Sunday, September 02, 2012

बहुत हल्‍का है वजन इस प्रेम का.....

पता है प्‍यार हो गया है मुझे
पर वैसा नहीं जैसा मीरा को अपने भगवान से हुआ था
ना ही वैसा जो राधा को अपने प्रियतम सांवरे से था
मेरा प्रेम सीता सा भी नहीं है
जो अपने पति राम के परित्‍याग को स्‍वीकार कर ले
पर ये सरल है.....
मुझे मीरा नहीं बनना
जिसे तुम्‍हारे प्‍यार के लिए संघर्ष करना पड़े
ना ही वो राधा जो तुम्‍हारी याद में रो भी ना सके
सीता तो कभी नहीं
जिसे तुम बस एकबार कहो और वो
महज दुनिया के लिए तुमसे अलग हो रहने लगे
हां..
जानती हूं कि इन सभी का प्रेम उदाहरण है
पर मुझे उदाहरण नहीं बनना
मुझे केवल तुम्‍हारा बनना है
तुम्‍हारे साथ रहना है, तुम्‍हे अपनाना है
तुम मेरे भगवान नहीं हो...
नाही मेरे प्रेमी
और ना तो मैं तुम्‍हें राजा मानती हूं
तुम केवल वो हो जिसके होने से मैं खुश हूं
जिसे देखना भी मेरे लिए उतना ही जरूरी है
जितना उसे महसूस करना
जिसे उतना ही सुनना चाहती हूं जितना सुनाना
उसे छूने की भी उतनी ही जरूरत है
जितना अकेले में उसका एहसास करना
जानती हूं..
बहुत हल्‍का है वजन इस प्रेम का
क्‍योंकि मैं भौतिकता नहीं छोड़ सकती..
सच कहूं छोड़ना  चाहती ही नहीं
लेकिन यह सरल है..
जिसकी हर चाहत तुमसे ही पनपती और
बुझती है..।

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