Tuesday, May 13, 2014

छोटी स्‍कर्ट..

देश के एक बहुत बड़े इलाके में आज भी आर्ट साइड से पढ़ने वाले बच्‍चे को गधा ही समझा जाता है। ये मानसि‍कता कब और कैसे बनीं, पता नहीं पर असलि‍यत यही है। लड़की, आर्ट साइड से पढ़ाई कर रही है, तो मां को ये लगता है कि उसकी पढ़ाई बहुत आसान है, इसलि‍ए घर की आधी जि‍म्‍मेदारी उसके सुपुर्द कर दी जानी चाहि‍ए।

लड़का आर्ट साइड की पढ़ाई कर रहा है, तब तो समझो ज़ि‍न्‍दगी खराब। पि‍ताजी लोगों की नज़रे दोस्‍तों के आगे कुछ ऐसे झुक जाती हैं, मानों बेटे ने कोई जुर्म कर दि‍या हो । ख़ैर यूपी बोर्ड से पढ़ाई करने वाले जानते होंगे कि वहां नौंवी कक्षा में ही होम साइंस और मैथ में से एक वि‍षय चुनना पड़ता है।

उसने नौंवी में होम साइंस तो ले ली थी पर अपनी इस करनी से वो खुद ही शर्मिंदा थी। मानों, कोई ऐसा वि‍षय ले लि‍या है जो उसकी इज्‍ज़त पर दाग लगा जाएगा। होमसाइंस, इतना कमाल का वि‍षय है, इतनी संभावनाओं का वि‍षय है, ये मुझे भी दि‍ल्‍ली आकर ही पता चला। एक बात ज़रूर कहूंगी कि जि‍न मां-बाप को अभी भी ये लगता है कि वि‍ज्ञान और गणि‍त से पढ़ाई करने वाले बच्‍चे ही ज़ि‍न्‍दगी में कुछ करते हैं, उन्‍हें एकबार दि‍ल्‍ली ज़रूर आना चाहि‍ए।  (संभव है हर यूनि‍वर्सि‍टी में आर्ट सब्‍जेक्‍ट को इतनी ही तवज्‍जो मि‍लती हो, दि‍ल्‍ली वि‍श्‍ववि‍द्यालय का अनुभव है, इसलि‍ए ऐसा कह रही हूं।)

ख़ैर उसने होमसाइंस तो ले लि‍या था पर जब भी होमसाइंस की तीसरी घंटी बजती, उसके पैर जड़ हो जाते। अच्‍छा ये भेद-भाव क्‍लास में भी था। मैथ के बच्‍चे कभी भी मैथ पढ़ने के लि‍ए दूसरी क्‍लास में नहीं जाते, केवल होमसाइंस की लड़कि‍यां ही कॉमन रूम में जातीं। होमसाइंस का वि‍कल्‍प बोर्ड की ओर से है,पर कोई लड़का उस बैच में होमसाइंस का नहीं था। न जाने क्‍यों...अगर होता तो...तो बेचारा नामर्द घोषि‍त कर दि‍या जाता।

लौटती हूं...जब भी होमसाइंस की क्‍लास का घंटा बजता, उसका दि‍ल खुद को कोसने लगता। पर कुछ मजबूरि‍यां थी...जो वो चाहकर भी मैथ नहीं ले पाई...ये उसकी सोच थी, उसकी परेशानी थी जो वो ये मान चुकी थी कि‍ मैथ ले लेगी तो उसकी बाकी चीजें और उससे जुड़े बाकी लोग परेशान हो जाएंगे।

उसने होमसाइंस तो ले ली थी लेकि‍न बहन जी जैसी लड़कि‍यों में खुद को नहीं देखती थी। उसे हमेशा इस बात का डर रहता था कि‍ कहीं करेई उसे बहन जी जैसी लड़की न समझ ले। टीवी में अक्‍सर ये दि‍खाता है कि बहन जी जैसी लड़कि‍यां सलवार-सूट या पूरे तन ढके कपड़े पहनतीं हैं। मॉडर्न लड़कि‍यां तो जि‍तने छोटे हो सके उतने छोटे कपड़े पहनती हैं। लि‍हाज़ा खुद को मॉडर्न बनाने और दि‍खाने के लि‍ए उसने अपनी यूनि‍फॉर्म ही छोटी कर दी। स्‍कर्ट को पि‍न और स्‍टेपलर से मोड़ दि‍या। स्‍कर्ट घुटने तक पहुंच गई, अगले दि‍न स्‍कूल में कि‍सी ने उस पर ग़ौर नहीं कि‍या, सो उसने खुद ही अपनी क्‍लासमेट अल्‍पना को पूछ लि‍या, यार मेरी स्‍कर्ट कैसी लग रही है। उसने कहा, छोटी हो गई है पर सेक्‍सी लग रही है। सेक्‍सी वर्ड उपमा अलंकार का हि‍स्‍सा कब बना मुझे नहीं पता, पर आजकल लड़के-लड़कि‍यां खुद को इसी शब्‍द से वि‍भूषि‍त होर गौरवांवि‍त महसूस करते हैं।

अगले दि‍न उसके दि‍माग में स्‍कर्ट को और छोटा करने का ख्‍याल आया,,ताकि‍ अल्‍पना उसे सुपर सेक्‍सी कहे। उसने उतना ही मोटा एक और फोल्‍ड कि‍या और पि‍नें-स्‍टेपलर पि‍नें लगा दीं।  स्‍कर्ट छोटी हो गई। स्‍कूल जाने के लि‍ए बढ़ी ही थी कि‍ पापा ने टोक दि‍या, अरे तुम्‍हारी स्‍कर्ट तो छोटी हो गई है, नई सि‍लवा लो। उसने तुरंत कहा, नहीं...स्‍कूल में इतनी ही स्‍कर्ट पहनने को बोला गया है। इतना कहकर उसने लपककर बस पकड़ ली।

उसे भी कहां पता था कि उसके पि‍ता जी इस बात की पड़ताल करने स्‍कूल पहुंच जाएंगे...लंच से पहले का पीरि‍यड था। पानी पि‍लाने वाली आंटी क्‍लास में आईं और बोलीं, तुम्‍हें प्रिंसीपल मैडम बुला रही हैं... उसे लगा कुछ ऐसी ही बात होगी। कमरे में पहुंची तो पता चला पापा आए हुए हैं...मैडम ने तुरंत पूछा, तुम्‍हें कि‍सने छोटी स्‍कर्ट पहनकर आने को कहा...उसने सच कहा, कि‍सी ने नहीं..। मैडम का दूसरा सवाल, फि‍र पापा से झूठ क्‍यों कहा...खामोशी झूठ को बताने का सबसे अच्‍छा तरीका है। तीसरी बार में मैडम ने सवाल नहीं पूछा, पास बुलाया स्‍कर्ट नीचे से पकड़ी और एक-एक करके सारी पि‍नें नि‍कालकर मेज पर रख दीं...पापा ने बस इतना पूछा, ये क्‍या है...वो खामोश थी, गर्दन नीचे थी पर पापा शायद सब समझ गए थे...क्‍योंकि उस बेटी की मूक ज़बान वो ही पढ़ सकते थे...और आज भी वो मूक ज़बान उन्‍हीं के लि‍ए खुलती है।

8 comments:

shweta said...

nice story , but its doubtful if her father would have understood her actual intentions to keep her skirt short.

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (14-05-2014) को "आया वापस घूमकर, देशाटन का दौर" (चर्चा मंच-1612) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कालीपद प्रसाद said...

पहले लड़कियां खुबसूरत दिखना चाहती थी अब सेक्सी दिखना चाहती है ,सोच में परिवर्थान है १
बेटी बन गई बहू

सुशील कुमार जोशी said...

कहाँनी कहाँ है इसमें जबकि यही सच है । बहुत सुंदर ।

आशा जोगळेकर said...

एक उम्रविशेष का आविर्भाव है यह। सुंदर प्रस्तुति विषय कोई भी हो महत्व इसे है कि आप उसमें कितने अच्छे हैं।

Tushar Raj Rastogi said...

आपकी इस रचना को आज दिनांक २२ मई, २०१४ को ब्लॉग बुलेटिन - पतझड़ पर स्थान दिया गया है | बधाई |

Kaushal Lal said...

सोच की परते ऐसे ही छोटी होती जा रही है ....बहुत सुन्दर

Anonymous said...

माफ करें आपको ज्यादातर समर्थन में ही कमेंट मिलते होंगे। पर हकीकत यह है कि आप इस कहानी में अपने कन्सर्न को लेकर ही कन्फ्यूज हैं। स्कर्ट छोटी होती जा रही है तो सोच की परतें भी छोटी हो रही हैं? ऐसा अटपटे पिता जो स्कर्ट की लंबाई की पड़ताल करने स्कूल जा पहुंचे हमारी सोसाइटी में तो होंगे पर कहानी के पात्र भी बन जाएं इस लायक नहीं लगते। क्या लड़की गलत है? नहीं- फिर वो कौन सी चीज है उसे ऐसा करने को मजबूर कर रही है। हमारे समाज में दबाव।

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