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Monday, March 16, 2015

#हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी : 1

घर से निकलती अकेली हूं, पर सड़क पर कदम रखते ही न जाने कितनों का साथ मिल जाता है. आॅटो में बैठने से लेकर, मेट्रो और फिर आॅफिस....कहीं भी अकेलापन नहीं रहता. तमाम तरह के लोग आस-पास मौजूद होते हैं...कोई फोन पर बाॅस को अपनी ग़लत लोकेशन बता रहा होता है, कोई रिश्तेदारों को फोन करके आज का 'काम' पूरा कर रहा होता है तो कोई कुछ....

पर चारों ओर से घिरे होने के बावजूद हर रोज़ कोई एक ही कहानी आपके साथ जुड़ती है. ख़ासकर मेट्रो में. कोई एक ही शख़्स या समूह होता है, जिसे आप पूरे रास्ते फाॅलो करते हैं. आज एक ऐसा ही परिवार मिल गया.
औरत सीट पर बैठी हुई थी. गोद में 6 महीने का एक बच्चा था और उससे लिपटकर ही दूसरा, दो साल का लड़का खिड़की से बाहर देखने में व्यस्त था. गोद वाले बच्चे को वाकई काजल की कोठरी से निकालकर लाया गया था. उसके माथे पर लगा नज़र का टीका पूरे चेहरे पर, उसके नाक से बहते तरल के साथ मिलकर क्रीम बन चुका था. बड़ा बच्चा बार-बार अपनी मां के कान पर पीं-पीं बोलता और मां चिल्लाती. एकबार उसने थोड़ा ज़ोर से ही चिल्ला दिया. बच्चा रोया नहीं, पर नाटक करके, नीचे वाले होंठों को सिकोड़कर जताने लगा की उसे ये पसंद नहीं आया.

मां परेशान हुए जा रही थी...पिता सामने की ओर मुंह किए खड़ा था, वो बार-बार उसकी बुशर्ट खींचती की इन दो बच्चों में से किसी एक को देख लो और वो हर बार भौंहे सिकोड़कर उसे मना कर देता...
पर उसके चेहरे पर सोच की लकीरें इतनी गहरी थीं कि मानों भाग्य ने उसे जन्म से ही त्रिपुट लगाकर भेजा है...बच्चे को देखकर मुस्कुराई तो वो शरमा गया, मानो किसी ने उसकी शैतानी पकड़ ली. पर मेरी मुस्कान उसके लिए शायद कोई उपहार थी, उसने अपनी मां से कहा, देख उ दीदीया हंसत बिया...(देखो वो दीदी हंस रही है). मां ने भी एक फीकी मुस्कान मेरी ओर दी और दोबारा से अपने पति की ओर देखने लगी...

Thursday, December 04, 2014

आज भी एक पैर उसी पहली सीढ़ी पर है...


मां का चले जाना केवल उसका जाना नहीं होता है...उसके साथ शायद वो हर हक़ चला जाता है, जो उसकी बेटी का हो सकता था. बचपना दिखाना, खाने की फ़रमाइशें करना, कपड़े मांगना, रोने पर मनाये जाने की आस का होना...दूर जाने पर फोन आने की उम्मीद का होना, मां के हाथ का खाना बांटना, बीमार पड़ने पर दवाई के बारे में पूछना, छींक आते ही मां का समझ जाना की तबियत ख़राब है, सबकुछ...

पर उसके जाने के बाद कितनी उधार की जि़न्दगी हो जाती है...छोटे रहो तो बड़ों के कहे के हिसाब से करो. स्कूल में दोस्तों की नकल, काॅलेज में टीचर और साथ पढ़ने वाली लड़कियों की नकल, आॅफिस में साथियों की नकल और प्यार के मामले में टीवी और फिल्मों की नकल....

क्योंकि कोई होता ही नहीं है जो बता दे कि ऐसे करो, वैसे करो...कहने को सब कहते हैं कि मां नहीं तो क्या हुआ, हम हैं न.... लेकिन जि़द, नाराज़गी या दुख में सब मुंह छिपा लेते हैं..

हर बार लगता है ये पुरानी बात हो चुकी लेकिन बचपन कभी पूरा ही नहीं हुआ तो आज भी बचकानी हरकतें बाकी हैं....पर लोग नखरे तो नहीं उठा सकते...वो बस कह सकते हैं बी मैच्योर...जि़न्दगी में बहुत कुछ है करने को...पर आज भी एक पैर उसी पहली सीढ़ी पर है, शायद कभी आगे बढ़ पाए...

Wednesday, December 03, 2014

मोर के भद्दे पैर

पीजी भी बड़ी मज़ेदार जगह है...जहां हम सात लड़कियां एक साथ रहते हैं...कुछ मौलिक समानताओं के अलावा हम सभी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं....हमारे खाने-पीने से लेकर उठने-बैठने, सोने-पढ़ने, नहाने-धोने, बात करने-काम करने, किसी भी चीज़ में कोई समानता नहीं है...पर फिर भी अब हम सभी को एक-दूसरे की आदत हो गई है...घर आकर कब कौन खाना बनाएगा , कब कौन सा चैनल चलेगा, कब कौन बात करेगा....लगभग सबकुछ तय है हमारे बीच...

शाम को आॅफिस से लौटकर एक-दूसरे को देखना काफी सुकून देता है...सबके आॅफिस की दिक्कतें बांटी जाती हैं और जितना ज़्यादा हिंसात्मक उपाय बता सकें, हम एक-दूसरे को बताते हैं...दरअसल ये हमारे दिनभर की थकान को निकाल देता है...कुछ नियम भी हैं...मसलन रमन भल्ला का शो ये है मोहब्बतें आ रहा है तो शोर नहीं करना है...सुबह सबको फ्रेश होने और नहाने के लिए 15 मिनट का ही टाइम मिलेगा...जिसे ज़्यादा वक्त लगता हो वो सबसे सुबह उठे...और न जाने कितनी बातें...बहुत लड़ाइयां होती हैं...मुझे मेरा सामान और बिस्तर गंदा मिलता है तो मेरा चीखना शुरू हो जाता है..ऐसी ही किसी का दूध, किसी की सब्जी, किसी का आटा चोरी हो तो उसका मुंह सिकुड़ जाता है...

पर ये सब अब अच्छा लगने लगा है...इस ढेर सारी बकवास बातों में कई बार कुछ अच्छा और नया भी सुनने को मिलता है...कुछ दिन पहले ही ये पता चला की मोर अपनी पूरी जिंन्दगी में केवल तब-तब ही रोता है जब-जब वो अपना पैर देखता है...क्योंकि उसके पैर बहुत भद्दे होते हैं....लेकिन उसके पैर हमेशा से ऐसे नहीं थे. मैना, जिसके पैर पीले होते हैं दरअसल वो मोर के असली पैर हैं...एकबार मैना ने मोर से पैर उधार मांगे और अपने पैर उसे दे दिए...फिर कभी लौटाए ही नहीं...इसलिए मोर अपनी मूर्खता और अपने गंदे पैरों को देखकर रोता है...मोर से जुड़ी एक और दिलचस्प बात है पर वो फिर कभी....

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