Wednesday, September 14, 2011

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल  
 बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल ।  

 अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन 
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन ।

 उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय 
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय ।  

  निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
 लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय ।   

   इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग 
बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग ।   

और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात
 निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात । 

  तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो को
य यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय ।

     विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
 सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार ।

  भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात
 विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात । 

 सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय 
         उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय ।    

                                                                                          भारतेन्‍दु हरि‍श्‍चनद (साभार:कवि‍ता कोष)

अंग्रेजी को कोसकर हि‍न्‍दी का वि‍कास सम्‍भव नहीं...


फेसबुक से लेकर तमाम मीडि‍या पोर्टल हि‍न्‍दी दि‍वस की शुभकामनाओं से पटे पड़े हैं। तरीका सबका अलग है, कि‍सी ने राष्‍ट्रध्‍वज पर लि‍ख रखा है तो कि‍सी ने भारत के नक्‍़शे के साथ। लेकि‍न तमाम दि‍खावटी वि‍षमताओं से इतर इन लेखों में भावनात्‍मक और शाब्‍दि‍क समानता भी है।
सभी ने जमकर अंग्रेजी को गालि‍यां लि‍ख रखी हैं...कई ने तो अंग्रेजी बोलने वालों को भी। औसतन हर लेख में अंग्रेजी को दुत्‍कार कर, कोसकर, हि‍न्‍दी को श्रेष्‍ठ बताने और बनाने का प्रयास कि‍या गया है। कुछ ने कसमें भी खा ली हैं कि‍ वो आज से हि‍न्‍दी ही ओढ़ेगें और हि‍न्‍दी ही बीछाएंगे और ऐसी ढ़ेरो बातें......।
वैसे ये सबकुछ पहली बार नहीं है, सो ज्‍यादा अचरज नहीं हुआ। लेकि‍न हर बार वही फण्‍डा; अंग्रेजी को नीचा दि‍खाओ, हि‍न्‍दी का कद बढ़ाओ। लकीर को छोटा दि‍खाने के लि‍ए, बड़ी लकीर खींचने का बीड़ा कि‍सी ने नहीं उठाया। दो बात कहना चाहती हूं... पहली तो ये कि‍ हि‍न्‍दी का वि‍कास अंग्रेजी को कोसकर, नहीं हो सकता। जो लैंग्‍वेज यूनीवर्सल हो, आप उससे मुंह नहीं मोड़ सकते। दूसरी ये कि अंग्रेजी तो फि‍र भी बाहरी भाषा है, लेकि‍न हि‍न्‍दी को जि‍तना खतरा देश की अन्‍य उप-भाषाओं और बोलि‍यों से है उतना अंग्रेजी से भी नहीं।
आज हि‍न्‍दी के सामने हि‍न्‍दी वाले ही दीवार बनकर खड़े हो गए हैं, क्षेत्रवाद का समर्थन करने वाले, संकीर्ण मानसि‍कता वाले हि‍न्‍दी को आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं, पूरे जोर-शोर से ताल ठोंककर इसे बि‍खेरने का प्रयास कि‍या जा रहा है।
हि‍न्‍दी को राजभाषा बनाए जाने का सबसे प्रमुख कारण यही था कि‍ हि‍न्‍दी देश के अधि‍कांश भू-भाग पर बोली और समझी जाती है ना की इसकी प्राचीनता के कारण। प्राचीनता के आधार पर तो कइ ऐसी भाषाएं और बोलि‍यां हैं जो हि‍न्‍दी से भी पुरानी हैं(संस्‍कृत) लेकि‍न हि‍न्‍दी की सरलता और व्‍यापकता के चलते ही इसे राजभाषा का दर्जा दि‍या गया।
भारत एक वि‍शाल देश है और भारत में वि‍वि‍धता का अन्‍दाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है भारतीय संवि‍धान की आठवीं अनुसूची में 22 प्रमुख भाषाएं हैं, और प्रत्‍येक भाषा की उपभाषा और बोलि‍यां हैं। हि‍न्‍दी भी कई बोलि‍यों और उप भाषाओं का समूह ही है। भारतीय जनगणना में मैथि‍ली, मगही, भोजपुरी, जयपुरी, मेवाती, मालवी, गढ़वाली, कुमाऊंनी, खड़ी बोली, हरि‍याणवी, ब्रज, बुंदेली, कन्‍नैजी, अवधी, बघेली और छत्‍तीसगढ़ी बोलि‍यों की गणना हि‍न्‍दी की उपभाषा के रूप में की गई है। 2001 की जनगणना के आधार पर 48 से अधि‍क बोलि‍यों और भाषाओं को हि‍न्‍दी के अर्न्‍तगत रखा गया।
स्‍पष्‍ट हो जाता है कि‍ हि‍न्‍दी का वि‍कास काफी हद तक बोलि‍यों और उपभाषाओं के वि‍कास पर र्नि‍भर करता है लेकि‍न वर्तमान में ये संवर्धन के स्‍थान पर वि‍घटन का कारण बनती जा रही हैं।
छोटी मानसि‍कता और राजनीतिक लाभ के चलते हि‍न्‍दी आज बि‍खरने की कगार पर है। कभी कोई भोजपुरी को लेकर खड़ा हो जाता है तो कभी कोई और...। वर्तममान में भोजपुरी को स्‍वतंत्र भाषा के रूप में आठवीं अनुसूची में स्‍थान दि‍ये जाने की मांग की जा रही है। भाषा ही नहीं कई तो अलग भोजपुरी राज्‍य की भी मांग करने लगे हैं। महाराष्‍ट्र में मराठा मानुष और मराठी को लेकर जो भी कुछ हुआ वो आप-हम बखूबी जानते हैं। मैथि‍ली को आठवी अनुसूची में शामि‍ल कर लि‍या गया है और अब राजस्‍थान प्रान्‍त के लोग भी इसी होड़ में लगे हुए हैं।
एक लम्‍बे समय से हि‍न्‍दी, अंग्रेजी से संघर्ष करती आई है, सफल इसलि‍ए हुई कि‍ इसको अपनाने वाले बहुतायत में थे। लेकि‍न शायद अब ये दावे झूठे साबि‍त हो जाएं और हि‍न्‍दी क्षेत्र की भाषा बनकर ही रह जाए।
आज इन बोलि‍यों और उप-भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामि‍ल करने की मांग की जा रही है, कल अन्‍य उप-भाशएं और बोलि‍यां भी करेंगी, ऐसे में हम हि‍न्‍दी को कहां रख पाएंगे...जि‍स तरह अंग्रेजों ने फूट डालकर राज्‍यों को अलग कर देश पर कब्‍ज़ा कर लि‍या था, ये कुछ कुछ वैसा ही है।
अन्‍य उप-भाषाओं और बोलि‍यों को अनुसूची में भाषा के रूप में स्‍वीकार करने के परि‍णाम बेहद बुरे होंगे इससे हि‍न्‍दी की व्‍यापकता पर सवाल खड़े हो जाएगा। दूसरे की संघ की परि‍क्षाओं से लेकर स्‍कूल तक मे अंग्रेजी एक अनि‍वार्य वि‍षय है... जबकि‍ हि‍न्‍दी नहीं। ऐसे में इन बोलि‍यों और उप-भाषाओं को स्‍थान देकर हम हि‍न्‍दी को भूलने में एक कदम और आगे बढ़ जाएंगे।
राजभाषा और अनुसूची में शामि‍ल होने की दौड़ ने हि‍न्‍दी को और ज्‍यादा पीछे धकेल दि‍या है। पहले लोग हि‍न्‍दी न बोल पाने पर माफी मांगा करते थे और आज हि‍न्‍दी बोलने पर..। जो बोलते हैं इस हीन भावना से ग्रसि‍त होते हैं कि‍ कहीं ना कहीं वे कम पढ़े-लि‍खे हैं और समाज में पीछड़ गए हैं।
वर्तमान में हि‍न्‍दी के वि‍कास में जो ठहराव सा गया है वो अंग्रेजी के वि‍कास करने और हावी होने से कहीं ज्‍यादा बुरा है क्‍योंकि‍ जि‍स भाषा में ठहराव आ जाए वो उस नदी की ही तरह हो जाती है, जो बहना बन्‍द कर दे। क्‍योंकि‍ अन्‍तत: उसका पानी सड़ ही जाना है और ये बात केवल भाषा की दृष्‍टि‍ से ही नहीं सभ्‍यता और संस्‍कृति‍ की दृष्‍टि‍ से भी उतनी ही सच है। अंग्रेजी के वि‍कास को कोसने वालों को ये भी सोचना चाहि‍ए कि‍ कैसे कोई भाषा यूनि‍वर्सल बन गई, जबकि‍ असलि‍यत में तो यह ट्राइब्‍स की ही बोली थी। उत्‍तर बहुत ही सहज मि‍लेगा कि‍ अंग्रेजी ने अन्‍य भाषाओं को भी समाहि‍त कर अपना वि‍स्‍तार कि‍या ना कि‍ रूढि‍वादी बनकर संकुचि‍त होना स्‍वीकार कि‍या।
हि‍न्‍दी का वि‍कास करना है तो इस रूढि‍वादी सोच को छोड़कर स्‍वतन्‍त्र सोच के साथ हि‍न्‍दी को अपनाने की जरूरत है ना कि‍ हर 14 सि‍तम्‍बर को अंग्रेजी को कोसकर कोरम पूरा करने की।

Tuesday, September 13, 2011

वि‍ज्ञापन.... जो ज़ि‍न्‍दगी का हि‍स्‍सा बन गए...

आज बाजार ने बहुत तरक्‍की कर ली है...प्रोडक्‍ट्स के मामले में हमारे पास वि‍कल्‍पों की कमी नहीं है। नहाने से लेकर खाने तक, हर जरूरत के सामान से बाजार पटा हुआ है। दुकानदार से एक मांगो तो वो सौ चीजें दि‍खाता है। सस्‍ते से सस्‍ता और महंगे से महंगा...जो आप अफोर्ड करें ले जा सकते हैं। बाजार में कोई प्रोडक्‍ट आए, उससे पहले ही टीवी पर उसके लि‍ए मार्केट बनना शुरू हो जाता है। 

ब्रांड-अम्‍बेसडर से लेकर स्‍लोगन और पि‍क्‍चराइज़ेशन कुछ इस तरह कि‍या जाता है कि‍ दर्शक एक बार में ही उसका मुरीद हो जाए, और कई बार ऐसा होता भी है। कुछ ब्रांड तो उक्‍त प्रोडक्‍ट के पर्याय ही बन जाते हैं, समान के नाम पर प्रोडक्‍ट का नाम ही प्रचलन में आ जाता है...।
आज यू-ट्यूब पर खीटपि‍ट करते करते बजाज स्‍कूटर का पुराना ऐड दि‍ख गया..और बरबस ही मुंह से हमारा बजाज...हमारा बजाज, नि‍कल पड़ा। जि‍स तरह ठण्‍डा मतलब कोका-कोला बन चुका है, एक वक्‍त था जब स्‍कूटर मतलब बजाज था। आज भी, भले ही इक्‍का-दुक्‍का लोग स्‍कूटर चलाते हों लेकि‍न ये कहने के बजाय की मेरे पास स्‍कूटर है, कहते हैं कि‍ मेरे पास बजाज है।
आज बाजार में सैकड़ों नूडल्‍स ब्राण्‍ड हैं लेकि‍न सम्‍मि‍लि‍त रूप में सब मैगी ही कहे जातें हैं। खुद मैगी नूडल्‍स में ही कई वेरायटी आ गई है फि‍र भी कि‍सी स्‍पेसि‍फि‍क नाम की जगह मैगी ही ज्‍यादा चलन में है। इस चलन और प्रचलन का प्रमुख कारण जहां इनकी गुणवत्‍ता रही है, वहीं इन प्रोडक्‍ट्स के वि‍ज्ञापनों ने भी आम जनता तक इसे पहुचाने में बड़ी भूमि‍का अदा की है।
यू-ट्यूब से साभार लेते हुए कुछ पुराने, क्‍लासि‍क भारतीय वि‍ज्ञापन, जो पर्दे से जि‍न्‍दगी में उतर गए।


बजाज स्‍कूटर, पहली कमाई से खरीदा गया पहला सपना, बीवी संग प्‍यार-सी ड्राइव का सहारा, बच्‍चे के लि‍ए बाप के साथ घूमने का मज़ा, बेटी के बाप के लि‍ए सबसे कि‍मती दहेज, बीमार के लि‍ए मुसीबत का सहारा और आज हम सबके लि‍ए बचपन की यादों को ताज़ा करने का एक माध्‍यम.... ‘मम्‍मी थोड़ी देर रूक जाओ, इस परचार के बाद...मोगली आएगा’।


बचपन में जब भी मां या पापा डांटते, तो यही लगता कि‍... कोई प्‍यार नहीं करता, सब दीदी को ही प्‍यार करते हैं। अक्‍सर सोचा कि‍ घर छोड़कर भाग जाउं और ये शायद सभी के साथ हुआ होगा। डांट, गुस्‍सा और छि‍पा प्‍यार....और सबकुछ, बि‍ल्‍कुल मेरे आपके घर के जैसा..

स्‍वास्‍थ्‍य भरे शक्‍ति‍ भरे पारले जी... तरह-तरह के फ्लेवर, रंग, पैकिंग में सजे सैकड़ों ब्राण्‍ड हैं बाजार में, लेकि‍न आज भी बि‍स्‍कुट की पहली तस्‍वीर पारले-जी ही है। जि‍से रि‍क्‍शे वाले से लेकर बाली‍वुड का सबसे योग्‍य एक्‍टर भी पसंद करता है।

असली स्‍वाद जि‍न्‍दगी का... से लेकर कुछ मीठा तक हो जाए तक की कामयाबी का सफर...सुबह पापा से चॉकलेट की पेशकश और शाम को उनके लौटने का इन्‍तज़ार.. कि‍ वो कब आएं और चाकलेट मि‍ले...।


जिंगल की दुनि‍या का सरताज.....


42 सेकण्‍ड में वो सबकुछ जो... 22 सालतक एक बेटी, अपने बाप से और एक बाप, अपनी बेटीसे दबी ज़बान में कहते रहते हैं। एक बैकग्राउण्‍ड म्‍यूज़ि‍क जो कुछ ना कहते हुए भी सबकुछ कह जाता है¬¬..


आज बाजार में तरह-तरह के ब्‍यूटी सोप हैं... लेकि‍न लाइफब्‍वाय उन कुछ ब्राण्‍ड्स में से है जि‍सने भारत की आम जनता को बाजार से जोड़ा... करइल की मि‍ट्टी से नहाने वालों के बीच एक नयी पहचान साबि‍त हुआ ये साबुन।

ये कुछ ऐसे ऐड हैं, जो अपने आप में कि‍सी एंटि‍क पीस से कम नहीं हैं...। आज मार्केट में इनके लाखों वि‍कल्‍प हैं लेकि‍न बचपन की यादों का शायद ही कोई वि‍कल्‍प मौजूद हो, जो इन विज्ञापनों से जुड़ी हैं।


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