Thursday, February 02, 2017

मैं सलमान खान नहीं बनना चाहती, तुम जितना चाहे हंस लो

सबसे पहले, भाई जान आप मुझे बहुत पसंद हो। इतने अधिक कि जिस बिग बॉस को लोग समय की बर्बादी कहते हैं मैंने उसका एक भी एपिसोड मिस नहीं किया। सिर्फ आपके लिए। कभी 15-20 मिनट का छूट जाता तो वूट पर देखा है लेकिन विडंबना देखिए अब राह चलते जब लोग मुझ पर हंसते हैं तो मुझे सिर्फ आप याद आते हैं।

                                          शुरू से बताती हूं।

एक साल पहले पत्रकारिता जैसे प्रफेशन में होने के बावजूद किसी तरह कार खरीदी। सोचा यह था कि कार चलाने आ गई तो कहीं आने-जाने के लिए किसी का मुंह नहीं देखना होगा। ड्राइविंग क्लास ज्वाइन की लेकिन अपनी कार में बैठने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। पति देव रोज़ बोलते आज ट्राई करो लेकिन मेरे पास हर बार एक बहाने होता। कभी बहाना होता कि तुम्हारे साथ की सीट पर बैठने का सुख ही कुछ और है, कभी साथ वक्त बिताना तो कभी यह कहकर टाल देती थी कि एक ही घर से दो-दो गाड़ियां सड़क पर उतरेंगी। पल्यूशन भी बढ़ेगा और जाम भी। हर रोज़ बहाना।

फिर करीब दो महीने पहले उन्होंने सिर्फ इतना कहा, भूमिका एक काम शुरू किया था तुमने, बीच में ही छोड़ दिया। मेरे हारने की हताशा उनके चेहरे पर थी। शनिवार का दिन था, तय किया कि कल चाहे जो हो खुद ही ड्राइव करके जाउंगी। आइडिया शेयर किया तो उन्होंने कहा, चलो। मैं आगे-आगे चलूंगा और तुम पीछे। इस तरह पहले दिन मैं खुद ड्राइव करके ऑफिस पहुंची। लौटते वक्त अकेले बिना मार्गदर्शन के घर आयी। जो खुशी थी, वो सिर्फ मैं ही महसूस कर सकती थी। एक बहुत बड़ा पत्थर धकेल लिया था मैंने।

उसके बाद से रोज जाने लगी। ऑफिस पहुंचती तो एक तय समय पर फोन आता। ठीक से पहुंच गई न? और मैं हर सड़क, हर चौराहे और हर उस गाड़ी की डिटेल शेयर करती जो मेरे पास से गुजरती। किस जगह पर पहुंचकर कौन सा गियर लिया, कब स्पीड कम कर दी यहां तक कि रेड लाइट पर कितने देर रुकी यह भी। आप समझ सकते हैं। पूरा हिसाब-किताब LKG के उस बच्चे वाला जिसने अभी-अभी A से  apple सिखा हो और हर रोज कुछ नए शब्द जान-परख रहा हो।

अभी तीन-चार दिन पहले एक्सीडेंट हो गया। 20 की स्पीड वाली मेरी छोटी ऑल्टो को करीब 80-100 की स्पीड वाली एस्टीम ने ठोंक दिया। मुंह फूटा। पसलियों में चोट लगी। किसी तरह ऑफिस पहुंची। घर फोन किया और कहा गाड़ी ठुक गई है। अब? जवाब आया कोई बात नहीं बन जाएगी। होता रहता है ये सब। तुम ठीक हो न...? 'ठीक हो न' दवा होती है, उसी वक्त मालूम चला लेकिन डर बैठ गया था। किसी तरह उस दिन ऑफिस से घर आई। अगली सुबह डर के मारे कैब से आने का फैसला कर चुकी थी लेकिन मुझसे कहा गया कि आज डर गई तो कभी भी डर से बाहर नहीं आ पाओगी, बस संभलकर जाना। फिर खुद ही ड्राइव करके गई। कई लोगों ने टोका भी कि कल ही लड़ी थी तो आज नहीं आना था लेकिन उन्हें समझा नहीं सकती थी कि मैंने किसी और के भरोसे को सच किया है।

सड़क पर रोज कुछ न कुछ होता है। महिला चालकों को लोग हेय समझते हैं और ऐसे में मेरे जौसे नौसिखिए को तो...जो 40-50 के ऊपर बढ़ती ही नहीं है। आज घर आते वक्त एक मोटर साइकिल वाले ने पलटकर देखा और एक ऐसी हंसी दी कि दिल किया रौंद दूं। दरअसल, वह मेरे पीछे था लेकिन ओवरटेक करके आगे आया, मुझ पर हंसा और निकल गया। मालूम चल रहा था कि उसे मेरी कछुए की चाल पर हंसना आया लेकिन मुझे इसमें कोई हर्ज नहीं लगता।

जिस दिन स्टेयरिंग संभली थी, कसम खायी थी कि मेरी वजह से किसी को चोट नहीं आनी चाहिए। कार को मैकेनिक के पास भेजकर ठीक करा लेंगे, लेकिन इंसान का मैकेनिक तो ऊपर है न। वहां जाकर कोई आएगा थोड़े। दिक्कत यह है कि सल्लू भाई ने तेज स्पीड और नशे में लोगों को कुचल दिया। जो कुचले उनका सबकुछ तबाह हो गया, पर लोगों ने उन्हें देखकर कभी ऐसी हंसी नहीं होगी लेकिन एक इंसान जो सीख रहा है,  इस सोच के साथ की टशन के चक्कर में किसी की जान नहीं लेगा...आपको उस पर बड़ा हंसी आ रही है।

...तो भाई साब जितना चाहे हंस लो क्योंकि न तो मैं सलमान खान हूं जो मारकर भी सजा नहीं पाउंगी और मैं अब भी ह्यूमन ही हूं...सो किसी को चोट लगेगी तो खुद भी दर्द महसूस करूंगी। इसलिए आप हंसते रहिए लेकिन हमसे न हो पाएगा, उन जैसा बनना....

Thursday, July 21, 2016

हम इकट्ठे होते हैं लेकिन सिर्फ तब जब जनाजे उठते हैं...

भाभी जान कैसी हैं आप...?

शादी के बाद भाभी तो कई लोगों ने कहा लेकिन भाभी जान...मन में पहला ख्याल यही आया कि इस लड़के के घर में भाभी को वाकई मां का दर्जा दिया जाता होगा. वरना हमारे यहां के तो ज्यादातर लड़के भउजी के साथ सिर्फ फगुआ ही खेलना सीखते हैं.

पतला-दुबला, गोरा सा वो लड़का सामने बैठा था. पानी पीकर उसने ग्लास टेबल पर नहीं, ट्रे में रखी. चाय पूछा तो बोला, मुझे यहां की चाय अच्छी नहीं लगती. मैं ट्रे रखने किचन में चली गई और वो बैठकर बातें करने लगा.

थोड़ी देर बाद मैं भी उनके साथ ही बैठ गई. मुझे पता था कि वो कश्मीर से आया है. मैंने उससे पूछा आपको तो यहां अच्छा नहीं लगता होगा न...वहां कितनी खूबसूरती है. फ्रेश एयर... सबकुछ नेचुरल. यहां तो बस शोर और धुंआ. मुझे पूरा यकीन था कि वो हां ही कहेगा. वैसे भी कोई रहने वाला चाहे जहां का हो, उसे पसंद अपना ही जिला होता है. पर उसने कहा नहीं...उसे नोएडा में रहना बहुत पसंद है. उसे यहां आकर लगा कि वो आजाद है.

मेरे मुंह से निकला आजाद हैं मतलब?

मतलब, पहली बार मैं हर काम टाइम पर करता हूं. 9 बजे उठता हूं, ऑफिस जाता हूं. ऑफिस खत्म करके मन करता है तो घर आता हूं नहीं तो घूमने चला जाता हूं. कभी भी कुछ भी कर सकता हूं. वहां ऐसा नहीं है. वहां किसी काम को करने का कोई टाइम फिक्स नहीं कर सकते. कभी कर्फ्यू खत्म होने का वेट करते हैं तो कभी गोलीबारी के रुकने का.

हम लोग घर में रहकर भी एक कान बाहर रखते हैं. हर समय कोई न कोई अनाउंसमेंट होती रहती है. सुनना भी जरूरी है. नहीं तो पता चला कि घर के बाहर निकल गए, गोली मार दी गई. जब गोली चलती है तो एक्सक्यूज थोड़े सुनता है कोई.

फिर भी कश्मीर तो कश्मीर है न...मैंने उस कश्मीर को सोचकर ये बात कही थी जिसे इंडिया का स्वीट्जरलैंड कहते हैं.

उसने बताया ऐसा नहीं है भाभी...वहां चीजें अच्छी हैं. जगहें अच्छी हैं लेकिन माहौल नहीं.

जब मैं यहां आया था तो एक रिश्तेदार के साथ रहता था. कुछ ही दिन था. उनका बच्चा रोज स्कूल नहीं जाने के लिए रोता था. मुझे बहुत अजीब लगता था ये सब क्योंकि हम तो स्कूल जाने के लिए रोते थे. स्कूल जाते थे और पता चलता था कि स्कूल बंद करने का फरमान आ गया है. बहुत दुख होता था. यहां तो कितनी वेकेशंस हैं...समर, विटंर...पता नहीं क्या-क्या. हमारे यहां वेकेशन की नौबत ही नहीं आती. जब देखो तब छुट्टी.

फिर बताने लगा कि जब  यहां आया तो राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर लोगों का हुजूम देखकर डर गया. सोचा किसी ने बम रख दिया तो सब मर जाएंगे. भीड़ देखकर पहला ख्याल बम का आाता है. उसके बाद कुछ और...क्योंकि हमारे यहां लोग इक्ट्ठा होने में डरते हैं. उनके जहन में ये बात रहती है कि जहां भीड़ होगी वहीं बम फोड़ दिया जाएगा. वहां लोग जमा होते हैं लेकिन जनाजे उठाने के लिए. वो भी दिल को ये तसल्ली देकर कि हमला करने वाले भी ये सोचेंगे कि कोई मर गया है. अभी कुछ नहीं करना चाहिए.

वो सुना रहा था हम सुन रहे थे. फिर चुप हो गया. ये वाले कश्मीर के बारे में कोई नहीं बोलता. बहुत दिक्कतें हैं वहां. बहुत ज्यादा. यहां तो सब कितना ईजी है. घर भी आसानी से मिल जाता है. वरना वहां पर तो बहुत सी ऐसी जगहें हैं जहां घर ही नहीं ले सकते.

फिर वो चुप हो गया. बोला आप लोगों को सब अजीब लग रहा होगा न...पर कश्मीर ऐसा ही है. वहां लोगों की जिंदगी छिपते और बचते ही निकल जाती है. जो बाहर निकल जाते हैं, समझ जाते हैं आजादी किसे कहते हैं और फिर लौटते नहीं है. आते भी हैं तो मेहमान की तरह...जैसे मैं. अम्मी-पापा को भी लाना चाहता हूं, बस थोड़ा सेटल हो जाऊं.

वो वहां से बाहर कभी गए ही नहीं...अब रोज जब मैं उन्हें यहां की बातें बताता हूं तो उन्हें यकीन ही नहीं होता है कि चीजें इतनी आसान हैं. कितना आसान है बाहर निकलना, देर रात तक घूमना. आईडी रखना जरूरी है लेकिन नहीं रखे तो भी चल जाता है. वहां की तरह आईडी नहीं होने पर पकड़े जाने का डर नहीं है.

उन्हें इस आजाद देश के बारे में कुछ पता ही नहीं है...

Wednesday, June 01, 2016

बृहस्पतिवार की व्रत कथा

पूजा की आसनी पर बैठी, तो लगा की अम्मा पास ही बैठी है. सिर पर आंचल रखे, ख़ासतौर पर पीली साड़ी पहने, दोनों हाथों को पैर के बीच में जोड़े.

आज से करीब तीन साल पहले, वो दिल्ली रहने आई थी. उस वक्त बुआ की शादी नहीं हुई थी और हम मुखर्जी नगर के परमानंद इलाके में रहते थे. अम्मा आई तो अपने सारे ढेर सारे भगवान लेकर आई. जितने भगवान, उतनी ही आरती की किताबें, चालीसा, रोरी, चंदन, घी वाली बत्ती, अक्षत, किशमिश, चना, गुड़, काला तिल, गंगाजल और कुछ एक-दो और सामान...

एक छोटा सा नारंगी रंग का झोला था, जिसमें भगवान का ये सारा सामान भरा होता था. पूजा के सामान अम्मा सब कुछ सज देती और पूजा पूरी करने के बाद सबकुछ समेटकर झोले में डाल देती.

जब अम्मा आई तो उस समय तक घर में भगवान के लिए कोई जगह नहीं थी. अम्मा का कहना था, इतने बड़े घर में खुद रह रही हो और भगवान के लिए एक कोना भी नहीं है.

धीरे-धीरे अम्मा ने अतिक्रमण करके हमारी किताब वाली आलमारी का पहला खाना हथिया लिया और वो पूजा घर न सही पर पूजा-खाना बन गया.सारे भगवान थे. शायद मक्का की भी एक तस्वीर थी, बुआ को किसी ने दी होगी. वो तस्वीर भी स्वर्ण मंदिर के साथ उसी खाने में थी. अम्मा सबको चंदन लगा देती थी.

हर रोज़ हनुमान चालीसा, दुर्गा सप्तशती, गणेश चालीसा, गायत्री चालीसा और शिव चालीसा का पाठ करती थी. मज़ेदार बात ये थी की अम्मा पढ़ी-लिखी नहीं थी. लेकिन हम बच्चों के साथ रह-रहकर अक्षर जोड़कर पढ़ लेती थी. लेकिन चालीसा पढ़ने में उसे कोई दिक्कत नहीं होती थी.

वो पन्ने पलटती थी लेकिन सिर्फ पलटने के लिए, वो सारे ग्रंथ, उसने सुन-सुनकर याद कर रखे थे. उस बार अम्मा करीब दो महीने रही. एक दिन ऐसे ही बात शुरू हुई तो अम्मा ने बृहस्पतिवार की कथा करने का प्रपोज़ल रख दिया. 

देव गुरू प्रसन्न होते हैं. विद्या और धन-धान्य से पूर्ण करते हैं...ना-ना प्रकार के किस्से सुनाए और हामी भरवा ली. तय हुआ की हर गुरूवार को कथा होगी. किताब पढ़ने की जि़म्मेदारी मेरी. 

गुरूवार का दिन आया. अम्मा को दुनिया की आधी बीमारियां थी लेकिन फिर भी अपने मरने के एक दिन पहले तक वो जितना हो सकता था, सारा काम करती रही. उस गुरूवार को अम्मा पांच बजे ही उठ गई. खुद उठी, पूजा का सारा सामान सजाया और उसके बाद मुझे नींद से जगाया. नेहा उठ...जो नहा ले...कहानी कहे के बा न. साबुन जिन लगइह...खाली पानी से नहा लिह...सरफ से कपड़ा मत धोइह...

इतनी सारी बातों को समझने के बाद नहाने गई. नहाकर निकली तो अम्मा बोली कौउनो पीर कपड़ा पहिर ल...उसके बाद हम पूजा करने बैठ गए.

अम्मा चुपचाप कहानी सुनती, बीच-बीच में कुछ -कुछ करती रहती. कभी दीया ठीक करती, कभी अक्षत हाथ में थमाती...कभी कुछ. कई बार कहानी पढ़ने में देर होने लगती तो मैं एक दो कहानियों का बंक मार देती लेकिन अम्मा को शक़ हो जाता. पूछती, आज उ लीलावती वाला कहनी ना कहलू ह का...और मैं तुरंत मुस्कुरा देती.

वो समझ जाती की मैंने गोला दिया है...बुआ साथ नहीं बैठती, पर कहानी सुनती रहती थीं. हर बार पूजा ख़त्म होने पर कहती, अम्मा रे, इ भगवान हउंव की कुछु और...हर बतिये पर शाप दे देवे न...

अम्मा को ये सब सुनना कभी अच्छा नहीं लगता और वो बोलती, चला इह कुल चलल आवत बा...तोहन लोगन के त कुछु मनही के ना ह...

आज खुद से ये पूजा की...अम्मा को याद करते हुए...आज अगर वो होती और मैं फोन पर उनको ये बताती तो वो कहती, चल...नीक कइलू, भगवान तोहके खूब खुस रखें...हमार बछिया के कौनो दुख मत देवें..

Wednesday, May 25, 2016

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी - 7

आज मेट्रो की भीड़ में एक बहुत अच्छी तस्वीर मिली.

अमूमन बच्चा संभालना, औरतों का काम माना जाता है. ये मौन घोषणा न जाने किसने कर रखी है की बच्चे की देखरेख, सू-सू-पाॅटी, दूध, नैपी, नहाला-धुलाना, मालिश और सुलाना, हर काम मां ही करेगी.

अपवाद बहुतेरे हैं लेकिन जहां तक सोच की बात है, ये जि़म्मेदारी मां की समझी जाती है. मां को थोड़ी राहत देने के लिए घर की दूसरी महिलाओं को नियुक्त किया जाता है लेकिन पिता को हमेशा से अंतिम विकल्प ही माना जाता रहा है.
पुराने समय में तो इस नियम के होने का कारण पता चलता है की औरतें केवल घर का काम देखती थीं और पुरूष बाहर का तो, बच्चे पालना मां का ही काम था. पर अब जबकि शहरों में इंजन के दोनों पहिए गाड़ी खींचने के लिए सुबह ही दौड़ पड़ते हैं तो, पिता की भी बराबर की भागीदारी तो बनती ही है.

ख़ैर मकसद ज्ञान देना बिल्कुल नहीं था. बस इस तस्वीर को देखकर जो महसूस किया वही लिखा. आज किस्मत से सीट मिल गई थी. न जाने क्यों मेट्रो थोड़ी खाली थी. मेरे ठीक सामने की सीट पर एक मां-बेटे बैठे थे और एक छोटा सा बच्चा.साल-दो साल का रहा होगा. समने बैठा शख़्स बमुश्किल 25 से 30 साल का होगा. या फिर उससे भी कम. लेकिन भरी मेट्रो में जहां लड़के, लड़कियों को इम्प्रेस करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं, वहां ये लड़का बच्चा संभाल रहा था.

बच्चे को पूरे दुलार से गोद में बिठाए हुए था. उसके बाद उन वृद्धा से दूध की बोतल मांगी और बच्चे को गोद में बिठाकर दूध पिलाने लगा. 

दूध पिलाने के दौरान उसने सबसे पहले बोतल को रूमाल से ढंका, जैसा आमतौर पर गांव-घर की औरतें करती हैं. बच्चे को खांसी आई तो उसका सिर सहलाया और उस पर फूंक मारी.

ये सब देखकर बहुत अच्छा लगा. सामने बैठे शख़्स को लेकर इज़्जत बढ़ गई की ये दिखावे से दूर है. उसे दुनिया की चकाचैंध और घुड़दौड़ में शामिल होने का शौक नहीं है. उसके लिए उसका परिवार ही सबकुछ है...

Sunday, May 08, 2016

माई मरे...मौसी जि‍यावे

पूर्वांचल में एक कहावत है, माई मरे मौसी जि‍यावे. मतलब जि‍सकी मां मर गई हो, उसकी मौसी उसके लि‍ए यशोदा मइया बन जाती है.

पर आज मदर्स डे के मौके पर यूं ही बुआ से बात करते-करते बॉलीवुड की ऐसी ही एक मां और मौसी का जि‍क्र सामने आ गया. बॉलीवुड की एक ऐसी मां, जि‍सके बारे में बहुत कम लोग ही जानते होंगे. हालांकि‍ मौसी तो खासा लोकप्रि‍य हैं लेकि‍न इसे उनके अभि‍नय का कमाल कहें या फि‍र हमारी असंवेदनशीलता की उनका असली नाम बहुत कम ही लोगों को मालूम होगा.

लीला चि‍टणीस, अपने वक्‍त से दशकों आगे की सोच रखने वाली महि‍ला थीं. आप अंदाज़ा लगाइए 1909 में पैदा हुई एक लड़की, जि‍सका पहला पति‍ बेवफ़ा नि‍कल जाए, बीवी को छोड़कर बाहर कि‍सी और औरत से संबंध रखे, तो...उस समय में औरतों के लि‍ए कहा जाता था की वो पति‍ के घर डोली में जाती हैं और अर्थी पर बाहर आती हैं..लेकि‍न लीला ने पति‍ की बेवफ़ाई सहने के बजाय तलाक़ लेना पसंद कि‍या. दुर्भाग्‍य था की दूसरा पति‍ भी वैसा ही नि‍कला. लीला ने तीसरी शादी की और उसके बाद ज़ि‍न्‍दगीभर अपने बच्‍चों की ख़ाति‍र कैमरे के सामने डटी रहीं.

एक बहुत ही ज़रूरी बात, उस समय में अभि‍नय खलीहरों और अवारा लोगों का पेशा माना जाता था. जब लीला ने अभि‍नय शुरू कि‍या तो, बकायदा टाइम्‍स ऑफ इंडि‍या में इश्‍ति‍हार दि‍या गया की, इंडस्‍ट्री की पहली पढ़ी-लि‍खी, बी.ए. पास अभि‍नेत्री. खूबसूरती के मामले में भी उनका कोई सानी नहीं था. जि‍स लक्‍स साबुन को हम हीरोइनों के चेहरे से पहचानते हैं और जि‍सका वि‍ज्ञापन पाना हर हीरेइन का सपना होता है, उसकी पहली अंबेसडर लीला ही थीं. 

1941 में पहली बार वो इस ब्रांड का चेहरा बनीं. चार बच्‍चों की मां, 30 से ज्‍यादा की उम्र और बि‍ना कि‍सी बोटोक्‍स ट्रीटमेंट के वो नौजवानों के सपनों की रानी बन चुकी थीं. देवि‍का रानी तब तक पूरी तरह स्‍थापि‍त हो चुकी थीं लेकि‍न लीला ने आते ही उनकी कुर्सी को चुनौती दे दी. धुंआधार उनकी पहली फि‍ल्‍म रही और उन्‍होंने अभि‍नय को लेकर कई प्रयोग कि‍ए. वो जंटलमेन डाकू में डाकू भी  बनीं. उसके बाद उन्‍होंने मां के कि‍रदार नि‍भाने शुरू कि‍ए. उनकी लोकप्रि‍यता का अंदाज़ा लगाइए की 2003 में जब उनका नि‍धन  हुआ तो टाइम मैगज़ीन ने उन्‍हें मदर्स ऑफ मदर कहकर श्रद्धांजलि‍ दी. उन्‍होंने देवानंद, दीलि‍प कुमार और राजकपूर की मां की भूमि‍का नि‍भाई.



लेकि‍न जि‍न बच्‍चों के लि‍ए उन्‍होंने जि‍न्‍दगी का एक बड़ा हि‍स्‍सा मेक-अप करने और उतारने में बि‍ता दि‍या, उनकी आखि‍री घड़ी में उनका कोई बच्‍चा उनके घावों पर मरहम लगाने के लि‍ए भी मौजूद नहीं था. न अपनी औलाद पहुंची और न ही सि‍नेमाई...

और अब मौसी...

मौसी से एक ख़ास लगाव है...पढ़ने के बाद पता चला की वो गाज़ीपुर की थीं. वही गाज़ीपुर जहां बचपन बीता..दरअसल, बसंती की मौसी का असली नाम लीला मि‍श्रा था. 

बचपन का शौक़ कब जुनून बन गया और उसके बाद करि‍यर...ये कि‍सी को पता ही नहीं चला. पहली फि‍ल्‍म गंगावतरण रही. एक अच्‍छी अभि‍नेत्री होने के साथ ही मौसी को लोग उनके बेबाकपन के लि‍ए भी जानते थे और डरते भी थे. 

आज मदर्स डे पर बॉलीवुड की इस मां और मौसी को याद करते हुए..

साभार- बॉम्‍बे टॉकी

Saturday, May 07, 2016

अब सपनें ही तुम्हारा पता हैं...

अक्सर तितली का उड़ना,
चिडि़यों का चहचहाना
तुम्हारी याद दिला जाता है...
कई बार सोचती हूं, तुम होती
तो मेरे दिन की शुरूआत कैसे होती...
पहले तो तुम प्यार से उठाती...
पर तब भी जब मैं रज़ाई नहीं हटाती
तो तुम डांटती...
उस डांट का सारा मक़सद मुझे 
नाश्ता कराकर भेजना होता.
नहाने के बाद जैसे ही मैं तैयार हो जाती 
तुम नाश्ते के साथ लंच भी थमा देती
इस झिड़की के साथ की याद से खा लेना
आॅफिस के गेट पर पहुंचते ही तुम्हें न जाने 
कैसे पता चल जाता और मेरा मोबाइल बज उठता
दोपहर में स्कूल की घंटी की तरह
तुम भी मोबाइल की घंटी बजा देती, खाना खाया...
6 बजे के आॅफिस में अगर पांच मिनट भी अधिक होता
तो तुम मालिकान को बुरा-भला कहना शुरू कर देती
रास्ते में दो बार तो फोन जरूर करती
घर पहुंचते ही, तुम पुलिस सी बन जाती
स्ुबह से लेकर शाम तक तुम्हारी बेटी किससे मिली,
कैसे मिली, क्या किया सबकुछ पूछती...
खुद दिनभर काम करती रहती, पर मेरी थकान को 
चेहरे से ही पढ़ लेती...
हम साथ चाय पीते, गप्पे मारते और फिर "घर का पका" खाते
मैं तब भी सोने के लिए तुम्हारा ही हाथ खोजती
हां, पर मेरे सपनों में तुम कहीं नहीं होती....
और अब...
सपनें ही तुम्हारा पता बन चुके हैं...

Wednesday, April 20, 2016

आज वो बि‍छड़ गया और घर सूना हो गया

कल दोनों के बीच जमकर लड़ाई हुई...ऐसा मुझे लगा. लड़ाई इस कदर थी की मुझे उठकर आना पड़ा और उन्‍हें डांट लगानी पड़ी.

डांटने के बाद एक उपर जाकर बैठ गई और एक नीचे. रात को मामला शांत कराया. पर आज की सुबह दोनों की आवाज़ गायब थी. वरना हर रोज़ दोनों सुबह साढ़े पांच चि‍ल्‍लाना शुरू कर देती थीं. इतना चि‍ल्‍लाती थीं की साथ के कमरे में सोने वालों की भी नींद हराम हो जाती थी और मुझे उन्‍हें दाना-पानी देकर चुप कराना पड़ता था.

पर आज कोई आवज़ नहीं थी...इसी धोखे में आंख भी नौ बजे खुली. हर रोज की तरह सबसे पहले उनके पास पहुंची...देखा तो एक जालि‍यों पर बैठा था और दूसरा उपर..पहला, दूसरे को रह-रहकर हि‍ला रहा था...पर दोनों शांत थे. दूसरा सि‍र लटकाए बैठा था. 

खाना खाने की कोशि‍श कर रहा था, पर सि‍र भी नहीं उठा पा रहा था.

काफी देर तक उसे नि‍हारती रही...वो नहीं उठा. उसे सूरज की रौशनी दि‍खाई, ये सोचकर की सूर्य के प्रताप से उसका सि‍र उठ जाए, पर ऐसा नहीं हुआ और मेरे देखते-देखते उसके पैर मुड़ गए, उसने सि‍र डैनों में छि‍पा लि‍या और हमेशा के लि‍ए सो गया.

उसे बाहर नि‍काला, उसने अपने पैरों को अपनी जगह से उस वक्‍त तक भी जमा रखा था. उसे बाहर नि‍काला, पेपर मे लपेटा और ज़मीन में हमेशा के लि‍ए सुला दि‍या. उसे वि‍दा करके लौटी तो दूसरे को देखकर ज्‍़यादा रोना आया...अकेला...तन्‍हा. आज उसके पास लड़ने के लि‍ए कोई नहीं था.

सोचा उसे बोल दूं की तुम भी चले जाओ...अकले रहकर क्‍या करोगे. आज़ाद कर दि‍या, घंटों बैठकर उसे दूर से ही नि‍हारती रही...पर वो गया ही नहीं. मेरी ओर देखा और चीखना शुरू कर दि‍या. लगा, इस दुनि‍या में मेरे अलावा उसका कोई नहीं...

आज मदर्स डे पर मेरा चुन्‍नू चला गया. लालकि‍ले से ले आई थी उन्‍हें... रोज़ का रूटीन बन गया था. मां की तरह उन्‍हें सुबह नहलाना-धुलाना दाना-पानी देना. फि‍र थोड़ी गपशप करना और ऑफि‍स चले जाना. घर लौटते ही दोनों चीखना शुरू कर देते थे. मानों दि‍न भर की रि‍पोर्ट दे रहे हों.


आज चुन्‍नू के जाने के बाद मैं और मुन्‍नू अकेले हैं. चाहकर भी मुन्‍नू के लि‍ए चुन्‍नू की जगह नहीं ले सकती. मुन्‍नू भी शांत है, उस चाव से न तो खाना खा रहा है और न ही पानी पी रहा है. बुलाने पर बोल रहा है पर वो उछाह नहीं है...

चुन्‍नू-मुन्‍नू मेरी दो प्‍यारी चि‍ड़ि‍या...जि‍नका जोड़ा आज बि‍छड़ गया और मेरा घर सूना हो गया. 


Monday, April 04, 2016

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी: 6

इस औरत को देखते ही विद्या बालन याद गईं और स्वच्छता अभियान के तहत चलाया गया वो विज्ञापन कानों में अपने-आप सुनाई देने लगा. जिसमें विद्या जी कहती हैं, जहां सोच, वहां शौचालय.

ख़ैर ये महिला, अपने सास-ससुर के साथ थी. तीनों को बदरपुर जाना था. पहले घुंघट थोड़ा कम था. ठोढ़ी दिख रही थी लेकिन जैसे ही मेट्रो अशोक नगर पहुंची, सास ने पूरा चेहरा ढक लेने को कहा. बहू ने झट उनकी आज्ञा का पालन करते हुए पूरा चेहरा ढक लिया और शीशे से लगकर बैठ गई.

उसके बाद सास-ससुर आपस में कुछ बात करने लगे. दोनों के बीच कुछ देर बात हुई और उसके बाद सास अपनी बहू को समझाने लगी. राजीव चैक पर बड़ी भीड़ आएगी, पहले ही दरवाजे़ के पास चल चलेंगे. वरना
निकल नहीं पाएंगे. बहू ने कोई जवाब नहीं दिया, उसके बाद सास ने उसे अपनी कोहनी से धक्का मारा...

कोहनी के धक्के से उसकी नींद खुली और वो थोड़ा संभलकर बैठ गई. सास ने कहा, मैं तब से बात किए जा रही हूं और तुम सो रही हो...घूंघट में मुंह डालकर सो रही हो...ये तो अच्छा है की घूंघट में मुंह छिपाकर सोए रहो और हम यहां देखते रहें की अगला स्टेशन कौन...

ऐसा करो, घूंघट बस सिर तक का करो, जब मुंह सबको दिखेगा तो नींद नहीं आएगी...बहू ने घूंघट छोटा किया और तिरछी होकर बाहर की ओर देखने लगी. 

Saturday, March 26, 2016

जिसने पापा का ममता भरा रूप देखा है...

लंच होते ही, वो सबसे कट जाती
दोस्त तो बहुत थे, सच्चे भी थे पर...
फिर भी एक कोने में ही लंच करती.
सबको लगता की वो अपना अच्छा खाना
किसी से बांटना नहीं चाहती...
पर वो अपने लंच से बहता तेल
किसी को दिखाना नहीं चाहती...
गोभी हो या फिर भिंडी, आलू हो या बैंगन
उसकी टिफि़न में सब एक ही शक्ल के दिखते
रोटी, सब्ज़ी के तेल से अधपकी पूड़ी हो जाती.
अक्सर कुछ आलू कच्चे ही रह जाते,
जो रोटी से दबाने के दौरान
फ़र्श पर छिटक जाते...
पर वो खाना अकेले ही खाती...
अक्सर, दूसरों का चाटा अचार मांग लाती
और अपनी रोटी का अंतिम नीवाला
स्वाद लेकर खाती...
पर वो लंच-बाॅक्स भी बेशकीमती था
पापा हर रोज़ कुछ ख़ास लंच बनाने की कोशिश करते
हर रोज़ एक नया एक्सपेरिमेंट करते...
जिस दिन लंच बाॅक्स खाली मिलता, वो जान जाते
फिर आने वाले चार-पांच दिन कुछ नया नहीं, वही बनाते
उस समय, सबके पास बहुत कुछ होता था दिखाने के लिए
पर आज मैं सबसे अमीर हूं...
मेरे पास पापा की वो यादें हैं, जो सौ में से एक के पास हो
मैं उन सैकड़ो में से एक हूं, जिसने पापा का ममता भरा रूप देखा है....

Monday, February 29, 2016

कहो ना प्यार है....और मैं


कल इरोज़ के नए ऐप पर फ्री में कहो ना प्यार है देखी...66वीं बार. आप चाहें तो मुझे दुनिया का सबसे खाली इंसान समझ सकते हैं. पर 66 में से 65 बार उस दौरान देखी, जब रितिक रौशन संग प्यार में थी. कल देखी, पुरानी और मासूम यादों को जि़दा करने के लिए.

याद नहीं उस समय कौन सी क्लास में थी पर कहो ना प्यार है, गाने ने दीवाना कर रखा था. छोटा शहर, न के बराबर संसाधन और ये पहला प्यार...पर ये प्यार क्रश वाला नहीं था. घर में कोई बड़ा भाई नहीं था, इसलिए हमेशा दिल करता था की रितिक रौशन मेरा भाई होता, तो कितना अच्दा होता.

पहली बार ये फिल्म बलिया के किसी सिनेमा हाॅल में देखी थी. गाज़ीपुर लौटी तो दीदी को इतना चढ़ाया की वो भी जि़द पर अड़ गई की उसे भी ये फिल्म देखनी है. ख़ैर किसी तरह मम्मी और पापा दोनों माने, पर जैसे ही हम घर से निकले बारिश होने लगी. पूरी तरह भीग चुके थे हम. मम्मी ने कहा, चलो कोई पिक्च्र-विक्चर नहीं देखनी, घर चलते हैं. मेरा दिल बैठ गया. मैंने कहा, अरे नहीं मम्मी, पापा टिकट ले चुके होंगे.

तब बुक माय शो तो हुआ नहीं करता था, इसलिए पापा पहले ही सिनेमा हाॅल चले गए थे ताकि टिकट मिल जाए. ख़ैर सिर से पांव तक भीगे हम सिनेमा हाॅल पहुंचे. पिक्चर बस शुरू ही हुई थी. 

घर आकर मैंने और दीदी ने घंटो फिल्म के बारे में बातें की. तब की बातें आज की बातों से बिल्कुल अलग थीं, जिसमें हमे हीरे-हीरोइन से लेकर विलेन और दूसरे कलाकार सभी बहुत पसंद आए थे. रोहित वाला रितिक ज़्यादा पसंद आया था. अमीषा का सूट पसंद आया था. चेहरे पर हाथ फेरने वाला सीन पसंद आया था. फाइट पसंद आई थी और कहो ना प्यार है का सिग्नेचर स्टेप पसंद आया था.

कुछ समय बाद ये गाना मेरा लकी गाना बन गया...सुबह-सवेरे आया करता था, डीडी पर. ये पूरा गाना सुने बिना स्कूल नहीं जाती थी. कोका कोला खरीदने पर रितिक की फोटो का कार्ड मिलता था...अब भी याद पूरे 45 थे मेरे पास. उन्हें दीवार पर चिपका दिया था. अख़बार से फोट काटकर दीवार पर चिपका दी थी और कुछ-एकबार उसे अगरबत्ती भी दिखाई थी.

इतना प्यार....फिर किसी अभिनेता से नहीं हुआ...अच्छा लगता है ये सब याद करके की...हम भी कभी बच्चे थे, कुछ भी करने में नफ़ा-नुकसान नहीं सोचा करते थे. किसी को ये साबित नहीं करना होता था की मैं समझदार हूं...बस वही करना होता था, करते थे जो दिल करता था. 

Monday, January 04, 2016

'कुछ' की भूख

आज अचानक ही मीरा को ये सब याद आ गया. वैसे इतना अचानक भी नहीं था. ऑफि‍स से लौटकर उसे कुछ खाने का दि‍ल कर रहा था. भूख नहीं लगी थी पर कुछ खाने का दि‍ल था. घर पर कुछ भी ऐसा नहीं था, जो वो तुरंत खा ले. बि‍ना पकाए. उसे बचपन के वो दि‍न याद आ गए, जब उसे 'कुछ' की भूख लगा करती थी. 
कुछ इंतज़ाम करने की जगह वो सालों पुराने उस एलबम को खोलकर बैठ गई. जि‍समें उसका वो हंसता-खेलता बचपन-परि‍वार आज भी बसा हुआ है. केवल तस्वीरों में, असलि‍यत में तो सब उसे छोड़ कर जा चुके हैं...वो भी एक साथ. अब न तो उसके पास जानकी है और न ही मम्मी और न पापा. सभी उसे छोड़कर जा चुके हैं.  


वो याद कर रही थी की कैसे बचपन में शाम होते ही उसे 'भूख-सी' लग आती थी...'भूख-सी' क्योंकि उस वक्त दाल-चावल, रोटी-सब्जी या पराठा-अचार खाने का मन नहीं करता था. मन करता था कुछ चटक-मटक खाया जाए. मसलन चिप्स, समोसा, टिक्की या फिर बाहर का कुछ... 
मम्मी को एक दिन के लिए तो मनाया जा सकता था, पर रोज़ तो संभव नहीं ही था.

शाम 4 बजते ही उसकी ये  भूख बढ़ जाती. कहने में उसे डर लगता था, तो मम्मी से सिर्फ इतना ही कहती की कुछ खाने को दे  दो. मम्मी पूछती 'कुछ' मतलब क्या खाना है, तो जवाब होता 'कुछ भी'... 
ये सवाल- जवाब का सिलसिला काफी देर तक चलता...मम्मी थोड़ी देर बाद झुंझला जातीं और कहती 'कुछ भी' मतलब मुझे नहीं पता, नाम बताओ. 
पर नाम बताना तो सीधे शेर के मुंह में हाथ डालने के बराबर होता...इसलिए मुंह बिचकाकर कहती 'कुछ भी' दे दो न...पता नहीं  मम्मी को कैसे, बिना कहे मालूम चल जाता था कि उसे खाने की नहीं जीभ के चटकारे की भूख है. उन्हें अंदाजा हो जाता था, पर वो भी आखिरी समय तक कोशिश करतीं की वो मान जाए और रोटी-पराठा टाइप या दूध पी ले. लेकिन सूजा हुआ थूथन देखकर उनकी आखिरी लाइन  यही होती, जाओ मुंह पिटाओ. 
उसके बाद तो घर में पटनी पर बिछे अख़बारों के नीचे हाथ डालकर सिक्का खोजने की देर होती, लगभग हमेशा ही एक-दो रूपए मिल जाते. नहीं मिलते तो वो मम्मी से ही होली पर बने पापड़ तलने का कह देती. पर त्याग की भावना से.  


एलबम देखते-देखते और इन पुराने ख़्यालों आज अचानक ही मीरा को ये सब याद आ गया. वैसे इतना अचानक भी नहीं था. ऑफि‍स से लौटकर उसे कुछ खाने का दि‍ल कर रहा था. भूख नहीं लगी थी पर कुछ खाने का दि‍ल था. घर पर कुछ भी ऐसा नहीं था, जो वो तुरंत खा ले. बि‍ना पकाए. उसे बचपन के वो दि‍न याद आ गए, जब उसे 'कुछ' की भूख लगा करती थी. 
कुछ इंतज़ाम करने की जगह वो सालों पुराने उस एलबम को खोलकर बैठ गई. जि‍समें उसका वो हंसता-खेलता बचपन-परि‍वार आज भी बसा हुआ है. केवल तस्वीरों में, असलि‍यत में तो सब उसे छोड़ कर जा चुके हैं...वो भी एक साथ. अब न तो उसके पास जानकी है और न ही मम्मी और न पापा. सभी उसे छोड़कर जा चुके हैं.  


वो याद कर रही थी की कैसे बचपन में शाम होते ही उसे 'भूख-सी' लग आती थी...'भूख-सी' क्योंकि उस वक्त दाल-चावल, रोटी-सब्जी या पराठा-अचार खाने का मन नहीं करता था. मन करता था कुछ चटक-मटक खाया जाए. मसलन चिप्स, समोसा, टिक्की या फिर बाहर का कुछ... 
मम्मी को एक दिन के लिए तो मनाया जा सकता था, पर रोज़ तो संभव नहीं ही था. शाम 4 बजते ही उसकी ये  भूख बढ़ जाती. कहने में उसे डर लगता था, तो मम्मी से सिर्फ इतना ही कहती की कुछ खाने को दे  दो. मम्मी पूछती 'कुछ' मतलब क्या खाना है, तो जवाब होता 'कुछ भी'... 
ये सवाल- जवाब का सिलसिला काफी देर तक चलता...मम्मी थोड़ी देर बाद झुंझला जातीं और कहती 'कुछ भी' मतलब मुझे नहीं पता, नाम बताओ. 
पर नाम बताना तो सीधे शेर के मुंह में हाथ डालने के बराबर होता...इसलिए मुंह बिचकाकर कहती 'कुछ भी' दे दो न...पता नहीं  मम्मी को कैसे, बिना कहे मालूम चल जाता था कि उसे खाने की नहीं जीभ के चटकारे की भूख है.

उन्हें अंदाजा हो जाता था, पर वो भी आखिरी समय तक कोशिश करतीं की वो मान जाए और रोटी-पराठा टाइप या दूध पी ले. लेकिन सूजा हुआ थूथन देखकर उनकी आखिरी लाइन  यही होती, जाओ मुंह पिटाओ. 
उसके बाद तो घर में पटनी पर बिछे अख़बारों के नीचे हाथ डालकर सिक्का खोजने की देर होती, लगभग हमेशा ही एक-दो रूपए मिल जाते. नहीं मिलते तो वो मम्मी से ही होली पर बने पापड़ तलने का कह देती. पर त्याग की भावना से.  
एलबम देखते-देखते और इन पुराने ख़्यालों को चुनते-बुनते काफी वक्त बीच चुका था. मीरा की नज़र दीवार पर टंगी घड़ी पर पड़ी, रात के दस बज चुके थे. पूरे तीन घंटे वो उस एलबम को सामने रखकर रोती रही थी और उसे एहसास भी नहीं हुआ था.    


एलबम गीला हो चुका था और उसकी भूख मर चुकी थी... 
एक अच्छी कंपनी में काम करने वाली मीरा अपने घर में अकेले रहती है...हाथ में महंगा मोबाइल, हाथ की लकीरों की तरह हमेशा चि‍पका रहता है...उस रात भी चाहती तो कि‍सी जगह से कुछ ऑर्डर कर सकती थी, पर उसने कुछ भी नहीं मंगाया. 
यादों ने पेट और मन दोनों भर दि‍ए थे और साथ ही वो अच्छी तरह जानती थी उसकी उस 'कुछ' वाली भूख को समझने वाला अब कोई नहीं है...  
उसने लगभग गीला हो चुका एलबम सि‍रहाने रखा और मोटी हो चुकी आंखों को ज़बरन मींचकर नींद आने का इंतज़ार करने लगी...  को चुनते-बुनते काफी वक्त बीच चुका था. मीरा की नज़र दीवार पर टंगी घड़ी पर पड़ी, रात के दस बज चुके थे. पूरे तीन घंटे वो उस एलबम को सामने रखकर रोती रही थी और उसे एहसास भी नहीं हुआ था.    


एलबम गीला हो चुका था और उसकी भूख मर चुकी थी... 
एक अच्छी कंपनी में काम करने वाली मीरा अपने घर में अकेले रहती है...हाथ में महंगा मोबाइल, हाथ की लकीरों की तरह हमेशा चि‍पका रहता है...उस रात भी चाहती तो कि‍सी जगह से कुछ ऑर्डर कर सकती थी, पर उसने कुछ भी नहीं मंगाया. 
यादों ने पेट और मन दोनों भर दि‍ए थे और साथ ही वो अच्छी तरह जानती थी उसकी उस 'कुछ' वाली भूख को समझने वाला अब कोई नहीं है...  
उसने लगभग गीला हो चुका एलबम सि‍रहाने रखा और मोटी हो चुकी आंखों को ज़बरन मींचकर नींद आने का इंतज़ार करने लगी... 

Saturday, May 09, 2015

पीकू, तुम इतनी देर से क्यों आई...?

कल पीकू देखी...

काॅन्स्टीपेशन, लूज़-मोशन...ऐसे शब्द जिनका हिंदी शब्द इस्तेमाल करने में भी हमें हिचक महसूस होती है, शुजीत सरकार ने उसे ही केंद्र बनाकर फिल्म बना डाली...एक ऐसी फिल्म जो आपको किसी एक मोशन में नहीं रखती है, बल्कि आपके भीतर पल रहे सैकड़ों इमोशन्स से आपको जोड़ती है.

फिल्म में बाप-बेटी के प्यार के ढेरों आयाम दिखाए गए हैं. पर निर्देशक ने बड़ी ही खूबसूरती से नारी सशक्तिकरण की बात को भी रख है.

मिस्टर भास्कर भटटाचार्य फिल्म में कम से कम दो-तीन बार कहते हैं, नहीं-नहीं उसको बोलने दो...इतना पढ़ी-लिखी औरत को बोलने से रोकना नहीं चाहिए. फ्रस्टेशन इस नाॅट गुड फाॅर मोशन...

एक ऐसी फिल्म जिसके इतने दिन बाद बनने का अफ़सोस कर रही हूं. सोच रही हूं की ये फिल्म पहले बन जाती और मैं देख पाती तो जि़न्दगी की उस भूल को सुधार लेती...

आज पछतावा हो रहा है...कुछ साल पहले तक, जब अम्मा यानी दादी जि़ंदा थीं तो उनसे इसी मोशन की बात पर कितनी बार लड़ाई हो जाती थी.

उस समय स्कूल में पढ़ा करती थी. मेरा कहना होता था की बाबा-अम्मा को तो घर पर ही रहना है वो बाद में भी वाॅशरूम जा सकते हैं...पर बाबा बागबान के अमिताभ बच्चन जैसे हैं. सर्दी हो या गर्मी बाबा सुबह 7 बजे तक नहा-धोकर तैयार हो जाते हैं. आज भी, 90 की उम्र पार करने के बाद भी.

स्कूल मेरा होता था पर मुझसे पहले बाबा ही तैयार हो जाते थे. लेकिन उनके वाॅशरूम से आने के बाद मैं कभी भी सीधे वाॅशरूम नहीं जाती थी. अम्मा को पकड़ कर ले आती और कहती, जाओ पहले वाॅशरूम देखो, साफ़ होगा तो ही मैं जाउंगी.

ये रोज़ का किस्सा होता था. अम्मा कुछ नहीं कहती थी और चुपचाप वाॅशरूम देखकर आ जाती और कहती, 'जा साफ ह...' 

इसके बाद मैं जाती...कल पीकू देखी तो कितनी ही पुरानी बातों पर पछतावा होने के साथ दुख हुआ. कितना परेशान किया मैंने. पर अम्मा ने कभी भी कुछ नहीं कहा...

घरवाले कहते हैं, जब मैं पैदा हुई थी तो मुझे दस्त लग गई थी. अम्मा ही उस वक्त मेरे पास थी और 24 घंटे मेरी सेवा में लगी रहती थी. बाबा के लिए मैं क्या हूं, ये सिर्फ वो और मैं जानती हूं. वो अक्सर कहते हैं, नेहा तुम पर बहुत भरोसा है. मेरे बाद सब देखना...इतना बहुत है, समझने के लिए की मैं उनका भरोसा हूं.

बाबा हर उस वक्त में मेरे साथ खड़े रहे, जब कोई नहीं था. एक बुजुर्ग कितना बड़ा सहारा होता है, ये अम्मा के जाने के बाद पता चल रहा है.

पीकू में जो कुछ दिखाया गया, वो कहीं न कहीं हम सभी के मन में अपने मां-पिता, दादी-बाबा के लिए होता है. पर अमिताभ का हर बात पर ओवर-रिएक्ट करना, अटेंशन चाहना और पीकू का सबकुछ इतने अच्छे से संभालना, ग्लानि से भर रहा है...बार-बार सोच रही हूं, मैंने उस वक्त ऐसा सब क्यों किया...

काश पीकू, तुम थोड़ा पहले आ जाती. जो चीज़े देखकर और जानकर भी मैं अनदेखा-अनसुना कर रही थी, तुमसे मिलकर शायद वो न करती...

Wednesday, May 06, 2015

सलमान आप मेरी उम्मीद हैं...हमेशा रहेंगे

सलमान मैंने आपकी कोई फिल्म थिएटर में नहीं देखी...मुझे लगता है की आपको एक्टिंग नहीं आती है. आपकी फिल्मों में कहानी नहीं होती है. बिना मतलब का डांस, रोमांस, मज़ाक और नौटंकी होती है. 

मैं उन्हें घर पर डाउनलोड करके देखना भी नहीं पसंद करती...बहुत पकाउ होती हैं, आपकी फिल्में...ऐसा मुझे लगता है. पर आप मुझे हीरो लगते हैं. एक हीरो जो, न तो शाहरूख जैसा रोमांस कर पाता है, न ही अमिताभ जैसा भाव ला पाता है, न उनके जैसा बोल पाता है, न ही रितिक और शाहिद सा डांस कर पाता है, न तो अक्षय जैसा रियल एक्शन कर पाता है और न ही अजय देवगन जैसे आंखों से कमाल कर पाता है.

पर आप मुझे बहुत पसंद हैं. इन सारे अभिनेताओं की फिल्में मैंने हाॅल में देखी हैं, पर आपकी नहीं. लेकिन इनमें से किसी को भी लेकर वो भरोसा कभी कायम नहीं कर सकी की, ये इसी दुनिया के प्राणी हैं और मैं कभी इनसे किसी तरह की मदद के लिए गुहार लगा सकती हूं.

कभी नहीं...पर आपको लेकर ये भरोसा कब और कैसे हुआ ये मुझे नहीं पता...सलमान आपके बारे में पढ़-पढ़कर और सुन-सुनकर ये जाना की आप दोस्तों के दोस्त और ज़रूरतमंदों के लिए उम्मीद भरा हाथ हैं. मैंने आपसे काॅन्टेक्ट करने के लिए कई तरह की वेबसाइट भी सर्च की थी पर कामयाबी नहीं मिली थी.

पर ये उम्मीद हमेशा रही और आज भी है की आपसे मदद मांगने के लिए केवल आपसे मिलने भर की देरी है, आप दिख जाएंगे तो मदद हो जाएगी.

13 साल पहले मैं बहुत छोटी थी. इतनी छोटी की अक्षर जोड़कर पढ़ती थी. आपके बारे में बस टीवी पर ही देखा था. तब आपको लेकर बहुत गुस्सा था और चाहती थी की आपको फांसी हो जाए. पर अब सोच बदल गई है. ये मानती हूं की साल चाहे जितने भी बीत जाएं गुनाह, गुनाह ही रहता है...पर अग़र ग़लती से ग़लती हुई है तो उसके लिए माफ़ी का प्रावधान होना चाहिए.

न्यायपालिका में मेरी पूरी श्रद्धा है. संभवतः इस राष्ट्र में वहीं एक तंत्र है, जिस पर आज भी एक आम इंसान भरोसा कर सकता है. पर इन 13 सालों में मैंने आपका बदलाव देखा है. बहुतों ने देखा हो शायद. इतने बदलाव की लोग आपको सलमान के बजाय भाई कहना पसंद करते हैं. भाई, इस रिश्ते की बहुत अहमियत है, हमारे देश में. 

आज जो फैसला आया, उससे दुखी हूं. जिन पीडि़तो का पक्ष रखकर आपके लिए सज़ा की मांग की गई है, उन्हें तो कुछ नहीं मिला...

सरकारी वकील का एक वीडियो देखा. अपील दायर करने वाली मोहतरमा को देखा...सबको देखकर यही लगा की ये केस एक नामचीन इंसान और नामचीन बनने की चाहत रखने वालों के बीच की लड़ाई भर बनकर ही रह गया था.

पीडि़तों की तो कहीं बात ही नहीं हो रही है. सरकारी वकील, बीएमडब्ल्यू, बचाव पक्ष बस यही सब रह गया है. ख़ैर इस देश में शराब पीकर हर रोज़ लाखों लोग गाड़ी चलाते हैं, एक्सीडेंट करते हैं और भाग जाते हैं...
पर आप 13 साल से न्यायपालिका के आदेशों के अनुसार चलते आए हैं...ये आपके उसी व्यवहार का हिस्सा है, जिसकी वजह से देश का एक बड़ा तबका दुखी है.

पांच साल की सज़ा है...बतौर अभिनेता ये लंबा समय है...संभवतः जब आप बाहर आएं तो कट्रीना और रणबीर की शादी हो चुकी हो. कुछ नए चेहरे आपको अपना आदर्श मानकर इंडस्ट्री में पांव जमाने की कोशिश कर रहे हों...लेकिन आप उस दिन भी भाई ही रहेंगे, क्योंकि फिल्में हिट होती हैं और पिटती भी हैं...पर आप भाई हैं...लाखों ऐसे होंगे जिनका आपसे बिन कहा एक रिश्ता हैं...वो उस वक्त भी आपके साथ ही होंगे...

Tuesday, May 05, 2015

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी 5

आॅफिस जाने की जल्दी में अगर कोई आॅटो रुकवाकर किसी से बात करने के लिए आतुर हो जाए, तो पक्की बात है की कुछ ख़ास होगा. प्रगति मैदान के बड़े वाले हनुमान जी से जैसे ही आॅटो ने टर्न लिया, दूर से बसपा का नीला झंडा दिखाई दिया.

मैं खुश...बसपा के झंडे को देखकर नहीं, बल्कि ये कयास लगाकर की हाथी देखने को मिलेगा. शुभ माना जाता है न...पर जैसे ही आॅटो मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन पहुंचा, असलियत कुछ और ही निकली. 


विकलांग वाली लोहे की साइकिल पर हर पार्टी का झंडा फहरा रहा था. भाजपा, बसपा, कांग्रेस, आप, समाजवादी पार्टी, कम्यूनिस्ट पार्टी और शायद एक-दो और...

सारे झंडे मिलकर छत्र जैसा काम कर रहे थे और बाबा के चारों ओर उनकी साइकिल पर हर प्रमुख हिंदू देवी-देवता की तस्वीर थी. थोड़ी जल्दी थी, इसलिए नाम नहीं पूछ पाई. बस इतना ही पूछा की बाबा, ये सारे झंडे एकसाथ क्यों...जो जवाब आया उसका अंदाज़ा भी आप नहीं लगा सकते...

बाबा ने कहा, हर पार्टी का राज है...चाहे कोई सत्ता में हो या न हो...सभी अपने तरीक़े से शासन कर रही हैं...जब जिसको मौका मिलता है...कर लेता है. झंडा एकसाथ इसलिए लगा रखा है ताकि इनमें से किसी भी शासक की नज़र पड़ जाए तो वो हमें दूसरी पार्टी का समझ नकार न दें...अपना झंडा देखकर खुश हो जाए और हमारा भी कल्याण करे.

भगवान को लेकर उनका काॅन्सेप्ट बहुत मज़ेदार निकला...बोले, जब तक कोई पार्टी का नेता सुध नहीं लेता है तब तक यही मेरा काम चला रहे हैं. लोग समझते हैं, हम कोई बहुत बड़े संत हैं, तो पैर छूते हैं. भगवान की फोटो सोच को यक़ीन करने लायक बना देती है और हमें रोटी मिल जाती है...

मैंने पूछा, बाबा फोटो खींच लूं...बोले खींच लो...पर चाय का पैसा देना होगा...बाबा को दस रूपए थमा, आॅटो में बैठ गई.

आॅटो वाला गुस्सा हो रहा था. बोला मैडम ये सब करोड़पति होते हैं. आपका दिल्ली में घर नहीं होगा पर इनका कहीं न कहीं एक कमरा ज़रूर होगा. धोखेबाज़ होते हैं ये...

पता नहीं जो बाबा ने कहा वो सच था या मेरे आॅटो वाले का कहा...लेकिन बाबा का लाॅजिक मुझे बहुत पसंद आया...




Monday, April 13, 2015

#हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी...- 4

तस्वीर लेने के लिए कैमरा आॅन किया था, लेकिन हिम्मत नहीं हुई की उन जूतों की फोटो ले सकूं ...

तीनों की उम्र 10 से 12 साल के बीच रही होगी...तीनों के पैरों में स्कूल वाले काले, रेक्सीन के जूते थे. जिनकी काली चमड़ी उतर-उतरकर गिर रही थी. उनमें से एक का जूता तो इस कदर घिस चुका था की चमड़े को सपोर्ट करने वाला कपड़ा बाहर आ गया था और उसके नीचे से उसकी हिलती-डुलती उंगलियां साफ़ नज़र आ रही थीं. 

शायद वो किसी रिश्तेदार के यहां जा रहे थे. सामने ही उनका पिता खड़ा था. जिसे देखकर अंदाज़ा लग रहा था की उसके लिए नए कपड़ों का मतलब रेडीमेड गारमेंट की दुकान या कोई माॅल नहीं बल्कि किसी बड़े घर की उतरन है.
वही कपड़े जो छोटे हो जाने, रंग हल्का पड़ जाने या फिर रोएं उभर आने पर कामवाली बाई, पेंटर या फिर झाड़ू लगाने वाले के लिए निकाल दिए जाते हैं. उसका कद पांच फुट ये अधिक नहीं रहा होगा लेकिन उसने पैंट किसी छह फुट के शख्स की पहन रखी थी. 

बच्चे मेट्रो में सफ़र करते हुए खुश थे. छोटी वाली लड़की के अंदर उत्सुकता थी की ये मेट्रों अंतिम छोर पर कैसी हो जाती है...वो बार-बार सीट से उठती और पंजों को ज़मीन पर टिकाकर एड़ी उचकाकर आगे देखने की कोशिश करती...उसके बार-बार ऐसा करने से पिता बुरी तरह चिढ़ रहा था. वो उसे बार-बार धमकी दे रहा था की बैठ जाओ वरना इसी में छोड़कर चले जाएंगे. (उसने ये सबकुछ भोजपुरी में कहा था.)

इसी बीच देखा-देखी लड़का भी हैंडल पर लटकने की कोशिश करने लगा...पिता के सब्र का बांध टूट गया, उसने दोनों को एक-एक थप्पड़ धर दिया...पर दोनों रोए नहीं, मुस्कुराते हुए सीट पर आ बैठे...

बड़ी बहन ने दोनों का हाथ पकड़ा और जो कहा उसे सुनकर...
मान जाओ तुम लोग, वरना पापा भी मम्मी की तरह छोड़कर चले जाएंगे. 
(उसने ये भोजपुरी में कहा था)

चांदनी चौक आ गया और बाप ने सबको कतारबद्ध करके गेट के बाहर कदम रखा...
  

Wednesday, March 18, 2015

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी : 3

आंटी  के पास चार झोले थे... एक उनका चमड़े वाला पर्स, दूसरा लंच-बाॅक्स का बैग, तीसरे में पानी और फल जैसा कुछ रहा होगा पर चौथा झोला बहुत चमकीला था. सुंदर भी. उसका टंगना लेस का था और और चमकीले गोटे से उस पर काम किया हुआ था.

आंटी ने मेट्रो में घुसने के साथ ही लेडीज़ सीट पर अटैक किया और उस पर बैठे लड़के को खड़ा कर दिया. इतने पर भी उन्हें अच्छा नहीं लगा तो उन्होंने कहा क्या तुम इधर हो जाओगी, थोड़ा शीशे से टेक ले लूंगी.

टेक लगाने के साथ ही उनके उस चमकीले झोले से एक रंग-बिरंगी किताब निकली. पाॅकेट-बुक. पाॅकेट बुक दरअसल हनुमान चालीसा थी. पर उसके हर पन्ने पर भावानुकूल चित्र था और सबसे नीचे उसका मतलब लिखा हुआ था. आंटी ने बहुत तल्लीनता के साथ हुनमान चालीसा पढ़नी शुरू की. पूरा ख़त्म करने में उन्हें 10 मिनट के आस-पास लगे होंगे. उसके बाद उन्होंने उसी झोले से शिव चालीसा निकाली और उसे पढ़ना शुरू कर दिया.
सामने ही खड़ा लड़का "बदला मिज़ाज मेरा फूंकते ही..."वाला गाना सुन रहा था. ईयरफोप फट चुका था, या फिर इतना तेज था कि आवाज़ हमें भी आ रही थी. लेकिन आंटी ध्यानमग्न बनी रहीं...

इस तरह से आज का सफ़र हनुमान जी और शिव शंकर के साथ करने का सौभाग्य मिला. इसका एक पहलू ये भी है कि हम इतने व्यस्त हो गए हैं कि भगवान का ध्यान भी करने में टाइम वेस्ट मानते हैं. ये सोचकर किताबें झोले में भर लेते हैं कि मेट्रो में बैठे-बैठे हनुमान चालीसा निपटा ली जाएगी, वैसे भी रास्ता करीब 15 से मिनट का है....

Tuesday, March 17, 2015

#हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमीः 2

उसके चेहरे के बदलते हाव-भाव देख रही थी. उसके हाथें में सोनी-एक्सपीरिया था. बड़ा वाला. कान में हेडफोन, लाल तारों वाला और एक बैक-बैग. जिसे उसने अपने पैरों के बीच में खड़ा कर रखा था. 

मेट्रो में कौन सवार हो रहा है, कौन उतर रहा है, कितनी भीड़ है, कौन छींक रहा है, कौन खांस रहा है...उसे कुछ भी मालूम नहीं चल रहा था. वो अपने में मस्त था. पर उसके चेहरे के हाव-भाव और हाथों की तेज़ी लगातार...पल-पल बदल रही थी.

सब-वे सर्फर खेल रहा था. सोने के सिक्के तो कुछ यूं बटोर रहा था जैसे वो असली हों. सोने के सिक्के छूट जाते तो पछतावा झलक जाता...मिल जाते तो...

आउट होने पर बड़ा दुखी हुआ, जैसे अलीबाबा ने जो खज़ाने का दरवाज़ा खोला था, वो उसके देखते-देखते बंद हो गया. 

एक और बात हुई....होती रोज़ होगी मैंने आज देखी.

मेट्रो में लोग दूसरे के पेपर को पढ़ने में खासा रूचि दिखाते हैं...और अचानक से अगर पन्ना बदल जाता है तो नाराज़गी भी दिखाते हैं....कि मैं तो अभी उसी आर्टिकल पर था, पलट क्यों दिया. जैसे पेपर उन्हीं का हो.
वैसे मेट्रो काॅर्पोरेशन चाहे तो किसी समाचार पत्र से कुछ ऐसा अनुबंध कर सकती है...कि मेट्रो में खबरों के डिस्प्ले की कुछ व्यवस्था हो जाए...

Monday, March 16, 2015

#हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी : 1

घर से निकलती अकेली हूं, पर सड़क पर कदम रखते ही न जाने कितनों का साथ मिल जाता है. आॅटो में बैठने से लेकर, मेट्रो और फिर आॅफिस....कहीं भी अकेलापन नहीं रहता. तमाम तरह के लोग आस-पास मौजूद होते हैं...कोई फोन पर बाॅस को अपनी ग़लत लोकेशन बता रहा होता है, कोई रिश्तेदारों को फोन करके आज का 'काम' पूरा कर रहा होता है तो कोई कुछ....

पर चारों ओर से घिरे होने के बावजूद हर रोज़ कोई एक ही कहानी आपके साथ जुड़ती है. ख़ासकर मेट्रो में. कोई एक ही शख़्स या समूह होता है, जिसे आप पूरे रास्ते फाॅलो करते हैं. आज एक ऐसा ही परिवार मिल गया.
औरत सीट पर बैठी हुई थी. गोद में 6 महीने का एक बच्चा था और उससे लिपटकर ही दूसरा, दो साल का लड़का खिड़की से बाहर देखने में व्यस्त था. गोद वाले बच्चे को वाकई काजल की कोठरी से निकालकर लाया गया था. उसके माथे पर लगा नज़र का टीका पूरे चेहरे पर, उसके नाक से बहते तरल के साथ मिलकर क्रीम बन चुका था. बड़ा बच्चा बार-बार अपनी मां के कान पर पीं-पीं बोलता और मां चिल्लाती. एकबार उसने थोड़ा ज़ोर से ही चिल्ला दिया. बच्चा रोया नहीं, पर नाटक करके, नीचे वाले होंठों को सिकोड़कर जताने लगा की उसे ये पसंद नहीं आया.

मां परेशान हुए जा रही थी...पिता सामने की ओर मुंह किए खड़ा था, वो बार-बार उसकी बुशर्ट खींचती की इन दो बच्चों में से किसी एक को देख लो और वो हर बार भौंहे सिकोड़कर उसे मना कर देता...
पर उसके चेहरे पर सोच की लकीरें इतनी गहरी थीं कि मानों भाग्य ने उसे जन्म से ही त्रिपुट लगाकर भेजा है...बच्चे को देखकर मुस्कुराई तो वो शरमा गया, मानो किसी ने उसकी शैतानी पकड़ ली. पर मेरी मुस्कान उसके लिए शायद कोई उपहार थी, उसने अपनी मां से कहा, देख उ दीदीया हंसत बिया...(देखो वो दीदी हंस रही है). मां ने भी एक फीकी मुस्कान मेरी ओर दी और दोबारा से अपने पति की ओर देखने लगी...

Tuesday, January 27, 2015

वो केवल अमेरिका की प्रथम महिला नहीं हैं, वो मिशेल भी हैं...

ओबामा की भारत यात्रा को कई मायनों में ख़ास माना जा रहा है....इन "कई" मामलों पर उन्हें प्रधानमंत्री जी द्वारा निमंत्रण देने के साथ ही चर्चा शुरू हो गई थी. जो उम्मीद है, उनके जाने के बाद भी महीनों नहीं तो सप्ताहभर तो जारी रहेगी ही.

दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति का यहां से भावविभोर होकर जाना हमारे लिए अच्छी बात है. पर आज ओबामा ने अपने संबोधन में कुछ ऐसी बातें कहीं, जो हर भारतीय मर्द को सोचने पर मजबूर करनी चाहिए...
शुरूआत से शुरू करते हैं...आप में से जिसने भी कल की परेड देखी होगी, उन्होंने मिशेल ओबामा को भी ध्यान से देखा होगा...मिशेल...एक फिट, सतर्क और अपने आस-पास के घटनाक्रम पर नज़र रखने वाली महिला के तौर पर दिखीं. ऐसा होने के लिए जितनी वो तत्पर हैं, उतना ही उनके पति का भी योगदान है.

मिशेल ढेरों समारोहों में शिरकत करती हैं...लोगों से मिलती हैं, बयान देती हैं, अपने पति और अमेरिकी राष्ट्रपति की नीतियों और कामों से प्रत्यक्ष नही तो अप्रयक्ष रूप से जुड़ी रहती हैं...हमने इस समारोह से पहले भी उन्हें कई दफ़ा कई समारोहों में देखा है...वो केवल अमेरिका की प्रथम महिला नहीं हैं, वो मिशेल भी हैं...

पर कल उसी समारोह में हमारे कुछ माननीय मंत्री लोग भी अपनी पत्नियों समेत पहुंचे थे, और उनके करीब बैठने से हम ये अंदाज़ा लगा रहे थे कि वे पति-पत्नी हैं...नाम तो आज भी नहीं पता.

वहीं आज सीरीं फोर्ट में ओबामा के हर संबोधन में मिशेल शामिल थीं. मिशेल, दूर मूक बैठी थीं, पर उनकी आंखें और मुस्कान ओबामा के हर संबोधन पर उन्हें जवाब दे रही थी. ओबामा ने अपना जि़क्र जब भी किया, मिशेल का नाम लिया. मिशेल उस समय क्या महसूस कर रही होंगी, ये औरतें सबसे बेहतर समझ सकती हैं...

वहीं हमारे यहां न जाने क्यों ऐसी मानसिकता है कि औरतें शादी और पार्टी में तो जा सकती हैं लेकिन ऐसे किसी मौके पर नहीं जहां कुछ गंभीर मामलों में चर्चा होनी है. उन मौकों पर भी जहां उन्हें अपनी किसी कामयाबी को अपनी पत्नी से बांटना पड़ सकता है...हमारे यहा केवल बोलने का शौक है कि हर कामयाब मर्द के पीछे एक औरत होती है...पर इसे भरी सभा में या केवल बीवी के आगे स्वीकार करने में भी अपमान ही महसूस होता है...

Thursday, December 04, 2014

आज भी एक पैर उसी पहली सीढ़ी पर है...


मां का चले जाना केवल उसका जाना नहीं होता है...उसके साथ शायद वो हर हक़ चला जाता है, जो उसकी बेटी का हो सकता था. बचपना दिखाना, खाने की फ़रमाइशें करना, कपड़े मांगना, रोने पर मनाये जाने की आस का होना...दूर जाने पर फोन आने की उम्मीद का होना, मां के हाथ का खाना बांटना, बीमार पड़ने पर दवाई के बारे में पूछना, छींक आते ही मां का समझ जाना की तबियत ख़राब है, सबकुछ...

पर उसके जाने के बाद कितनी उधार की जि़न्दगी हो जाती है...छोटे रहो तो बड़ों के कहे के हिसाब से करो. स्कूल में दोस्तों की नकल, काॅलेज में टीचर और साथ पढ़ने वाली लड़कियों की नकल, आॅफिस में साथियों की नकल और प्यार के मामले में टीवी और फिल्मों की नकल....

क्योंकि कोई होता ही नहीं है जो बता दे कि ऐसे करो, वैसे करो...कहने को सब कहते हैं कि मां नहीं तो क्या हुआ, हम हैं न.... लेकिन जि़द, नाराज़गी या दुख में सब मुंह छिपा लेते हैं..

हर बार लगता है ये पुरानी बात हो चुकी लेकिन बचपन कभी पूरा ही नहीं हुआ तो आज भी बचकानी हरकतें बाकी हैं....पर लोग नखरे तो नहीं उठा सकते...वो बस कह सकते हैं बी मैच्योर...जि़न्दगी में बहुत कुछ है करने को...पर आज भी एक पैर उसी पहली सीढ़ी पर है, शायद कभी आगे बढ़ पाए...

Popular Posts