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Monday, April 13, 2015

#हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी...- 4

तस्वीर लेने के लिए कैमरा आॅन किया था, लेकिन हिम्मत नहीं हुई की उन जूतों की फोटो ले सकूं ...

तीनों की उम्र 10 से 12 साल के बीच रही होगी...तीनों के पैरों में स्कूल वाले काले, रेक्सीन के जूते थे. जिनकी काली चमड़ी उतर-उतरकर गिर रही थी. उनमें से एक का जूता तो इस कदर घिस चुका था की चमड़े को सपोर्ट करने वाला कपड़ा बाहर आ गया था और उसके नीचे से उसकी हिलती-डुलती उंगलियां साफ़ नज़र आ रही थीं. 

शायद वो किसी रिश्तेदार के यहां जा रहे थे. सामने ही उनका पिता खड़ा था. जिसे देखकर अंदाज़ा लग रहा था की उसके लिए नए कपड़ों का मतलब रेडीमेड गारमेंट की दुकान या कोई माॅल नहीं बल्कि किसी बड़े घर की उतरन है.
वही कपड़े जो छोटे हो जाने, रंग हल्का पड़ जाने या फिर रोएं उभर आने पर कामवाली बाई, पेंटर या फिर झाड़ू लगाने वाले के लिए निकाल दिए जाते हैं. उसका कद पांच फुट ये अधिक नहीं रहा होगा लेकिन उसने पैंट किसी छह फुट के शख्स की पहन रखी थी. 

बच्चे मेट्रो में सफ़र करते हुए खुश थे. छोटी वाली लड़की के अंदर उत्सुकता थी की ये मेट्रों अंतिम छोर पर कैसी हो जाती है...वो बार-बार सीट से उठती और पंजों को ज़मीन पर टिकाकर एड़ी उचकाकर आगे देखने की कोशिश करती...उसके बार-बार ऐसा करने से पिता बुरी तरह चिढ़ रहा था. वो उसे बार-बार धमकी दे रहा था की बैठ जाओ वरना इसी में छोड़कर चले जाएंगे. (उसने ये सबकुछ भोजपुरी में कहा था.)

इसी बीच देखा-देखी लड़का भी हैंडल पर लटकने की कोशिश करने लगा...पिता के सब्र का बांध टूट गया, उसने दोनों को एक-एक थप्पड़ धर दिया...पर दोनों रोए नहीं, मुस्कुराते हुए सीट पर आ बैठे...

बड़ी बहन ने दोनों का हाथ पकड़ा और जो कहा उसे सुनकर...
मान जाओ तुम लोग, वरना पापा भी मम्मी की तरह छोड़कर चले जाएंगे. 
(उसने ये भोजपुरी में कहा था)

चांदनी चौक आ गया और बाप ने सबको कतारबद्ध करके गेट के बाहर कदम रखा...
  

Wednesday, March 18, 2015

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी : 3

आंटी  के पास चार झोले थे... एक उनका चमड़े वाला पर्स, दूसरा लंच-बाॅक्स का बैग, तीसरे में पानी और फल जैसा कुछ रहा होगा पर चौथा झोला बहुत चमकीला था. सुंदर भी. उसका टंगना लेस का था और और चमकीले गोटे से उस पर काम किया हुआ था.

आंटी ने मेट्रो में घुसने के साथ ही लेडीज़ सीट पर अटैक किया और उस पर बैठे लड़के को खड़ा कर दिया. इतने पर भी उन्हें अच्छा नहीं लगा तो उन्होंने कहा क्या तुम इधर हो जाओगी, थोड़ा शीशे से टेक ले लूंगी.

टेक लगाने के साथ ही उनके उस चमकीले झोले से एक रंग-बिरंगी किताब निकली. पाॅकेट-बुक. पाॅकेट बुक दरअसल हनुमान चालीसा थी. पर उसके हर पन्ने पर भावानुकूल चित्र था और सबसे नीचे उसका मतलब लिखा हुआ था. आंटी ने बहुत तल्लीनता के साथ हुनमान चालीसा पढ़नी शुरू की. पूरा ख़त्म करने में उन्हें 10 मिनट के आस-पास लगे होंगे. उसके बाद उन्होंने उसी झोले से शिव चालीसा निकाली और उसे पढ़ना शुरू कर दिया.
सामने ही खड़ा लड़का "बदला मिज़ाज मेरा फूंकते ही..."वाला गाना सुन रहा था. ईयरफोप फट चुका था, या फिर इतना तेज था कि आवाज़ हमें भी आ रही थी. लेकिन आंटी ध्यानमग्न बनी रहीं...

इस तरह से आज का सफ़र हनुमान जी और शिव शंकर के साथ करने का सौभाग्य मिला. इसका एक पहलू ये भी है कि हम इतने व्यस्त हो गए हैं कि भगवान का ध्यान भी करने में टाइम वेस्ट मानते हैं. ये सोचकर किताबें झोले में भर लेते हैं कि मेट्रो में बैठे-बैठे हनुमान चालीसा निपटा ली जाएगी, वैसे भी रास्ता करीब 15 से मिनट का है....

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