Friday, November 18, 2011

रंगीला फेम से पताका फेम तक....


आज उर्मिला को बस पर देखकर बहुत दुख हुआ। उत्तर प्रदेश परिवहन की पान की पीक से सजी बसों पर, पताका चाय की चुस्कियां लेती उर्मिला पर दया आ गई। बात किसी ऐसी-वैसी उर्मिला की नहीं कर रही हूं... , बात कर रही हूं रंगीला फेम उर्मिला मातोंडकर की। बेहतरीन अदाकारा, लाजवाब डांसर और तराशे हुए बदन की मालकिन आजकल पताका चाय के विज्ञापन में नजर आती हैं...और ये नजर आना भी एक अर्से बाद ही संभव हो सका है। किसी जमाने में जब शायद सेक्सी या हॉट दिखने का मतलब भी नहीं पता था...ये जरूर मालूम था कि उर्मिला जैसा होना बहुत अच्छा होता है। अच्छा, सेक्सी या हॉट होने का अभिप्राय बस इतना ही होता था कि फलां हिरोइन सबसे सुंदर है। 
उर्मिला ने जिस वक्त रंगीला में जलवा बिखेरा था चारों ओर वही नजर आती थी।रंगीला हेयरबैंड, उर्मिला स्टाइल फ्राक, रंगीला चूरन और ना जाने क्या-क्या। हर लोकल प्रोडक्ट पर उर्मिला नहीं तो रंगीला छपा होता था.... बिक्री बढ़ाने के लिए। रिक्शे वाले से लेकर बसों में भी इसी नाम के छोटे-बड़े पोस्टर, पासपोर्ट साइज फोटो चिपके दिख जाते थे लेकिन अब...शायद ये नाम भी एक याद बनकर रह गया है। 
पिंजर, एक हसीना थी जैसी फिळ्मों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाली उर्मिला आज पताका चाय बेचने को मजबूर है। पताका चाय...की क्वालिटी पर कोई सवाल-जवाब नहीं कर सकते क्योकिं वो एक अलग विषय है लेकिन उर्मिला का लोकल ब्रंड के लिए मेहनत करना रास नहीं आ रहा। उर्मिला ही क्या उनके उम्र की हर हिरोइन को बॉलिवुड में आउटडेटेड करार कर दिया जाता है और फिर बड़े-बड़े पर्दों पर नाज़ो-अदा बिखेरने वाली ये हिरोइनें पताका समेत तमाम लोकल ब्राड्स में ब्रांड अंबेसडर बन जाती हैं। 
और ये बात... केवल उर्मिला के लिए ही नहीं है,तब्बू, रानी, प्रीती, सुष्मिता जैसी तमाम अभिनेत्रियां हैं जो बड़े पर्दे को लगभग अलविदा ही कह चुकी हैं। काजोल, ऐश समेत कुछ अपवाद भी हैं जहां हिरोइने शादी के बाद भी इंडस्ट्री में डटी हुई हैं लेकिन ज्यादातर हीरोइनों का यही हाल है कि अब बॉलिवुड उनके लिए भूली गलियों से ज्यादा कुछ नहीं है।
 हमारे- समाज ने औरतों के लिए एक ही समय में २ नियम बना रखे हैं। ब़लिवुड में अगर शादी हो गई तो औरत पुराना माल बनकर एक कोने में फेंक दी जाती हैं और आपके-हमारे समाज में अगर शादी न हो तो औरत में दोष नजर आने लगता है, कुलक्षिणी का टैग लग जाता है। महिला दिवस पर आदर्श महिलाओं के पोस्टर में सुष औऱ ऐश की भी तस्वीर (ग्लैमर वर्ल्ड) दिखाई जाती है लेकिन आदर्श महिला के पीछे की ये सच्चाई भी हमें मालूम होनी चाहिए कि वो आदर्श तब ही तक है जब तक वो शादी न करे। 
बॉलिवुड ने बेहिसाब तरक्की की, नॉर्मल शो से ३ डी और ४ डी तक हो है...गया है लेकिन हिरोइनों को लेकर चला आ रहा ट्रेंड आज भी जस का तस बना हुआ है ट्रेंड से ज्यादा नाइंसाफी शब्द जंचेगा। क्योंकि जो नियम महिला अदाकारों के लिए हैं वो पुरूषों के लिए नहीं हैं। १९६५ में जन्मे किंग खान यानि शाहरूख खान की पहली डेब्यू फिल्म १९९२ में आई थी, लेकिन आज ४६ साल की उम्र में भी शाहरूख सुपर हीरो हैं (रा-वन) हैं और हर सीजन में एक नई हीरोइन के साथ प्यार करते नजर आते हैं। वहीं १९७४ में जन्मी उर्मिला पर अब बुढ़िया होने का टैग लग चुका है, हालांकि उर्मिला बतौर बाल कलाकार १९८० से ही सिने जगत से जुड़ी हुई हैं १९८० में आई कलयुग फिर मासूम में बतौर बाल कलाकार अभिनय किया। लेकिन बतौर हिरोइन उनकी पहली फिल्म नरसिम्हा १९९१ में आई...पर अब वो शाहरूख के मुकाबले या उनके अपोजिट हीरोइन नहीं बन सकती। शाहरूख ही क्या आमिर खां की पैदाइश भी १९६५ की है १९८८ में कयामत से कयामत तक से डेब्यू किया और अपना बॉडिगार्ड भी इसी उम्र का है लेकिन लगभग ९ साल छोटी उर्मिला न तो अब हीरोइन के लायक हैं और न तो बॉलिवुड के लायक। कभी-कभार रिएलिटी शो में नजर आना भी अब छिन सा गया है क्योंकि बॉलिवुड अब छोटे पर्द की ओर भाग रहा है एेसे में टीवी भी उन्हीं चेहरों को पूछ रहा है जो इंडस्ट्री में हिट हैं। बॉलिवुड में रहकर सैकड़ों दिलों की मल्लिका का खिताब पाने वाली उर्मिला और उन जैसी तमाम हिरोइनों के लिए अंतिम मंजिल यही सस्ते प्रोडक्ट्स रह जाते हैं। दुविधा ये है कि शादी कर ली तो करियर चौपट और करियर को देखा तो उम्र के ढ़लान पर जीवन साथी की मुश्किल तलाश...यानि आगे कुंआ और पीछे खाई। उर्मिला के साथ भी कुछ ऐसा ही है...कभी मल्लिका कहलाने वाली आज कैमरे के लिए भी तरस रही है...ऐसे में पताका चाय वालों को शुक्रिया ही कहना पड़ेगा कि बसों पर ही सही लेकिन उर्मिला का चेहरा एकबार फिर दिखने लगा है..लेकिन शायद हीरो-हीरोइनों को लेकर ये भेदभाव बॉलिवुड का सबसे बुरा और कड़वा सच है....। 

  

5 comments:

चंदन कुमार मिश्र said...

हिन्दी सिनेमा में ऐसा होता आया है कि 30-35 तक आते-आते अभिनेत्रियों का समय खत्म हो जाता है और खासकर तब जब अभिनेत्री किसी फिल्मी खानदान से नहीं हो या किसी बड़े अभिनेता के साथ शादी न रचा पाई हो। और वहीं अभिनेता तो अपनी बेटियों के के वर्ष के होने तक भी छाया रहता है। और ध्यान देने लायक बात है कि हालीवुड में भी यह उम्र ऐसी ही है। …गुरुदत्त ने 'कागज के फूल' इसी के लिए बनाई थी……हाँ टिप्पणी करने के लिए लेख के नीचे ही बाक्स देने का विकल्प है। उसे चुन लीजिए, इससे एक क्लिक में टिप्पणी करना सम्भव हो जाता है।

Atul Shrivastava said...

कुछ हद तक आपकी बातों से सहमत....पर यह भी गौर करने वाली बात है कि कई नायक एक दो फिल्‍मों में काम करने के बाद कहीं खो गए पर हेमा मालिनी, रेखा जैसी अदाकारा आज भी लोकप्रिय हैं।
हां ये जरूर है कि नायक शादीशुदा हों तो भी जवां दिलों की धडकन बने रहते हैं पर नायिकाओं को शादी के बाद वो दर्जा नहीं मिल पाता...
रंगीला से ही आपने बात शुरू की तो इस फिल्‍म के नायक यानि आमिर खान की जब पहली फिल्‍म(कयामत से कयामत तक) आई थीं तब वो शादीशुदा थे....
बहरहाल, अच्‍छा लेख।

Rahul Singh said...

भेद-भाव मुख्‍यतः दर्शक-आश्रित होता है.

Atul Shrivastava said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा शनिवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! चर्चा में शामिल होकर चर्चा मंच को समृध्‍द बनाएं....

देवेन्द्र said...

पता नहीं इसे भेद-भाव कहें या अच्छी, नारी अभिव्यक्ति से पूर्ण व सशक्त स्क्रिप्ट का हमारी फिल्मों में प्रायः अभाव।

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