Wednesday, January 25, 2012

हर चेहरा यहां बिकाऊ है----

परचून की पुड़िया पर आनंदी की मुस्कान देखकर आप भी शायद यही कहेंगे कि...जी चेहरा बिकता है...। शायद यही वजह है कि आजकल हर कोई फिल्म और टेलीविजन से जुड़कर काम करना चाहता है..क्योंकि काम भले न रह जाए ऐड तो मिल ही जाएंगे...। कुछ दिन पहले उर्मिला मातोंडकर को भी पताका चाय के ऐड में देखा था और फिर ये....हालांकि अविका गौड़ के परिपेक्ष्य में ये बात गलत है और उनके पास काम की कोई कमी नहीं है अब वो अलग बात है कि १६ की उम्र में वो सास-बहू वाले किरदार निभा रही हैं...। पर लोकल मार्केट में अविका के नाम का डंका है.....परचून की पुड़िया पर बस उनके चेहरे से ही बिक्री बढ़ गई है..बच्चे दुकानदार से कहते हैं, भइया मुझे आनंदी वाला चूरन दे दीजिए और फिर बैठकर हिसाब करते हैं कि किसके पास कितनी फोटु हो गई है..। 
लेकिन ये ट्रेंड लोकल मार्केट में पैदा नहीं हुआ...आपको याद होगा,जिस वक्त रितिक रोशन ने डेब्यू किया था उस वक्त कोका-कोला कंपनी आधे लीटर की बोतल के साथ रितिक की एक कार्ड साइज़ फोटो देते थे...कोका-कोला का मार्केट प्लान अब बहते-तैरते लोकल बाजार में आ गया है...। परचून की दुकान पर आनंदी की फोटो से जहां इस लोकल पचनौल का मार्केट बढ़ा है वहीं...ये भी पता चलता है कि कि एक सीरियल ने अविका उर्फ आनंदी को कितना पाप्यूलर  बना दिया है.....।

पचनौल के पाउच पर आनंदी की फोटो.....ये चेहरा आजकल गुमटी मार्केट की जान है......

और परचून विथ वेरायटी...अगर आपको आनंदी और जगिया की जोड़ी पसंद है तो आपको उदास होने की ज़रूरत नहीं है...सासु मां के साथ ,सुगना जीजी के साथ,दादी सा विथ आनंदी, विथ फूली और लगभग हर वेरायटी..हर रिश्ते के साथ। लेकिन हरएक पचनौल पुड़िया में आनंदी का चेहरा आपको ज़रूर दिखेगा....।

आजकल नोएडा की गलियों में घूमने का काम जोरों पर चल चल रहा है...बेरोज़गारी में शायद इंसान सबसे ज्यादा मेहनत करता है...। लेकिन पैसा छोड़कर बहुत कुछ मिल रहा है....सीखने को...और चलते-चलते जहां कदम रूक जाते हैं वहां एक कैमरा क्लिक करके उस दिन  का मेहनताना समझ लेती हूं..पहले आनंदी मिली और अब बटिस्टा...।एक बेहद देसी और जमीनी धरातल का चेहरा और दूसरा विदेशी


ये चेहरा विदेशी जरूर है..पर कम पाप्यूलर कम नहीं है...। मेरे लिए तो रेसलिंग में कुछ ही नाम और कुछ ही चेहरे हैं जो पहचान पाती हूं...। बटिस्टा का ये पोस्टर नोएडा के एक चौराहे पर टंगा मिला...अच्छा मज़े बात ये है कि अगर किसी मस्क्युलर मैन को ही ब्राड अंबेसडर बनाना था तो खली को क्यों नहीं बनाया...? खैर अपना प्रोडक्ट अपना ब्रांड अंबेसडर...। लेकिन सोच के धनी इस पहलवान ने बटिस्टा के साथ खूब खेल किया है..बेचारे की हड्डी तोड़ कर उसे चौराहे पर टांग दिया है....। लेकिन इससे एक बात और भी साफ होती है कि अपने देश में विदेशी चेहरे आज भी उत्सुकता पैदा करते हैं...और जहां उत्सुकता है वहां रूचि है..और जहां रूचि है वहां खोज है...और फाइनली जहां खोज है..वहां मार्केट है...और मार्केट है तो खरीद-फरोख्त है....
                           और ये चेहरे उसका नमूना....उदाहरण......   


बटिस्टा का ये पोस्टर आपको हंसाता भी है और सोतने पर मजबूर भी करता है कि...आज हर प्रोडक्ट बिक सकता है  बस ज़रूरत है एक चेहरे की....

फोटो देखकर ब्रांड और ब्रांड अंबेसडर की कैमेस्ट्री तो समझ आई लेकिन राह चलते ही एक नया ठिकाना मिल गया जहां.....कमर दर्द,अकड़न,सूजन और मोच का इलाज करवाया जा सकता है....। 









Sunday, January 22, 2012

हफ्तेभर की भागदौड़ के बाद एक मस्तीभरी शाम...

नोएडा में रहते करीब दो हफ्ते से ज्यादा हो गए हैं..पहले-पहल तो बिल्कुल भी मन नहीं लगता है लेकिन कहते हैं न धीरे-धीरे आदत हो जाती है....तो अब आदत हो गई है। कहीं नहीं भी जाना हो तो भी सुबह ६ बजे उठ जाती हूं  क्योकि बुआ की दो छोटी-छोटी बेटियां स्कूल जाने के लिए तैयार होने लगती हैं....किसी की टाई गुम रहती है तो किसी की चोटी करनी होती है..किसी को लंच में पास्ता चाहिए होता है तो किसी को पूरी..और इन सबके बीच बुआ जी घिरनी की तरह घूमती नज़र आती हैं..हालांकि कोई उठाता नहीं है फिर भी नींद खुद ही खुल जाती है..एक तरह से अच्छा ही है कम से कम सूर्योदय देखने का मौका मिल जाता है वर्ना तो अपन १०-११ बजे वाले बंदे हैं...पता ही नहीं चलता था कि कब दिन हुआ और कब शाम ढ़ली..।
 इधर बीच घर से बाहर निकलना बहुत कम ही हुआ...                                                                               एहसास हुआ कि घर में रहना किसी सज़ा से कम नहीं और वो भी तब जब घर में आपके पास कोई काम न हों...बुआ की अपनी सखी-सहेलियां हैं...जिनके पास सास-ससुर से लेकर ननद-भौजाई तक का हर मटीरियल होता है ..सो उन्हें कोफ्त नहीं होती और जिम्मे हजार काम भी तो हैं..पर सच में जब तक कॉलेज नहीं खुले थे एक-एक दिन बरस समान काटा है..।
अब कॉलेज भी खुल गए हैं और नौकरी की तलाश भी शुरू हो गई है..सो पिछले ४-५ दिन से बहुत व्यस्त रही। छोटी बहने बहुत छोटी हैं..एक १२ साल और दूसरी १८ साल..छोटी। लेकिन मेरे नोएडा आ जाने से शायद वही सबसे ज्यादा खुश भी हैं...। आज संडे की छुट्टी थी उनकी भी और मेरी भी..सो सुबह से ही...देशराग की तरह राग शुरू हो गया कि स्टेडियम जाएंगे और वो भी दीदी के साथ...। 
नोएडा स्टेडियम में विंटर फिएस्टा लगा हुआ था..जिसका आज अंतिम दिन था..कुछ खरीदना तो था नहीं सो हाथ घुमाते तीनों पहुंच गए...कुल मिलाकर अच्छा लगा वहां जाकर। 
कई चीजें देखकर गाजीपुर के लंका मैदान में लगने वाले दशहरा मेले की यादें ताजा हो गई...वहीं की कुछ यादें यहां बांट रही हूं...

स्टेडियम के गेट से ही शुरूआत करते हैं..अभी पहुंचे ही थे कि ये पेटीज़ उर्फ पेंटिज भाई साहब की चलती-फिरती दुकान मिल गई...गर्मा-गर्मा पेंटिज पढ़कर हंसते-हंसते पेट में बल पड़ गया...बस एक बिंदु से वेज अर्थ बदल गया...लेकिन शुरूआत अच्छी रही....

पिक्चरों में ये खूब दिखाया जाता है कि कैसे हीरो शूटिंग के दौरान आई लव यीू लिख देता है  या फिर हीरोइन का नाम...खैर हमने दूर से ही सलाम ठोंका..क्योंकि एक तो चश्मा साथ नहीं था और दूसरे बच्चों के सामने इमेज बिगड़ने का डर भी था... बचपन में पैसे का लालच या फिर ईनाम जीतने का इतना मेह रहता था कि बाबूजी से कहकर निशाना जरूर लगाते थे...और अगर गलती से एक भी सही बैठ गया तो खुद को धर्नुधर अर्जुन मान बैठते थे...
मेले में बोनसाई के पौधों की भरमार थी और इन्हें देखकर नयनसुख लेने वालों की भी..हम भी  कतार में थे..एक-दो पौधों के दाम भी  पूछे ..पर महंगाई इतनी हावी है कि उल्टे पैर लौट आए। सबसे सस्ते वाले पौधे की कीमत ३५० थी और हम तो लेकर ही २०० गए थे..दुकान के मालिक ने बड़े प्यार से मुझे दिल के आकार का बैंबू ट्री दिखाया कि इसे ले जाइए इससे घर में प्यार बढ़ेगा..पर......मजबूरी थी..नहीं ला सके।

ये स्टाल सबसे ज्यादा पसंद आया...हैंडीक्राफ्ट का सामान मिल रहा था...स्टाल के मालिक अंजित ने  बताया कि  ये सारा सामान  तिहाड़ के कैदियों ने बनाया है...आर्ट ऑफ लीविंग के सपोर्ट से श्रृजन नामक की संस्था है जो ये सबकुछ देखती-भालती है..। स्टाल का सारा सामान हैंडमेड पेपर का बना हुआ था..जिस पर की गई मेहनत साफ नजर आ रही थी...। उसने बताया कि यहां की बिक्री से जो कुछ पैसा मिलता है उसे एनजीओ उन कैदियों के घरवालों को दे देती है..। अच्छी पहल लगी...।लेकिन अंजित पर आर्ट ऑफ लीविंग के प्रवचनों का पूरा प्रभाव नज़र आ रहा था..वो बेहद दार्शनिक बातें कर रहा था..जैसे कि मैडम गलती किससे नहीं होती,कुछ पकड़े जाते हैं कुछ नहीं..जो पकड़े गए उन्हें भी बहुत पछतावा ह..समाज के लिए..परिवार के लिए..। पर अब उनकी कोई सुनता नहीं..उनके घरवालों को कोई देखता नहीं..हम कोशिश करते हैं कि कुछ मदद कर सकें...आप लोग भी कीजिए..क्योंकि सबके करने से ही बदलाव हो पाएगा...।

ये हैं अपने राजस्थान के मस्त कालबेलिये...थोड़ा सा करतब हमलोगों ने बी दिखाया...एक -दो ठुमके मारते हुए आगे बढ़े...
भारत में भी अजूबों की कमी नहीं है...ये भी किसी अजूबे से कम नहीं था..एक चावल जितना  तो आमतौर पर एक  अक्षर होता है और महाशय चावल पर शब्द उकेर रहे थे..वाकई अद्भुत कला...वीडियो शूट किया था पर टेक्निकल एरर की वजह से डीलिट हो गया....

एक नमूना...


और ये हूं मै..हमेशा से ऊंचाई से डर लगता रहा है..आज उस डर को हराने के लिए गोल-घूमने वाले झूले पर बैठी...बहुत हिम्मत करके। आंख भले बंद की लेकिन हमेशा की तरह बीच मे ही झूला रूकवाकर उतरी नही..पूरा पैसा वसूल किया....मज़ा आया....।

दिन अच्छा बीता...क्योंकि बहनें खुश हुई घूमकर और मैं बहुत सी बातें जानकर-समझकर.....और कहते हैं न,जिस दिन कुछ नया सीखने को मिल जाए..समझिए खास है







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