Wednesday, October 24, 2012

त्‍योहार अब यादों के हवाले हैं..

हर त्‍योहार पर बचपन बहुत याद आता है। जब इस बात की चिंता नहीं थी कि ऑफिस नहीं गए तो इमेज खराब हो जाएगी, सेलरी कट जाएगी...वगैरह-वगैरह। त्‍योहार बस त्‍योहार हुआ करते थे..जब पापा को सामानों की लिस्‍ट पहले ही थमा दी जाती थी बिना यह सोचे कि महीने का अंत है और पैसे होंगे भी या नहीं...। समझ ही नहीं थी इतनी...। पापा भी सालभर का त्‍योहार मान हर जायज और कुछ नाजायज मांग  पूरी करते थे। आज बचपन की वो तमाम यादें खुद ही जिंदा हो गई हैं जब सुबह से ही मेला जाने तैयारी शुरू हो जाती थी...। गाजीपुर के आस-पास रहने वालों को मालूम होगा, छोटे शहरों के त्‍योहार का रंग।
    दिल्‍ली-नोएडा में तो कोई त्‍योहार कब बीत जाता है..हवा तक नहीं लगती। पर ये शहर बदलने से ज्‍यादा उम्र और समय बदलने का नतीजा है..।  पर फिर भी गाजीपुर की बात कुछ और थी। नवमीं के पहले दिन से "नीमवा के डाली मइया डाले लीं झूलउवा" गीत से लेकर रावण वध तक सबकुछ कितना सिलसिलेवार और रंगीन होता था।
आज शायद ही कोई बच्‍चा नीलकंठ देखने के लिए दिनभर पेड़ों पर नजरें जमाए रखता होगा...वीडियो गेम के कॉन्‍ट्रा को मारने से फुर्सत जो नहीं है..। दिनभर की खोज के बाद घर में मौजूद सबसे बड़ा झोला ही शाम के लिए तैयार किया जाता था। जो लौटते समय मिट़टी के खिलौनों से भरा होता था। गर्दन हिलाने वाले बुढ़वा-बूढ़ी, चूल्‍हा-चाकी, हाथी-घोड़ा....फिरकी, लट़टू और ना जाने क्‍या-क्‍या। खाने-पीने के नाम पर गोलगप्‍पे हमेशा से ही सर्वसुलभ रहे हैं...।
सुनकर हंसी आए पर लंका के मैदान में पत्‍थर पर बैठे रामलीला के किरदार उस समय साक्षात भगवान ही लगते थे...। उनके लिए मालाएं खरीदते थे...उनको जो भोग लगता था उसे प्रसाद तुल्‍य मानकर सिर-माथे लगाकर स्‍वीकार किया करते थे। आज ये सबकुछ नहीं है...अपने ही इन बीस सालों की जिंदगी में लगता है दूसरा जन्‍म हो गया है...जहां वो पुराने सामाजिक संबंध नहीं हैं..हैं भी तो उनमें  उमंग नहीं है...रंग नहीं है। पर शुक्र है ईश्‍वर ने यादें सजोने की ताकत दी है क्‍योंकि अब ज्‍यादातर त्‍योहार तो उन्‍हीं के भरोसे मनते हैं...

Sunday, October 21, 2012

कैसी होती होगी उन औरतों की जिंदगी....

कैसी होती होगी उन औरतों की जिंदगी
जिनके पास शब्‍दों की जगह
सिर्फ आंसू होते होंगे...
जिन्‍हें ये झूठा विश्‍वास दिलाकर मंडप में
बिठाया जाता होगा कि
इन सात फेरों के बाद वो हमेशा के लिए
सुरक्षित होंगी...
जबकि
शायद उसी दिन से उनके
सुरक्षित होने की कोई कीमत नहीं रह जाती..
जिस परमेश्‍वर के फेर में वो खुद को
मीरा मान दूर छोड़ आती हैं
उसी को खुद से कहीं भी जुड़ा नहीं पाती हैं..
कैसा होता होगा उनका जीवन
जिन्‍हें बोझ समझकर इस धोखे से ब्‍याह
दिया जाता होगा कि
उस अनजान घर में उनके लिए सिर्फ सुख
ही लिखा है..
पर मिलती उन्‍हें सिर्फ उपेक्षा है...
जिनके प्‍यार के सपने सजाकर वो
डोली चढ़ती हैं..
उसी प्‍यारे से एक मीठी बात सुनने को
जिंदगीभर तरसती हैं..
कैसी होती होगी उन औरतों की जिंदगी
जिनके पास अपने दुख से बड़ा कोई
साथी नहीं होता होगा...
कैसी होती होगी उन औरतों की जिंदगी
जिनका महज एक शरीर से ज्‍यादा
कोई वजूद नहीं होगा...
कैसी....?

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