साथ दि‍ल्‍ली आया था। साल में एक बार जाता है छठ के समय। नरेन्‍द्र ने बहुत ही खुशी से बताया कि‍ उसकी शादी हो चुकी है और दुई ठे बि‍टि‍यो हैं।
कई बार बोली की समानता आपको अपरि‍चि‍तों के साथ भी  परि‍चि‍त बना देती है, मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। उसकी बातें अच्‍छी लग रही थीं, बनावटी नहीं थीं, अपनापन था। बातों-बातों में उसने बताया कि‍ हर महीने पैसा नहीं भेज पाता है, बचता ही नहीं है, वो खुद भी बड़ी मुश्‍कि‍ल से दो वक्‍त खा पाता है। अभी-अभी बीमारी से उठा है, पीलि‍या हो गया था, बड़ा पइसा लग गया।
बातों में ही ना जाने कब एफएम बि‍ल्‍डंग आ गई। पैसे पकड़ाते वक्‍त उसने बस इतना ही कहा, अपने ओर क अदमी अपने होलअ। 7:48 हो गए थे स्‍टूडि‍यो में को-एंकर को देख सांस में सांस आई। दोपहर करीब दो बजे प्रोग्राम खत्‍म हुआ। फटाफट झोला-डण्‍डा टांग बाहर नि‍कल आई। कुछ दूर चलते हुए ही आ गई, रि‍क्‍शे वाले को पूछा भइया खाली हो, भाई परमानन्‍द चलोगे, बोला हां और मैं लपककर बैठ गई। रास्‍तेभर उसकी मैली शर्ट, जि‍से कोई माई का लाल साफ कर तो दे। तरह-तरह के डि‍टर्जेन्‍ट पाउडर वालों की वो शर्ट अकेले ही छुट्टी कर देती। एक बरमूडा जि‍सकी हालत भी कुछ-कुछ शर्ट सी ही थी। एक टूटी हुई रबर की चप्‍पल जो धूप में वार्मर बन जाती होगी। पसीना पोछते वो मुझे ढोए जा रहा था। कई बार रि‍क्‍शे पर बैठना भी असमंजस में डाल देता है। एक ख्‍याल तो आता है कि‍ बैठना चाहि‍ए, यही तो इनकी रोजी-रोटी है और दूसरा की कैसे आप तानाशाह जैसे पीछे बैठ सकते हैं। रि‍क्‍शे के एक कोने में पानी की बोतल बड़ी खूबसूरती से बोरे में सि‍लकर रखी हुई थी। पसीना पोछते और मुझे ढोते, रि‍क्‍शा बस घर पहुंचने ही वाला था कि‍ एक बाइक से टक्‍कर हो गई। बाइक पर एक प्रेमी जोड़ा हवा से बातें करता जा रहा था और ट्रैफि‍क सि‍ग्‍नल देखना भूल गया था। गलती मानना तो दूर, उल्‍टे दोनों रि‍क्‍शे वाले पर ही चढ़ बैठे, मां-बहन और इससे मि‍लते-जुलते सारे अलंकरण रि‍क्‍शे वाले को दे डाले। प्रेमी महोदय का खून तब और उबाल मारने लगा जब उनकी प्रेमि‍का का उह-आउच का क्रंदन शुरू हो गया। बोलना नहीं चाहती थी लेकि‍न बोलना पड़ा। समझ में तो उन्‍हें क्‍या आया होगा लेकि‍न बात बि‍गड़ती देख दोनों वहां से नि‍कल गए।
घर पर आकर बहुत देर तक उसी के बारे में सोचती रही, कि‍तनी गालि‍यां सुनी उसने, वो भी बि‍ना बात के, बि‍ना गलती के। लेकि‍न उसके लि‍ए ये नया नहीं होगा, हर रोज़ वो ऐसी ही गालि‍यां सुनता होगा और गरीब होने के नाते अपनी गलती ना होने पर भी डरता होगा। हर रोज हम-आप ही उसे बेइज्‍जत करते हैं, जि‍तना भी मोल-भाव करना होता है इनसे ही करते हैं और कई तो बि‍ना दि‍ये भी चलते बनते हैं। लेकि‍न इसके बि‍ना गुजारा भी संभव नहीं है। हालांकि‍ अब लगभग सभी के पास अपने साधन हैं फि‍र भी तंग गलि‍यों में तो रि‍क्‍शा ही राज करता है इस सच्‍चाई को जानने के बावजूद...... ये सब हो रहा है। ऑटो वालों, बस वालों, कार वालों सभी के लि‍ए सरकार के पास नीति हैं लेकि‍न रि‍क्‍शेवालों के लि‍ए.... शायद नहीं और सरकार ही क्‍या हम-आप भी उतने ही जि‍म्‍मेदार हैं उनकी इस हालत के लि‍ए। रोज़ रि‍क्‍शे पर बैठते तो हैं पर शायद ही कभी उनके लि‍ए सोचा हो, ये सही है कि‍ इनकी जरूरतों को नीति‍गत सुवि‍धा देना सरकार का काम है लेकि‍न समाजि‍क स्‍तर पर.... ये हमारी और आपकी जि‍म्‍मेदारी भी तो है। अंग्रेजों के ज़माने में भौति‍कता का पर्याय रि‍क्‍शा, आज गरीबी की पहचान बन चुका है और रि‍क्‍शावाला मुफ्त की गाली खाने वाला, गूंगा-बहरा..... जबकि‍ ये समाज का वो वर्ग है जि‍सके चलते रहने से हमारे और आपके जीवन में भी गति‍ है।                     

Wednesday, August 31, 2011

मेरी पहली फि‍ल्‍म समीक्षा... गाइड


षोडशी कन्‍याओं की तरह हमेशा (46 साल के बाद भी) जवां रहने वाली, हि‍न्‍दी सि‍नेमा की एक यादगार फि‍ल्‍म........ मेरी ओर से गाइड के लि‍ए।
एक मि‍त्र संग, फि‍ल्‍मों पर बात हो रही थी, कि‍ असल में फि‍ल्‍में सिर्फ मनोरंजन नहीं करतीं, भावनाओं को भी तृप्‍त करती हैं। जैसे; उदास होने पर सैड मूवी देखना और खुद को पात्रों से जोड़ना, मस्‍ती का मूड हो तो कॉमेडी, कि‍सी नए थॉट की तलाश हो तो कोई आर्ट मूवी और कुंठा से भरे हों तो ब्‍लू फि‍ल्‍म। हर भाव के लि‍ए फि‍ल्‍मों की एक कैटेगरी है।
दोनों ही इस बात से सहमत थे, सो बात जल्‍दी ही खत्‍म हो गई। मि‍त्र महोदय, हालि‍या रीलि‍ज एक फि‍ल्‍म देखकर आए थे, बड़े ही अनोखे ढंग से कहानी सुनाई ताकि‍ मैं भी जाकर देखूं। फि‍ल्‍म तो नहीं देखी लेकि‍न उनकी समीक्षा वाकई दि‍ल को छू गई, कॉम्‍प्‍लीमेंट भी दे दि‍या कि‍ एक अच्‍छे फि‍ल्‍म समीक्षक बन सकते हो।
इतनी फि‍ल्‍मी होकर घर पहुंची थी कि‍ मेरा भी समीक्षा करने का दि‍ल करने लगा। ये कहीं ना कहीं उन महोदय की समीक्षा से प्रभावि‍त होकर ही था। नई फि‍ल्‍में कम पसंद हैं पर पुरानी, बड़े शौक से। लेकि‍न पुरानी फि‍ल्‍म की समीक्षा... कैसे...? सुनेगा कौन....? होती भी है या नहीं... ? इन तमाम नकरात्‍मक बातों के इतर केवल एक बात पक्ष में थी। समीक्षा का उद्देश्‍य, कि‍ कोई भी नई फि‍ल्‍म आप क्‍यों देखें और क्‍यों नहीं देखें। पुरानी फि‍ल्‍में, भी कुछ ऐसी ही हैं, खासतौर पर युवा वर्ग के लि‍ए। जो कुछएक पुरानी फि‍ल्‍मों के नाम तक ही सीमि‍त है, बाकी उसके लि‍ए अनरीलि‍ज्‍़ड सी ही हैं। अगर नई फि‍ल्‍मों की समीक्षा हो सकती है तो पुरानी फि‍ल्‍मों की क्‍यों नहीं और यही सोचकर आज गाइड देखी।
समीक्षा एक कला है और कला, अभ्‍यास से नि‍खरती है। इस कला को खुद के अन्‍दर पैदा करने का पहला प्रयास है; समीक्षा की खामि‍यों के इन्‍तजार में....।
षोडशी कन्‍याओं की तरह हमेशा (46 साल के बाद तक) अपने जवां होने का एहसास कराने वाली, हि‍न्‍दी सि‍नेमा की एक यादगार फि‍ल्‍म........ मेरी ओर से गाइड के लि‍ए।
देवानंद की इमेज उस दौर में कुछ वैसी ही थी जैसी आज रि‍ति‍क और शाहरूख की। सुना तो ये भी है कि‍ जब वो काले कपड़ो में नि‍कलते तो लड़कि‍यां बेहोश हो जातीं। इसमें कि‍तनी सच्‍चाई है ये तो नहीं पता लेकि‍न फि‍ल्‍म के राजू गाइड से आप प्‍यार कि‍ये बि‍ना नहीं रह सकते। बहुत सी लव स्‍टोरीज़ देखी हैं लेकि‍न गाइड उन सबसे परे है। कृष्‍ण के सन्‍दर्भ में जि‍स अलौकि‍क प्‍यार की व्‍याख्‍या की जाती है, कुछ-कुछ वैसी ही।
राजू (देवानंद) जेल से बाहर नि‍कलता है और अतीत के साये उसे घेर लेते हैं। जहां एक प्रौढ़ पति‍, जि‍सकी पत्‍नी उसके लि‍ए सजावटी समान से ज्‍यादा नहीं। एक पत्‍नी(वहीदा रहमान) जो आजाद होने के लि‍ए छटपटाती रहती है, लेकि‍न जब वही पत्‍नी, प्रेमि‍का बनती है तो खुद को पूर्ण मानने लगती है। प्रेमी का साथ, जि‍सकी कामयाबी का रास्‍ता बन जाता है। एक प्रेमी, जि‍सके लि‍ए प्‍यार ही सबकुछ है। प्‍यार के लि‍ए उसका संघर्ष, उसकी तड़प, उसकी मजबूरी दि‍ल को कचोटती हैं। मन करता है कि‍ कब राजू के पास पहुंच जाएं और सबकुछ ठीक कर दें। अन्‍त में ना तो उसके पास प्‍यार बचता है और ना ही कुछ और......। गाइड एक ऐसी ही फिल्म है जिसमें प्रेमरोमांसधोखा और त्याग- सभी कुछ है। 
पहली बार कोई समीक्षा कर रही हूं... अपने स्‍तर पर सोचती हूं कि‍ समीक्षा का आधार कहानी बताना नहीं होना चाहि‍ए, क्‍योंकि कहानी को कि‍स रूप में लेना है ये दर्शक पर निर्भर करता है। समीक्षा, चाक पर बन रहे बर्तन सी होनी चाहि‍ए। जि‍सका अंति‍म आकार कुम्‍हार (दर्शक) तय करे। समीक्षा को, मॉडल जैसा होना चाहि‍ए, जि‍से पढ़कर आप आसानी से थ्‍योरी गढ़ सकें।
यादगार लम्‍हे: फि‍ल्‍म देखने के कई घण्‍टों तक राजू की याद सताती रही, रोजी की वजह से ताने सुनता राजू, मामा से उसका संघर्ष, मां को मनाना, उसकी हताशा और सबकुछ खो देने के बाद उसका खुद को भी खो देना। सबकुछ आंखों के आगे घूमता रहा और अंत उससे भी दुखद। अंत में, राजू के पास सबकुछ आता है जि‍सकी कभी उसने ख्‍वाहि‍श की थी, मां, प्रेयसी, यश, धन, सबकुछ। लेकि‍न अब जबकि‍ उसकी सारी इच्‍छाएं पूरी हो सकती थीं तो मन में कोई इच्‍छा ही शेष नहीं रह जातीगाइड का र्नि‍वाण होता है। कुछ सीन अपने आप में बेमि‍साल हैं....
रेलवे कैंटीन पर अपनी मि‍ल्‍कि‍यत को लेकर राजू का संघर्ष, रोजी को नृत्‍य के लि‍ए प्रेरि‍त करने वाले दृश्‍य, रोजी के हक के लि‍ए लड़ता राजू, प्‍यार के लि‍ए हर तरह की कुर्बानी के लि‍ए तैयार राजू, प्रेमी-प्रेमि‍का के बीच उपजा दर्द; राजू कहता है.. जि‍न्‍दगी भी एक नशा है दोस्‍त, जब चढ़ता है तो पूछो मत क्‍या आलम रहता है और जब उतरता है.... और उसके बाद ये गाना- दि‍न ढ़ल जाए, रात न जाए...... और अंत में राजू का आत्‍म-साक्षात्‍कार। फि‍ल्‍म के गाने, कहानी के साथ-साथ चलते हैं, हर गीत एक फेज़ के साथ सामने आता है और अपनी धाक जमाता है।
प्रेम के अथाह सागर में डूबती, उतराती फि‍ल्‍म में एक मोड़ ऐसा आता है जब प्रेम खो जाता है, बचता है तो केवल दर्शन... कि‍ क्‍या पाना था और हम कि‍सके लि‍ए भागते जा रहे थे और इसका एहसास तब होता है जब हम उस तथाकथि‍त मंजि‍ल पर कदम रखते हैं जहां अपनी मर्जी ही बेइमानी लगने लगती है। अन्‍त में राजू भी कुछ ऐसा ही महसूस करता है... जि‍से दि‍ल की रानी बनाना था उसे दुनि‍या की रानी बनाने नि‍कल पड़े, जो पाना था उसे ही खो दि‍या, जि‍से पाकर इतरा रहे थे, असल में वही तो गंवा दि‍या है...’’
फि‍ल्‍म में अगर प्रेम है, दीवानापन है तो परंपराओं की कठोरता भी है। फि‍ल्‍म हर क्षेत्र में सर्वश्रेष्‍ठ है।
....तो ये थी मेरी समीक्षा, फि‍ल्‍म गाइड के लि‍ए। वर्तमान में अधि‍कतर समीक्षकों को पैसा खि‍लाकर फि‍ल्‍म के लि‍ए अच्‍छे-अच्‍छे कमेंट्स की बुकिंग की जाती है ताकि‍ मुनाफा बढ़े लेकि‍न ये समीक्षा बस इसलि‍ए कि‍ अगर आपने अब तक इस मास्‍टरपीस को नहीं देखा है तो जरूर देखि‍ए। भावनाओं की असीमि‍तता का नाम है गाइड।

                                                                                                       

Sunday, August 28, 2011

राखी सावंत से कम नहीं हैं ये.....

बचपन में राजनेताओं के नाम और उनके काम में कोई खास दि‍लचस्‍पी नहीं थी, खेलने-कूदने से फुर्सत ही कब रहती थी कि‍ कुछ और याद रहे। लेकि‍न उस वक्‍त भी लालू प्रसाद यादव का नाम याद था। पता था कि‍ आप बि‍हार के राजा हैं और इसके पीछे कारण बहुत ही सहज था, घरवाले जब भी राजनीति‍ से जुड़ी बातें कि‍या करते तो अक्‍सर लालू का जि‍क्र करके कोई कि‍स्‍सा सुना देते या फि‍र उनकी तथाकथि‍त बेबाकी पर हंसने लगते। कभी-कभी ये नाम इसलि‍ए भी सुनाई देता कि‍ तमाम घोटालों में संलि‍प्‍त होने पर भी वो मुख्‍यमंत्री थे, जेल में थे लेकि‍न बीवी को तैनात कर रखा था। कुछ इन्‍हीं तरह की बातों से लालू प्रसाद यादव का नाम मस्‍ति‍ष्‍क रूपी कागज पर उस वक्‍त से ही छप गया जब मैने राजनीति‍ शब्‍द को जोड़-जोड़कर पढ़ना शुरू कि‍या था।
उसके बाद स्‍कूल और फि‍र कॉलेज में आ गए, समझ बढ़ी, दायरा बढ़ा और राजनीति‍ की इकाई समझ आने लगी। इस वक्‍त तक कई राजनेताओं के नाम के बाद जी का सम्‍बोधन करने लगी तो कुछ के नाम के साथ उन तमाम शब्‍दों का जो अब राजनीति‍ज्ञों के पर्यायवाची (देशद्रोही, पापी, चोर, भ्रष्‍ट...आदि‍) बन चुके हैं। खैर लालू प्रसाद यादव का नाम कभी भी राजनीति‍ज्ञों की सूची में नहीं रख सकी, क्‍योंकि‍ जब भी इस नाम का जि‍क्र होता, कोई यार-दोस्‍त उनके ऊपर गढ़ा गया चुटकुला सुनाने लग जाता या फि‍र कोई कि‍स्‍सा लेकर बैठ जाता।
इन सबके बीच एक दौर ऐसा भी आया जब वो रेलवे वि‍भाग सम्‍भालते हुए मैनेजमेंट गुरू बन बैठे और देश से लेकर वि‍देश तक घूम-घूमकर शि‍क्षा देने लगे, खैर ये दौर भी बीतते देर नहीं लगी और उसके बाद लालू कहीं खो से गए। चुनावो में मि‍ली करारी हार भी कहीं ना कहीं उनकी चुप्‍पी का कारण बनी।
लेकि‍न आज एक लम्‍बे समय बाद लालू को सदन में बोलते देखा और आज उन पर और उनकी बातों पर हंसी आने के बजाय, उनकी सोच पर तरस आ रहा था। लालू प्रसाद ने सदन में बजाय इसके कि अन्‍ना के प्रस्‍ताव पर कोई राय दें, देश के लि‍ए कुछ सोचें, कुछ सुझाव दें इस बात पर खींस नि‍पोरते दि‍खे कि‍ कोई 74 साल का आदमी 12 दि‍न का अनशन कर कैसे सकता है, और कैसे कह सकता है कि‍ अभी मैं 3 कि‍मी तक और दौड़ सकता है। लालू प्रसाद जी इन बातों को कि‍सी मजाक की ही तरह सदन में अभि‍व्‍यक्‍त कर रहे थे। कि‍सी सदस्‍य ने जब पूछा कि‍ क्‍या ये इतना जरूरी वि‍षय है तो लालू जी ने झट से जवाब दि‍या कि‍ हां ये बहुत जरूरी टॉपि‍क है। हम नेता लोगो को ये पता करना चाहि‍ए कि‍ कोई ये सब कैसे कर सकता है। हम नेता लोगों को उनसे ट्रेनिंग लेनी चाहि‍ए और डॉक्‍टरों को उन पर रि‍सर्च करना चाहि‍ए। हालांकि‍ इस बात पर उनके सहयोगी भी खूब दांत चीयार रहे थे लेकि‍न क्‍या ये अन्‍ना का अपमान नहीं है? अन्‍ना ही क्‍या ये उस तपस्‍या का भी अपमान ही है जो भारत की जनता पि‍छले 12 दि‍नों से कर रही है और साथ ही ये सदन का भी अपमान ही था।
सदन में आज लालू प्रसाद को सुनकर पहला ख्‍याल बस यही आया कि‍ राजनेताओं और राखी सावंत में कोई खास फर्क नहीं रह गया है। वो भी अनाप-शनाप बोलकर पब्‍लि‍सि‍टी बटोरते हैं और ये भी कुछ ऐसा ही करते हैं। ना तो इन्‍हें देश से मतलब है और ना ही देश के लि‍ए लड़ने वालों से, मतलब है तो सिर्फ अपनी कुर्सी से। खैर लालू प्रसाद ने जो करना था और कहना था वो कर-कह चुके लेकि‍न अगर वो अन्‍ना से कुछ पूछना ही चाहते हैं तो ये जरूर पूछें कि देश उनके लि‍ए क्‍या है... भारत मां, जि‍सकी इज्‍जत से हम सबकी इज्‍जत है या बस एक जमीन का टुकड़ा, जि‍से कोई भी कभी भी लूट सकता है......।

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