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Wednesday, May 25, 2016

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी - 7

आज मेट्रो की भीड़ में एक बहुत अच्छी तस्वीर मिली.

अमूमन बच्चा संभालना, औरतों का काम माना जाता है. ये मौन घोषणा न जाने किसने कर रखी है की बच्चे की देखरेख, सू-सू-पाॅटी, दूध, नैपी, नहाला-धुलाना, मालिश और सुलाना, हर काम मां ही करेगी.

अपवाद बहुतेरे हैं लेकिन जहां तक सोच की बात है, ये जि़म्मेदारी मां की समझी जाती है. मां को थोड़ी राहत देने के लिए घर की दूसरी महिलाओं को नियुक्त किया जाता है लेकिन पिता को हमेशा से अंतिम विकल्प ही माना जाता रहा है.
पुराने समय में तो इस नियम के होने का कारण पता चलता है की औरतें केवल घर का काम देखती थीं और पुरूष बाहर का तो, बच्चे पालना मां का ही काम था. पर अब जबकि शहरों में इंजन के दोनों पहिए गाड़ी खींचने के लिए सुबह ही दौड़ पड़ते हैं तो, पिता की भी बराबर की भागीदारी तो बनती ही है.

ख़ैर मकसद ज्ञान देना बिल्कुल नहीं था. बस इस तस्वीर को देखकर जो महसूस किया वही लिखा. आज किस्मत से सीट मिल गई थी. न जाने क्यों मेट्रो थोड़ी खाली थी. मेरे ठीक सामने की सीट पर एक मां-बेटे बैठे थे और एक छोटा सा बच्चा.साल-दो साल का रहा होगा. समने बैठा शख़्स बमुश्किल 25 से 30 साल का होगा. या फिर उससे भी कम. लेकिन भरी मेट्रो में जहां लड़के, लड़कियों को इम्प्रेस करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं, वहां ये लड़का बच्चा संभाल रहा था.

बच्चे को पूरे दुलार से गोद में बिठाए हुए था. उसके बाद उन वृद्धा से दूध की बोतल मांगी और बच्चे को गोद में बिठाकर दूध पिलाने लगा. 

दूध पिलाने के दौरान उसने सबसे पहले बोतल को रूमाल से ढंका, जैसा आमतौर पर गांव-घर की औरतें करती हैं. बच्चे को खांसी आई तो उसका सिर सहलाया और उस पर फूंक मारी.

ये सब देखकर बहुत अच्छा लगा. सामने बैठे शख़्स को लेकर इज़्जत बढ़ गई की ये दिखावे से दूर है. उसे दुनिया की चकाचैंध और घुड़दौड़ में शामिल होने का शौक नहीं है. उसके लिए उसका परिवार ही सबकुछ है...

Monday, April 04, 2016

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी: 6

इस औरत को देखते ही विद्या बालन याद गईं और स्वच्छता अभियान के तहत चलाया गया वो विज्ञापन कानों में अपने-आप सुनाई देने लगा. जिसमें विद्या जी कहती हैं, जहां सोच, वहां शौचालय.

ख़ैर ये महिला, अपने सास-ससुर के साथ थी. तीनों को बदरपुर जाना था. पहले घुंघट थोड़ा कम था. ठोढ़ी दिख रही थी लेकिन जैसे ही मेट्रो अशोक नगर पहुंची, सास ने पूरा चेहरा ढक लेने को कहा. बहू ने झट उनकी आज्ञा का पालन करते हुए पूरा चेहरा ढक लिया और शीशे से लगकर बैठ गई.

उसके बाद सास-ससुर आपस में कुछ बात करने लगे. दोनों के बीच कुछ देर बात हुई और उसके बाद सास अपनी बहू को समझाने लगी. राजीव चैक पर बड़ी भीड़ आएगी, पहले ही दरवाजे़ के पास चल चलेंगे. वरना
निकल नहीं पाएंगे. बहू ने कोई जवाब नहीं दिया, उसके बाद सास ने उसे अपनी कोहनी से धक्का मारा...

कोहनी के धक्के से उसकी नींद खुली और वो थोड़ा संभलकर बैठ गई. सास ने कहा, मैं तब से बात किए जा रही हूं और तुम सो रही हो...घूंघट में मुंह डालकर सो रही हो...ये तो अच्छा है की घूंघट में मुंह छिपाकर सोए रहो और हम यहां देखते रहें की अगला स्टेशन कौन...

ऐसा करो, घूंघट बस सिर तक का करो, जब मुंह सबको दिखेगा तो नींद नहीं आएगी...बहू ने घूंघट छोटा किया और तिरछी होकर बाहर की ओर देखने लगी. 

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