Saturday, May 07, 2016

अब सपनें ही तुम्हारा पता हैं...

अक्सर तितली का उड़ना,
चिडि़यों का चहचहाना
तुम्हारी याद दिला जाता है...
कई बार सोचती हूं, तुम होती
तो मेरे दिन की शुरूआत कैसे होती...
पहले तो तुम प्यार से उठाती...
पर तब भी जब मैं रज़ाई नहीं हटाती
तो तुम डांटती...
उस डांट का सारा मक़सद मुझे 
नाश्ता कराकर भेजना होता.
नहाने के बाद जैसे ही मैं तैयार हो जाती 
तुम नाश्ते के साथ लंच भी थमा देती
इस झिड़की के साथ की याद से खा लेना
आॅफिस के गेट पर पहुंचते ही तुम्हें न जाने 
कैसे पता चल जाता और मेरा मोबाइल बज उठता
दोपहर में स्कूल की घंटी की तरह
तुम भी मोबाइल की घंटी बजा देती, खाना खाया...
6 बजे के आॅफिस में अगर पांच मिनट भी अधिक होता
तो तुम मालिकान को बुरा-भला कहना शुरू कर देती
रास्ते में दो बार तो फोन जरूर करती
घर पहुंचते ही, तुम पुलिस सी बन जाती
स्ुबह से लेकर शाम तक तुम्हारी बेटी किससे मिली,
कैसे मिली, क्या किया सबकुछ पूछती...
खुद दिनभर काम करती रहती, पर मेरी थकान को 
चेहरे से ही पढ़ लेती...
हम साथ चाय पीते, गप्पे मारते और फिर "घर का पका" खाते
मैं तब भी सोने के लिए तुम्हारा ही हाथ खोजती
हां, पर मेरे सपनों में तुम कहीं नहीं होती....
और अब...
सपनें ही तुम्हारा पता बन चुके हैं...

Wednesday, April 20, 2016

आज वो बि‍छड़ गया और घर सूना हो गया

कल दोनों के बीच जमकर लड़ाई हुई...ऐसा मुझे लगा. लड़ाई इस कदर थी की मुझे उठकर आना पड़ा और उन्‍हें डांट लगानी पड़ी.

डांटने के बाद एक उपर जाकर बैठ गई और एक नीचे. रात को मामला शांत कराया. पर आज की सुबह दोनों की आवाज़ गायब थी. वरना हर रोज़ दोनों सुबह साढ़े पांच चि‍ल्‍लाना शुरू कर देती थीं. इतना चि‍ल्‍लाती थीं की साथ के कमरे में सोने वालों की भी नींद हराम हो जाती थी और मुझे उन्‍हें दाना-पानी देकर चुप कराना पड़ता था.

पर आज कोई आवज़ नहीं थी...इसी धोखे में आंख भी नौ बजे खुली. हर रोज की तरह सबसे पहले उनके पास पहुंची...देखा तो एक जालि‍यों पर बैठा था और दूसरा उपर..पहला, दूसरे को रह-रहकर हि‍ला रहा था...पर दोनों शांत थे. दूसरा सि‍र लटकाए बैठा था. 

खाना खाने की कोशि‍श कर रहा था, पर सि‍र भी नहीं उठा पा रहा था.

काफी देर तक उसे नि‍हारती रही...वो नहीं उठा. उसे सूरज की रौशनी दि‍खाई, ये सोचकर की सूर्य के प्रताप से उसका सि‍र उठ जाए, पर ऐसा नहीं हुआ और मेरे देखते-देखते उसके पैर मुड़ गए, उसने सि‍र डैनों में छि‍पा लि‍या और हमेशा के लि‍ए सो गया.

उसे बाहर नि‍काला, उसने अपने पैरों को अपनी जगह से उस वक्‍त तक भी जमा रखा था. उसे बाहर नि‍काला, पेपर मे लपेटा और ज़मीन में हमेशा के लि‍ए सुला दि‍या. उसे वि‍दा करके लौटी तो दूसरे को देखकर ज्‍़यादा रोना आया...अकेला...तन्‍हा. आज उसके पास लड़ने के लि‍ए कोई नहीं था.

सोचा उसे बोल दूं की तुम भी चले जाओ...अकले रहकर क्‍या करोगे. आज़ाद कर दि‍या, घंटों बैठकर उसे दूर से ही नि‍हारती रही...पर वो गया ही नहीं. मेरी ओर देखा और चीखना शुरू कर दि‍या. लगा, इस दुनि‍या में मेरे अलावा उसका कोई नहीं...

आज मदर्स डे पर मेरा चुन्‍नू चला गया. लालकि‍ले से ले आई थी उन्‍हें... रोज़ का रूटीन बन गया था. मां की तरह उन्‍हें सुबह नहलाना-धुलाना दाना-पानी देना. फि‍र थोड़ी गपशप करना और ऑफि‍स चले जाना. घर लौटते ही दोनों चीखना शुरू कर देते थे. मानों दि‍न भर की रि‍पोर्ट दे रहे हों.


आज चुन्‍नू के जाने के बाद मैं और मुन्‍नू अकेले हैं. चाहकर भी मुन्‍नू के लि‍ए चुन्‍नू की जगह नहीं ले सकती. मुन्‍नू भी शांत है, उस चाव से न तो खाना खा रहा है और न ही पानी पी रहा है. बुलाने पर बोल रहा है पर वो उछाह नहीं है...

चुन्‍नू-मुन्‍नू मेरी दो प्‍यारी चि‍ड़ि‍या...जि‍नका जोड़ा आज बि‍छड़ गया और मेरा घर सूना हो गया. 


Monday, April 04, 2016

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी: 6

इस औरत को देखते ही विद्या बालन याद गईं और स्वच्छता अभियान के तहत चलाया गया वो विज्ञापन कानों में अपने-आप सुनाई देने लगा. जिसमें विद्या जी कहती हैं, जहां सोच, वहां शौचालय.

ख़ैर ये महिला, अपने सास-ससुर के साथ थी. तीनों को बदरपुर जाना था. पहले घुंघट थोड़ा कम था. ठोढ़ी दिख रही थी लेकिन जैसे ही मेट्रो अशोक नगर पहुंची, सास ने पूरा चेहरा ढक लेने को कहा. बहू ने झट उनकी आज्ञा का पालन करते हुए पूरा चेहरा ढक लिया और शीशे से लगकर बैठ गई.

उसके बाद सास-ससुर आपस में कुछ बात करने लगे. दोनों के बीच कुछ देर बात हुई और उसके बाद सास अपनी बहू को समझाने लगी. राजीव चैक पर बड़ी भीड़ आएगी, पहले ही दरवाजे़ के पास चल चलेंगे. वरना
निकल नहीं पाएंगे. बहू ने कोई जवाब नहीं दिया, उसके बाद सास ने उसे अपनी कोहनी से धक्का मारा...

कोहनी के धक्के से उसकी नींद खुली और वो थोड़ा संभलकर बैठ गई. सास ने कहा, मैं तब से बात किए जा रही हूं और तुम सो रही हो...घूंघट में मुंह डालकर सो रही हो...ये तो अच्छा है की घूंघट में मुंह छिपाकर सोए रहो और हम यहां देखते रहें की अगला स्टेशन कौन...

ऐसा करो, घूंघट बस सिर तक का करो, जब मुंह सबको दिखेगा तो नींद नहीं आएगी...बहू ने घूंघट छोटा किया और तिरछी होकर बाहर की ओर देखने लगी. 

Saturday, March 26, 2016

जिसने पापा का ममता भरा रूप देखा है...

लंच होते ही, वो सबसे कट जाती
दोस्त तो बहुत थे, सच्चे भी थे पर...
फिर भी एक कोने में ही लंच करती.
सबको लगता की वो अपना अच्छा खाना
किसी से बांटना नहीं चाहती...
पर वो अपने लंच से बहता तेल
किसी को दिखाना नहीं चाहती...
गोभी हो या फिर भिंडी, आलू हो या बैंगन
उसकी टिफि़न में सब एक ही शक्ल के दिखते
रोटी, सब्ज़ी के तेल से अधपकी पूड़ी हो जाती.
अक्सर कुछ आलू कच्चे ही रह जाते,
जो रोटी से दबाने के दौरान
फ़र्श पर छिटक जाते...
पर वो खाना अकेले ही खाती...
अक्सर, दूसरों का चाटा अचार मांग लाती
और अपनी रोटी का अंतिम नीवाला
स्वाद लेकर खाती...
पर वो लंच-बाॅक्स भी बेशकीमती था
पापा हर रोज़ कुछ ख़ास लंच बनाने की कोशिश करते
हर रोज़ एक नया एक्सपेरिमेंट करते...
जिस दिन लंच बाॅक्स खाली मिलता, वो जान जाते
फिर आने वाले चार-पांच दिन कुछ नया नहीं, वही बनाते
उस समय, सबके पास बहुत कुछ होता था दिखाने के लिए
पर आज मैं सबसे अमीर हूं...
मेरे पास पापा की वो यादें हैं, जो सौ में से एक के पास हो
मैं उन सैकड़ो में से एक हूं, जिसने पापा का ममता भरा रूप देखा है....

Monday, February 29, 2016

कहो ना प्यार है....और मैं


कल इरोज़ के नए ऐप पर फ्री में कहो ना प्यार है देखी...66वीं बार. आप चाहें तो मुझे दुनिया का सबसे खाली इंसान समझ सकते हैं. पर 66 में से 65 बार उस दौरान देखी, जब रितिक रौशन संग प्यार में थी. कल देखी, पुरानी और मासूम यादों को जि़दा करने के लिए.

याद नहीं उस समय कौन सी क्लास में थी पर कहो ना प्यार है, गाने ने दीवाना कर रखा था. छोटा शहर, न के बराबर संसाधन और ये पहला प्यार...पर ये प्यार क्रश वाला नहीं था. घर में कोई बड़ा भाई नहीं था, इसलिए हमेशा दिल करता था की रितिक रौशन मेरा भाई होता, तो कितना अच्दा होता.

पहली बार ये फिल्म बलिया के किसी सिनेमा हाॅल में देखी थी. गाज़ीपुर लौटी तो दीदी को इतना चढ़ाया की वो भी जि़द पर अड़ गई की उसे भी ये फिल्म देखनी है. ख़ैर किसी तरह मम्मी और पापा दोनों माने, पर जैसे ही हम घर से निकले बारिश होने लगी. पूरी तरह भीग चुके थे हम. मम्मी ने कहा, चलो कोई पिक्च्र-विक्चर नहीं देखनी, घर चलते हैं. मेरा दिल बैठ गया. मैंने कहा, अरे नहीं मम्मी, पापा टिकट ले चुके होंगे.

तब बुक माय शो तो हुआ नहीं करता था, इसलिए पापा पहले ही सिनेमा हाॅल चले गए थे ताकि टिकट मिल जाए. ख़ैर सिर से पांव तक भीगे हम सिनेमा हाॅल पहुंचे. पिक्चर बस शुरू ही हुई थी. 

घर आकर मैंने और दीदी ने घंटो फिल्म के बारे में बातें की. तब की बातें आज की बातों से बिल्कुल अलग थीं, जिसमें हमे हीरे-हीरोइन से लेकर विलेन और दूसरे कलाकार सभी बहुत पसंद आए थे. रोहित वाला रितिक ज़्यादा पसंद आया था. अमीषा का सूट पसंद आया था. चेहरे पर हाथ फेरने वाला सीन पसंद आया था. फाइट पसंद आई थी और कहो ना प्यार है का सिग्नेचर स्टेप पसंद आया था.

कुछ समय बाद ये गाना मेरा लकी गाना बन गया...सुबह-सवेरे आया करता था, डीडी पर. ये पूरा गाना सुने बिना स्कूल नहीं जाती थी. कोका कोला खरीदने पर रितिक की फोटो का कार्ड मिलता था...अब भी याद पूरे 45 थे मेरे पास. उन्हें दीवार पर चिपका दिया था. अख़बार से फोट काटकर दीवार पर चिपका दी थी और कुछ-एकबार उसे अगरबत्ती भी दिखाई थी.

इतना प्यार....फिर किसी अभिनेता से नहीं हुआ...अच्छा लगता है ये सब याद करके की...हम भी कभी बच्चे थे, कुछ भी करने में नफ़ा-नुकसान नहीं सोचा करते थे. किसी को ये साबित नहीं करना होता था की मैं समझदार हूं...बस वही करना होता था, करते थे जो दिल करता था. 

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