Saturday, September 10, 2011

सभ्‍य समाज का नंगापन दि‍खाती -बैंडि‍ट क्‍वीन

कि‍सी रहस्‍य से कम नहीं थी ये फि‍ल्‍म मेरे लि‍ए। रहस्‍य इसलि‍ए भी की, बचपन से ही सुना की ये फि‍ल्‍म झकझोर कर रख देती है। चर्चा के दौरान, आम फि‍ल्‍मों से परे बेहद दबी ज़ुबान में, कुछ अलग ही तरीके से इस फि‍ल्‍म पर बातें होतीं.... और अगर हम बच्‍चे देखने को कहते तो हमें डांट, टाल दि‍या जाता। लेकि‍न उत्‍सुकता हमेशा रही कि‍ आखि‍र ऐसा क्‍या है इस फि‍ल्‍म में जि‍सके बारे में बात करते ही लोगों के स्‍वर बदल जाते हैं।
आज घर पर इच्‍छा जताई कि‍ बैंडि‍ट क्‍वीन देखनी है, और सबने कहा देख लो। बहुत नॅार्मल रि‍एक्‍शन था सबका... जबकि‍ मुझे लगा था कि‍ बचपन की तरह आज भी टाल दि‍या जाएगा। खुशी भी थी कि‍ हमेशा बच्‍ची समझने वाले आज बड़ा समझ रहे हैं। अगले ही दि‍न सीडी खरीद लाई, रास्‍ते में उसे कुछ छि‍पाने वाले अंदाज़ में ही लेकर आई, ये बचपन की उन बातों का ही असर था। घर आकर फि‍ल्‍म देखने बैठ गई।
फि‍ल्‍म शुरू होती है और एक छोटी सी लड़की फूलन गाली के साथ अपना परि‍चय देती है.. मैं ही फूलन देवी हूं भैनचो....चुरकी खड़ी हो गई। लेकि‍न जैसे जैसे फि‍ल्‍म आगे बढ़ी समझ आने लगा कि‍ ये फि‍ल्‍म आंखों से देखनेभर वालों के लि‍ए नहीं है। ये फि‍ल्‍म आंखों से दि‍ल और दि‍ल से दि‍माग़ में उतारने के लि‍ए है।
पहले दृश्‍य में दि‍खाई गई नावें फूलन और मल्‍लाह जाति‍ के बीच के सम्‍बन्‍ध को दि‍खाने के लि‍ए पर्याप्‍त है और फूलन का मल्‍लाह होना फि‍ल्‍म का सबसे खास बि‍न्‍दु है। फूलन अपने पहले डायलॉग के बाद, रास्‍तेभर अपनी सखी को मां-बहि‍न की गालि‍यों की जानकारी देती जाती है। लेकिन छोटी सी फूलन को गाली का मतलब नहीं पता... कहती है अच्‍छा ही होएगो। और कहे भी क्‍यों ना.. बाबा, गांव के बड़े, ठाकुर सभी को इसी तरह की बातें करते सुन जो रखा है, उसने।
इस छोटे से लेकि‍न अनोखे परि‍चय के बाद बाल-वि‍वाह का घि‍नौना रूप दि‍खता है। जहां फूलन को, उससे तीन गुनी उम्र के आदमी के साथ महज एक बूढ़ी गाय और पुरानी साइकि‍ल के बदले ब्‍याह दि‍या जाता है, बाप को डर है कि‍ कहीं मोड़ी मुंह ना काला करवा दे, सो जल्‍दी से जल्‍दी ब्‍याह दि‍या।
अगले दृश्‍य में, बन्‍द कमरे में मार खाने के बाद पति‍ का एकालाप.... अभी कच्‍ची है, कब हरि‍आएगी तू... और फि‍र उस छोटी सी बच्‍ची के साथ सांकेति‍क रूप में दि‍खाया गया बलात्‍कार.. दहशतभरी चीखों के बाद फूलन का मासूमि‍यत से कहना कि‍ दर्द हो रहा है.. दि‍ल में टीस पैदा करता है। और फि‍र एक दि‍न उस माहौल से भाग जाना...।
पर अच्‍छाई के लि‍ए कहीं भी नहीं है इस फि‍ल्‍म में..। फूलन मायके आ जाती है, लेकि‍न पति‍ की सताई हुई बेटी बनकर नहीं, कलंक बनकर, बोझ बनकर, पि‍हरकाटो बनकर। और इन्‍हीं सबके बीच छोटी सी फूलन, जवान हो जाती है। लेकि‍न पूरी फि‍ल्‍म में आपको उसका जवान होना, श्राप सा ही लगता है।
गांव के लड़को के लि‍ए वो नदी-सी है, जि‍समें वो जब दि‍ल करे फब्‍ति‍यों के कंकण मार सकते हैं। सरपंच के बेटे को तरजीह ना देने पर फूलन को पंचायत में खड़ा कर दि‍या जाता है, जहां एक से बढ़कर एक घटि‍या शब्‍द के साथ फूलन की इज्‍जत उछाली जाती है। साथ ही एक बाप की कमजोरी और छोटी जाति‍ की मजबूरी, दि‍खाई देती है। गांव से चले जाने के आदेश के साथ ही शुरू होता है एक नया अध्‍याय।
इसके बाद ही फूलन डाकुओं के हाथ पड़ जाती है और शुरू होता है, यातनाओं और चीखों का एक लम्‍बा प्रकरण। बाबू गुजर, द्वारा फूलन का बलात्‍कार खौफ पैदा कर देता है। साथ ही वि‍क्रम मल्‍लाह की सहानुभूति, जो प्रेम कम दैहि‍क आकर्षण ही ज्‍यादा है लेकि‍न फि‍र भी सच्‍चा है। वि‍क्रम को टांग में गोली लगना, फूलन द्वारा उसकी सेवा करना, उनका प्‍यार और एक-दूसरे के साथ खुश रहना, थोड़े वक्‍त के लि‍ए सुकून देता है। लेकि‍न फि‍र वि‍क्रम मल्‍लाह की मौत....फूलन के दुर्भाग्‍य के चरम को न्‍यौता देती है। पुलि‍स कस्‍टडी में उसका शोषण, जमानत कराने वाले ठाकुरो द्वारा सामूहि‍क बलात्‍कार और नंगा करके पूरे गांव में घुमाए जाने के दृश्‍य आपको पत्‍थर बना देते हैं।
और उसके बाद... एक नई शुरूआत। डकैत फूलन का बदला। वास्‍तवि‍क जि‍न्‍दगी में फूलन देवी को इसी कारण जेल जाना पड़ा लेकि‍न रील लाइफ में फूलन को ऐसा करते देख सचमुच बहुत खुशी होती है, कि‍ कैसे एक चूर-चूर हो चुकी औरत खुद को बटोरकर एक बार फि‍र खड़ी होती है।
फि‍ल्‍म का अंत बहुत कुछ कहता है। फूलन का आत्‍मसमर्पण और लोगों का उसकी जय जयकार करना, वि‍स्‍मय पैदा करता है कि‍ क्‍या ये वही लोग हैं जो हमेशा गूंगे रहे.. आज खुलेआम दस्‍यु सुन्‍दरी की जय-जयकार कर रहे हैं..। क्‍या ये फूलन के साथ हैं... औ अगर थे तो ये सब क्‍यों होने दि‍या.... बहुत कुछ।
फि‍ल्‍म देख ली लेकि‍न आज भी इसे अच्‍छे और बुरे में से कि‍स श्रेणी में रखूं, समझ नहीं आ रहा। एक्‍टिंग, डाइरेक्‍शन, संवाद हर ऐंगल से फि‍ल्‍म बेहतरीन है और वि‍षय के आधार पर बेहद संवेदनशील। लेकि‍न फि‍ल्‍म देखकर समाज से डर लगने लगा, शायद ही कभी इसे दुबारा देखने की हि‍म्‍मत कर सकूं।
फि‍ल्‍म से जुड़े तमाम तथ्‍य पढ़े जि‍समें ये लि‍खा था कि‍ ये फि‍ल्‍म दर्शकों के बीच नहीं जानी चाहि‍ए, ये गलत है वो गलत है.. कई संस्‍थाओं ने तो कोर्ट तक में इसे खींचा लेकि‍न ये शेखर कपूर की हि‍म्‍मत ही थी जो फि‍ल्‍म रीलि‍ज़ हुई और एक छि‍पी हुई सच्‍चाई सामने, पर्दे पर आई।
शेखर कपूर ने उस वक्‍त एक कवि‍ता लि‍खी, जो फि‍ल्‍म की सार्थकता जताने के लि‍ए थी....यह कवि‍ता 28 अगस्‍त 1994 के टाइम्‍स ऑफ इंडि‍या में प्रकाशि‍त हुई थी-
शीर्षक था- वेलकम टू द रि‍अल वर्ल्‍ड
अपनी एयरकंडीशनर कार में, शि‍ट स्‍ट्रीट से गुजरते हुए
अपनी खूबसूरत पोशाक और, बड़ी सी बिंदी पहनकर
अपनी गाड़ी के शीशे चढ़ाना मत भूलना
क्‍योंकि‍ इस गंदी सड़क की दुर्गन्‍ध, आप जैसों के लि‍ए नहीं है
यह उन औरतों के लि‍ए है, जो सड़क कि‍नारे बैठकर टट्टी करती हैं
इस शब्‍द से आपकी संवेदना को ठेस पहुंचती है
पर दूसरा कौन सा शब्‍द मैं इस्‍तेमाल करूं
आप जब अपने टाइल्‍स सजे, डि‍जाइनर टॉयलेट में बैठकर
हाथ में श्‍याम आहुजा के रंगो से सजे, तौलि‍ए लेकर यही करती हैं
तो उसे क्‍या कहते है
ये औरतें जो सड़क पर अपने शरीर के, सभी हि‍स्‍सों को उघाड़ते हुए
अपनी चि‍थड़े काली छतरी के पीछे, सिर्फ अपना चेहरा छि‍पा लेती हैं
और रासते से गुजरते ट्रैफि‍क से छि‍पने की, एक वयर्थ सी कोशि‍श करती हैं
तब आप कार के शीशे चढ़ाते हुए, अपना मुंह दूसरी ओर घुमा लेती हैं
ये दो अलग अलग तरह की दुनि‍या है
जो एक-दूसरे की उपेक्षा करने की भरपूर कोशि‍श करती है।
लेकि‍न कि‍से मालूम है, कि‍ आपके पैखाने से भी वही बदबू आती है
बेशक वह बोन चाइना के ट्यूब से होते हुए, आपकी अनछुई साफ अंगुलि‍यों के
एक झटके से, गटर की ओर बढ़ जाती हैं
फि‍र आप सोचते हैं कि‍
ये कौन है, जो यह सारी बकवास लि‍ख रहा है
क्‍या यह बैंडि‍ट क्‍वीन का डाइरेक्‍टर है, क्‍रूा वह सॅाफ्ट लेंस या फि‍ल्‍टर
इस्‍तेमाल नहीं कर सकता था
उसे क्‍या हक़ है हमें, इन गंदी नालि‍यों तक घसीट कर ले जाने का
हमारी नाक को दुर्गन्‍ध में दबाए रखने का, जब तक हमारा दम ना घुट जाए
और हम दूसरी दुनि‍या की सचचाई देखकर हांफने न लगे
              क्‍या यही कला है............शेखर कपूर
                                                 
फि‍ल्‍म के लि‍ए बस यही कि‍ यह उस कलात्‍मक मूर्ति‍ की तरह है जि‍से आर्ट गैलरी में रखें तो तारीफ मि‍ले, कला का बेहतरीन नमूना लगे और अगर इसी को चौराहे पर या तथाकथि‍त सभ्‍य समाज के बीच रख दें तो इसकी नग्‍नता को ढकने का मन करे।








Wednesday, September 07, 2011

रेडि‍यो की शक्‍ल इख्‍ति‍यार करता एनडीटीवी इंडि‍या

ज्‍योतिष नहीं जर्नलि‍स्‍ट की टीम के साथ करि‍ए दि‍न की शुरूआत.... कुछ वक्‍त पहले तक एनडीटीवी पर प्रमोशन के लि‍ए कुछ इसी तरह का स्‍लोगन सुनने को मि‍लता था। पर अब लगता है कि‍ खबरों के साथ जर्नलि‍स्‍ट की टीम भी एनडीटीवी से गायब हो चुकी है।
 खबरों की जगह झाड़-फूंक और तन्‍त्रमंत्र दि‍खाने वाले चैनलों की भीड़ में एनडीटीवी इंडि‍या ने रवीश की रि‍पोर्ट, वि‍नोद दुआ लाइव, जि‍न्‍दगी लाइव जैसे बेहतरीन प्रोग्राम दि‍खाकर एक बहुत बड़े वर्ग को अपना मुरीद बना लि‍या था। लेकि‍न फि‍लहाल ये चैनल की परि‍पाटी से हटकर रेडि‍यो की शक्‍ल अख्‍ति‍यार करता जा रहा है।
चैनल से शि‍कायत तो तभी शुरू हो गई थी जि‍स दि‍न, आम आदमी की तकलीफों को कैमरे पर लाने और हक़ दि‍लाने वाले प्रोग्राम रवीश की रि‍पोर्ट का अंति‍म एपि‍सोड घोषि‍त कि‍या गया था।
 रवीश प्राइम टाइम में आने तो लगे, लेकि‍न बतौर एंकर। कभी दि‍ल्‍ली के डि‍ब्‍बा घरों में साग-भात खाने वाले वाले रवीश आज, स्‍नो-पाउडर के साथ तथाकथि‍त बड़े लोगों के साथ बहसते, उनके झगड़ों को सुलझाते नजर आते हैं। एक बड़ा वर्ग (जि‍सकी सुनने वाला कोई नहीं) जो रवीश को अपनी आवाज समझने लगा था, आज फि‍र कट-सा गया है।
खैर रवीश की रि‍पोर्ट के बन्‍द होने का व्‍यक्‍ति‍गत तौर पर बहुत दुख है। लेकि‍न उससे ज्‍यादा दुख इस बात है कि‍ वर्तमान में चैनल के पास खबर नाम की कोई चीज़ ही नहीं रह गई है। जो ख़बर आप सुबह सुनेगें वही, रातभर चलती रहती है और एक लगातार...। इतनी ज्‍यादा रीपि‍टीशन की आपको याद हो जाए, वो भी वर्ड टू वर्ड।
पि‍छले कुछ दि‍नों से गौर कि‍या कि‍ लाइव प्रोग्राम के बदले चैनल पर रि‍कॉर्डेड प्रोग्राम का ही टेलीकास्‍ट ज्‍यादा कि‍या जा रहा है। आज इस गलतफहमीं को दूर करने के लि‍ए सबेरे 9 बजे से टीवी के आगे आंखे फाड़कर बैठी हूं लेकि‍न कि‍सी न्‍यूज प्रेज़ेंटर के दर्शन नहीं हुए, देववाणी तो गूंज रही है लेकि‍न अदृश्‍य रूप में। इंटरनेशनल एजेंडा में नग्‍़मा दि‍खी, लेकि‍न वो भी रि‍कॉर्डेड ही था। इसी बीच खबर आ गई कि‍ दि‍ल्‍ली हाई कोर्ट में बम-ब्‍लास्‍ट हो गया है... उम्‍मीद जगी कि अब तो दर्शन हो ही जाएंगे लेकि‍न घटनास्‍थल से रि‍पोर्टिंग कर रहे कुछ रि‍पोर्टर्स (आशीष भार्गव, हृदयेश जोशी...) के अलावा कोई नज़र नहीं आया।
कुछ-एक कार्यक्रमों को छोड़ दि‍या जाए तो लगभग सारा दि‍न यही हाल बना रहता है। स्‍टूडि‍यो से खबरों का खाका तैयार करने, रि‍पोर्टर्स और दर्शक के बीच मझौले का काम करने वाला कोई एंकर नहीं होता। ऐसे में कि‍सी चैनल को देख पाना कि‍सी बोझ सा लगने लगता है। जहां आप केवल कि‍सी की आवाज सुन रहे हों और वो आपको दि‍खे नहीं। पता करने की कोशि‍श की तो मालूम चला कि‍ ये चैनल का नया फॉर्मेट है, 20-20 बेस्‍ड। जि‍समें सबेरे से लेकर शाम तक खबरों को एक ही ढर्रे में चलाया जाता है। ये बदलाव भी, बाकी परि‍वर्तनों की तरह टीआरपी की दौड़ में आगे नि‍कलने के लि‍ए ही है पर ये दांव भी उल्‍टा ही पड़ता दि‍ख रहा है।
 कई बार दर्शक अपने चहेते ऐंकर भर को देखने-सुनने के लि‍ए ही टीवी के सामने बैठता है, ऐसे में प्रेज़ेटरर्स को कैमरे के पीछे रखना चैनल को और महंगा पड़ सकता है। टीआरपी अच्‍छी खबरों से बढ़ती है ना की इन बि‍न मतलब के हेर-फेर से।

Monday, September 05, 2011

अच्‍छा हुआ मीर, जो तुम चले गए.....


मीर तक़ी मीर पर लि‍खी एक कि‍ताब पढ़ रही थी। उसी में ये कि‍स्‍सा भी पढ़ा.... कि‍स्‍सा कुछ यूं है कि; मीर साहब कहीं जा रहे थे और उनके पास कि‍राए के पैसे नहीं थे। गाड़ीवान ने उनसे पैसे मांगे, तो उन्‍होंने कहा कि‍ मेरे पास पैसे नहीं है। इतने में एक दूसरे मुसाफि‍र ने, बड़ी उदारता दि‍खाते हुए मीर का कि‍राया दे दि‍या। मीर ने उसे धन्‍यवाद दि‍या और मुंह फेरकर बैठ गए। वो आदमी मीर से बातें करता रहा, जब काफी देर तक मीर ने कोई जवाब नहीं दि‍या तो वो चि‍ढ़ गया। बोला- एक तो मैंने तुम्‍हारे पैसे चुकाए, ऊपर से तुम ऐंठकर बैठे हो, जवाब तक नहीं दे पा रहे। ये सुनकर मीर ने उससे कहा कि मैं आपका एहसानमंद हूं जो आपने मेरे पैसे दि‍ये लेकि‍न माफ कीजि‍एगा आपकी ज़ुबान बहुत गन्‍दी है, आपको न तो शब्‍दों की पहचान है और ना ही उसकी पाबंदी का ज्ञान। मुझे डर है कहीं आपके साथ बात करके मेरी जबान भी, आप जैसी ही ना हो जाए और मीर दुबारा मुंह फेरकर बैठ गए।
पढ़कर लगा कि‍ एक वो दौर था, जब लोग अपनी ज़बान को लेकर कि‍तने सजग हुआ करते थे और एक आज का दौर है, जि‍समें आप जि‍तना फूहड़ बोलें उतने आधुनि‍क समझे जाते हैं। कॉलेज का चौथा-पांचवा दि‍न रहा होगा मेरा...लखनऊ से आई थी, तो दि‍ल्‍ली को समझना बस शुरू ही कि‍या था। कुछ बात हुई कि‍ मैं अपनी क्‍लासमेट को छोड़कर अकेले ही लंच करने आ गई। पीछे से वो आई तो उसने आते ही कहा; बड़ी हरामखोर है तू, हमें छोड़कर चली आई। उस दि‍न तो कुछ नहीं कहा लेकि‍न कुछ दि‍न साथ रहने के बाद ये महसूस कि‍या कि‍ जैसे; अरे यार या सुन यार का प्रयोग सम्‍बोधन में करते हैं, हरामखोर शब्‍द कुछ ऐसा ही है उसके लि‍ए। लेकि‍न ये जरूर कहा कि आगे से मुझे ये ना कहा करे, मुझे बुरा लगता है, बहुत हंसी थी वो मुझपर... कि‍ मुझे ये शब्‍द इतना बुरा लगता है जबकि‍ ये तो कि‍तना कॉमन है।
ऐसा नहीं था कि‍ इस तरह की गालि‍यां देने वाली वो अकेली थी, कुछएक को छोड़ ये शब्‍द सभी के लि‍ए बहुत कॉमन थे। दि‍ल्‍ली में रह रही हूं, तो यहीं की बातों का उदाहरण देना सही रहेगा, हो सकता है देश के अन्‍य भागों में इससे भी ज्‍यादा बेहूदगी से बात की जाती हो...। दि‍ल्‍ली में जहां भी दो-चार लड़के खड़े होकर बात कर रहे हों, आप बस वहां कुछ देर रूक तो जाइए... पांच मि‍नट के अन्‍दर वो मां-बहन से जुड़ी सारी गालि‍यां आपको रटवा देगें। असल में शायद ये रि‍वाज़ बन गया है कि‍ उनकी बात की शुरूआत ही गाली से कुछ इस तरह होती है कि...ओ तेरी...... की मैं जा रहा था तो बहन का.... मि‍ल गया, साले..... के पास क्‍या बाइक है इसी तरह के ना जाने कि‍तने फूहड़, बेहुदा शब्‍द उनकी बात से जुड़े होते हैं। और ताज्‍जुब तब, जब आपको ये पता चले कि‍ ये सारे शब्‍द उनके लि‍ए गाली हैं ही नहीं।
एक दोस्‍त दूसरे को मां-बहन की गाली देता है, तो वो इसे बहुत प्‍यार से स्‍वीकार करता है, और दोनों ऐसा दि‍खाते हैं कि कि‍तने जि‍गरी यार हैं। एक-दूसरे को गाली देना ही दोस्‍ती का पैमाना बन गया हो जैसे, जो जि‍तनी गाली दे वो उतना खास। और ये बात केवल बड़ों तक नहीं, छोटे-छोटे बच्‍चे भी पूरे फ्लो से मां-बहन की गाली देते हैं। मां-बाप के सामने देते हैं, और उन्‍हें कोई ऐतराज़ भी नहीं होता। वैसे वो ऐतराज़ कर भी नहीं सकते, क्‍योंकि‍ बच्‍चा सीखता वही है जो देखता है, सुनता है। लेकि‍न एक बात जरूर है कि‍ अगर इस वर्ग की अधि‍कता है, तो छोटा ही सही पर एक वर्ग अभी भी ऐसा है, जो जबान और शब्‍दों की कीमत समझता है।
मेरे एक सर ने गालि‍यों पर ही रि‍सर्च की है, दि‍ल्‍ली में ही रहते हैं। उन्‍होंने एकबार बताया था कि गालि‍यां सुनकर या अपमानजनक बातें सुनकर हमारे शरीर में एक वि‍शेष प्रकार के हार्मोन का रि‍साव होता है, जि‍सकी वजह से हम अपना आपा खो देते हैं। और रही बात मां-बहन की गालि‍यों की तो मां-बहन घर की इज्‍जत होती हैं और अगर कोई उन्‍हें लेकर गाली बके, तो ये भाव ज्‍यादा उग्र हो जाते हैं। लेकि‍न उनकी बात कभी सच नहीं लगी, क्‍योंकि‍ यहां तो लोग खुशी-खुशी मां-बहन की गाली देते और सुनाते हैं।
बहुत सोच-वि‍चार के बाद यही तय कि‍या कि‍, अच्‍छा है आज मीर ज़ि‍न्‍दा नहीं हैं तो बेचारे गूंगे-बहरे की तरह जि‍न्‍दगी बि‍ता रहे होते और मुंह फेरकर भी खुद को बचा नहीं पाते।

Sunday, September 04, 2011

आए थे हरि‍-भजन को.. ओटन लगे कपास....

ये तस्‍वीर कबाड़ बटोरने वाले बच्‍चों से आग्रह करके खींची है। घर की बालकनी से नीचे देखा तो 6-7 कूड़ा बीनने वाले बच्‍चे झुण्‍ड बनाकर कुछ कर रहे थे। घर से नि‍कले तो होगें कूड़ा बीनने लेकि‍न कोई कूड़ा नहीं बीन रहा था। कोई फूल तोड़कर ला रहा था तो कोई चि‍पकउवा। चि‍पकउवा, यही नाम पता है इस खर-पतवार का। बचपन में दूसरों पर फेंककर मज़े लि‍या करते थे, टोकरी भी बनाते थे लेकि‍न इतना सुन्‍दर घर ...कभी नहीं बनाया। इस तस्‍वीर को देखकर एक ही गाना याद आया..; देखो मैंने देखा है ये इक सपना, फूलों के शहर में हो घर अपना....। वाकई उन बच्‍चें के सपनों का घर ही है ये....

घर के पीछे का हि‍स्‍सा...गत्‍ते की नींव पर खड़ा है ये महल


ये है, दो मंज़ि‍ला घर का मुख्‍य द्वार

                                           
                                                        घर की हि‍फ़ाजत के लि‍ए तैनात हैं तीनों


                                        छोटी सी सुल्‍ताना ने ही बनाया है, सपनों का ये महल


और ये रहा पड़ोसी फ़ाति‍मा का बंगला


                                                          सपनों के घर के बाहर बि‍खरा मलबा              

                               
                                                   लो जी पड़ोसी का घर भी बनकर तैयार हो गया

                                     
                                             और ये हैं इस घर के सदस्‍य, ए हैप्‍पी फैमि‍ली....

बालकनी से इन बच्‍चों को देखकर रूक नहीं सकी, हाथ में कैमरा लेकर नीचे पहुंच गई। आफताब से आग्रह कि‍या, क्‍या मैं तुम्‍हारे घर की फोटो ले लूं.... खुश हो गया, बोला ले लो और मेरी भी लो। बाकी दोस्‍तों को भी बुला लाया।फोटो ले ली और दि‍खा भी दी। थोड़ी दूर फ़ाति‍मा का घर भी बन रहा था लेकि‍न वो फोटो में कहीं भी नहीं है। बहुत शर्मा रही थी, बि‍ल्‍कुल नई-नवेली दुल्‍हन की तरह उसने दोनों हाथों से अपना चेहरा छि‍पा लि‍या। आफताब ने पूछा घर में लगाओगी.... मैने कहा नहीं कम्‍प्‍यूटर पर लगाउंगी। बोला बड़ा में लगाना।
फोटो खींचकर घर आ गई। बहुत देर तक इन तस्‍वीरों को देखती रही। बार-बार यही सोचती रही कि कि‍तना हुनर है इन हाथों में लेकि‍न कोई कद्र नहीं है... कूड़ा बीनने को मजबूर हैं ये। यही सारे हुनर बड़े घराने के बच्‍चे पैसे देकर स्‍पेशल क्‍लासेज में सीखते हैं और अगर कुछ बना लि‍या तो मां-बाप प्रदर्शनी लगवाकर बच्‍चे को हीरो बना देते हैं। लेकि‍न यहां कोई नहीं है इस कला को देखने वाला....। लेकि‍न खुशी इस बात की हुई कि ये बच्‍चे सपने देखते हैं....और ये हक़ उनकी बद्कि‍स्‍मती भी उनसे नहीं छीन सकती और कहते हैं ना कि कुछ करना है और तो सपने देखना बहुत ज़रूरी है... ...बस यही चाहती हूं कि‍ इनके रंगीन सपने सच हो जाएं और ये भी आम बच्‍चों की तरह अपनी जि‍न्‍दगी बि‍ताएं।

मेरा पहला ऑडि‍शन...

कि‍ताबें, इन्‍सान की सबसे अच्‍छी दोस्‍त होती हैं....सास बहू के झगड़े की तरह ये वाक्‍य भी हर घर में बहुत कॉमन है। बच्‍चा जोड़-जोड़कर पढ़ना शुरू करता नहीं कि‍ घरवाले कि‍ताबों को दोस्‍त बनवाने की जुगत में लग जाते हैं। ओला-पानी, वि‍ष-अमृत और चि‍प्‍पी खेलने की उम्र में कोई भला कि‍ताबों को दोस्‍त बनाए भी तो कैसे ?
सारी कवायद बस इसलि‍ए कि‍ बच्‍चा खूब पढ़े, अव्‍वल आए और बुरी संगत से बचा रहे। इस पर भी न माने तो इस बात को कि‍सी महान आदमी से जोड़कर एक नया कि‍स्‍सा तैयार कर दि‍या जाता, जि‍समें उसका फंसना लगभग तय ही होता है। मां, ऐसी ही सेंटी बातें करके पढ़ने को कहतीं, पर छूट थी कि‍ कोई भी कि‍ताब पढ़ सकते थे जरूरी नहीं कि‍ कोर्स की ही हो, कम से कम उच्‍चारण तो ठीक हो। उस वक्‍त उच्‍चारण, बस पढ़ने तक ही सीमि‍त था, उसकी शुद्धता कोई मायने नहीं रखती थी मेरे लि‍ए।
स्‍कूलिंग खत्‍म करके दि‍ल्‍ली आई, यहां पहली बार उर्दू ज़बान से पाला पड़ा और तभी नुख्‍़ते से भी रिश्‍ता जुड़ा। इससे पहले कभी ये समझ नहीं आता था कि‍ सफर और सफ़र में क्‍या अंतर है, या फ़ूल और फूल कैसे अलग हैं। जब नुख्‍़ते की समझ आई तो पता चला कि‍ कि‍तना अशुद्ध बोला करती थी। अक्‍सर ऐसा होता है कि‍ हम हर शब्‍द के साथ नुख्‍़ता लगा देते हैं, को कहना हमें बहुत प्रभावी लगता है, ना कोई नि‍यम ना कोई पाबंदी।
रेडि‍यो का ऑडि‍शन था, सामान्‍य ज्ञान की लि‍खि‍त परीक्षा पास कर चुकी थी। इस प्रोफेशन में बोलने के ही पैसे मि‍लते हैं, लेकि‍न शुद्ध और भाव के साथ, बोलने के। ऑडि‍शन के लि‍ए, सभी को कुछ लाइनें दी गई थीं, जि‍से माइक पर बोलना था। मेरा मैटर कुछ ऐसा था, श्‍याम संग सुन्‍दर राधा, बाग़ में फल-फूल के बीच आंख-मि‍चौली खेल रही थी, कि‍ तभी, शासन के मद में डूबा शाश्‍वत वहां आ धमका। तीन-चार बार पढ़ा और तब तक मेरा नम्‍बर आ गया, ऑडि‍शन हुआ और फेल हो गई लेकि‍न उस दि‍न उच्‍चरण की कमी पता चली। अमूमन हम फल-फूल को फ़ल-फ़ूल ही बोलते हैं, शासन को शाशन और ना जाने क्‍या-क्‍या गलत बोलते रहते हैं। इन्‍हीं कुछ एक दो शब्‍दों की भारी गलती की वजह से उस सेशन में डि‍स्‍क्‍वालीफ़ाई हो गई।
लेकि‍न पता नहीं कब और कैसे उच्‍चारण को लेकर बहुत सजग हो गई, इस बीच बहुत सी नई बातें भी पता चली। जैसे; क़ानून और कानून के बीच का फ़र्क। जि‍समें एक का मतलब तो लॉ है जबकि‍ दूसरे का चूल्‍हा। इसी तरह कलम, गलत शब्‍द है असल में क़लम सही शब्‍द है। ऐसे हजारों शब्‍द मि‍ले जि‍नका उच्‍चारण गलत करती आई थी। कुछ ऐसे भी मि‍ले जि‍न्‍हें सही बोलने के चक्‍कर में गलत बोलती थी। जारी सही शब्‍द है लेकि‍न उसे प्रभावी बनाने के लि‍ए ज़ारी कहा करती थी। नमस्‍कार को नमश्‍कार कहा करती थी। इसी बीच जन और ज़न के बीच का भी अन्‍तर पता चला...।
उच्‍चारण में सुधार करने में सबसे ज्‍़यादा मदद की, महकता आंचल ने। महकता आंचल, तरह-तरह की प्रेम कथाओं और मि‍यां-बीवी के रि‍श्‍तों का बेहद नाटकीय संग्रह। कहानि‍यां इतनी झूठी कि कई बार हंसी आ जाती थी लेकि‍न वाकई उसे पढ़कर ज़ुबान बहुत साफ़ हो गई।
3 महीने बाद फि‍र ऑडि‍शन दि‍या और सेलेक्‍ट हो गई, सेलेक्‍शन टीम, कमी और अच्‍छाई बता रही थी। मेरे लि‍ए कहा कि‍ आवाज़ को भारी करो, बच्‍चों जैसी लगती है लेकि‍न उच्‍चारण ठीक है। ये कॉम्‍प्‍लीमेंट मेरे लि‍ए बहुत खास था और अब कोशि‍श करती हूं कि‍ सही ही बोलूं।

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