Sunday, January 22, 2012

हफ्तेभर की भागदौड़ के बाद एक मस्तीभरी शाम...

नोएडा में रहते करीब दो हफ्ते से ज्यादा हो गए हैं..पहले-पहल तो बिल्कुल भी मन नहीं लगता है लेकिन कहते हैं न धीरे-धीरे आदत हो जाती है....तो अब आदत हो गई है। कहीं नहीं भी जाना हो तो भी सुबह ६ बजे उठ जाती हूं  क्योकि बुआ की दो छोटी-छोटी बेटियां स्कूल जाने के लिए तैयार होने लगती हैं....किसी की टाई गुम रहती है तो किसी की चोटी करनी होती है..किसी को लंच में पास्ता चाहिए होता है तो किसी को पूरी..और इन सबके बीच बुआ जी घिरनी की तरह घूमती नज़र आती हैं..हालांकि कोई उठाता नहीं है फिर भी नींद खुद ही खुल जाती है..एक तरह से अच्छा ही है कम से कम सूर्योदय देखने का मौका मिल जाता है वर्ना तो अपन १०-११ बजे वाले बंदे हैं...पता ही नहीं चलता था कि कब दिन हुआ और कब शाम ढ़ली..।
 इधर बीच घर से बाहर निकलना बहुत कम ही हुआ...                                                                               एहसास हुआ कि घर में रहना किसी सज़ा से कम नहीं और वो भी तब जब घर में आपके पास कोई काम न हों...बुआ की अपनी सखी-सहेलियां हैं...जिनके पास सास-ससुर से लेकर ननद-भौजाई तक का हर मटीरियल होता है ..सो उन्हें कोफ्त नहीं होती और जिम्मे हजार काम भी तो हैं..पर सच में जब तक कॉलेज नहीं खुले थे एक-एक दिन बरस समान काटा है..।
अब कॉलेज भी खुल गए हैं और नौकरी की तलाश भी शुरू हो गई है..सो पिछले ४-५ दिन से बहुत व्यस्त रही। छोटी बहने बहुत छोटी हैं..एक १२ साल और दूसरी १८ साल..छोटी। लेकिन मेरे नोएडा आ जाने से शायद वही सबसे ज्यादा खुश भी हैं...। आज संडे की छुट्टी थी उनकी भी और मेरी भी..सो सुबह से ही...देशराग की तरह राग शुरू हो गया कि स्टेडियम जाएंगे और वो भी दीदी के साथ...। 
नोएडा स्टेडियम में विंटर फिएस्टा लगा हुआ था..जिसका आज अंतिम दिन था..कुछ खरीदना तो था नहीं सो हाथ घुमाते तीनों पहुंच गए...कुल मिलाकर अच्छा लगा वहां जाकर। 
कई चीजें देखकर गाजीपुर के लंका मैदान में लगने वाले दशहरा मेले की यादें ताजा हो गई...वहीं की कुछ यादें यहां बांट रही हूं...

स्टेडियम के गेट से ही शुरूआत करते हैं..अभी पहुंचे ही थे कि ये पेटीज़ उर्फ पेंटिज भाई साहब की चलती-फिरती दुकान मिल गई...गर्मा-गर्मा पेंटिज पढ़कर हंसते-हंसते पेट में बल पड़ गया...बस एक बिंदु से वेज अर्थ बदल गया...लेकिन शुरूआत अच्छी रही....

पिक्चरों में ये खूब दिखाया जाता है कि कैसे हीरो शूटिंग के दौरान आई लव यीू लिख देता है  या फिर हीरोइन का नाम...खैर हमने दूर से ही सलाम ठोंका..क्योंकि एक तो चश्मा साथ नहीं था और दूसरे बच्चों के सामने इमेज बिगड़ने का डर भी था... बचपन में पैसे का लालच या फिर ईनाम जीतने का इतना मेह रहता था कि बाबूजी से कहकर निशाना जरूर लगाते थे...और अगर गलती से एक भी सही बैठ गया तो खुद को धर्नुधर अर्जुन मान बैठते थे...
मेले में बोनसाई के पौधों की भरमार थी और इन्हें देखकर नयनसुख लेने वालों की भी..हम भी  कतार में थे..एक-दो पौधों के दाम भी  पूछे ..पर महंगाई इतनी हावी है कि उल्टे पैर लौट आए। सबसे सस्ते वाले पौधे की कीमत ३५० थी और हम तो लेकर ही २०० गए थे..दुकान के मालिक ने बड़े प्यार से मुझे दिल के आकार का बैंबू ट्री दिखाया कि इसे ले जाइए इससे घर में प्यार बढ़ेगा..पर......मजबूरी थी..नहीं ला सके।

ये स्टाल सबसे ज्यादा पसंद आया...हैंडीक्राफ्ट का सामान मिल रहा था...स्टाल के मालिक अंजित ने  बताया कि  ये सारा सामान  तिहाड़ के कैदियों ने बनाया है...आर्ट ऑफ लीविंग के सपोर्ट से श्रृजन नामक की संस्था है जो ये सबकुछ देखती-भालती है..। स्टाल का सारा सामान हैंडमेड पेपर का बना हुआ था..जिस पर की गई मेहनत साफ नजर आ रही थी...। उसने बताया कि यहां की बिक्री से जो कुछ पैसा मिलता है उसे एनजीओ उन कैदियों के घरवालों को दे देती है..। अच्छी पहल लगी...।लेकिन अंजित पर आर्ट ऑफ लीविंग के प्रवचनों का पूरा प्रभाव नज़र आ रहा था..वो बेहद दार्शनिक बातें कर रहा था..जैसे कि मैडम गलती किससे नहीं होती,कुछ पकड़े जाते हैं कुछ नहीं..जो पकड़े गए उन्हें भी बहुत पछतावा ह..समाज के लिए..परिवार के लिए..। पर अब उनकी कोई सुनता नहीं..उनके घरवालों को कोई देखता नहीं..हम कोशिश करते हैं कि कुछ मदद कर सकें...आप लोग भी कीजिए..क्योंकि सबके करने से ही बदलाव हो पाएगा...।

ये हैं अपने राजस्थान के मस्त कालबेलिये...थोड़ा सा करतब हमलोगों ने बी दिखाया...एक -दो ठुमके मारते हुए आगे बढ़े...
भारत में भी अजूबों की कमी नहीं है...ये भी किसी अजूबे से कम नहीं था..एक चावल जितना  तो आमतौर पर एक  अक्षर होता है और महाशय चावल पर शब्द उकेर रहे थे..वाकई अद्भुत कला...वीडियो शूट किया था पर टेक्निकल एरर की वजह से डीलिट हो गया....

एक नमूना...


और ये हूं मै..हमेशा से ऊंचाई से डर लगता रहा है..आज उस डर को हराने के लिए गोल-घूमने वाले झूले पर बैठी...बहुत हिम्मत करके। आंख भले बंद की लेकिन हमेशा की तरह बीच मे ही झूला रूकवाकर उतरी नही..पूरा पैसा वसूल किया....मज़ा आया....।

दिन अच्छा बीता...क्योंकि बहनें खुश हुई घूमकर और मैं बहुत सी बातें जानकर-समझकर.....और कहते हैं न,जिस दिन कुछ नया सीखने को मिल जाए..समझिए खास है







9 comments:

P.N. Subramanian said...

मेले का सैरनामा रोचक लगा.

Atul Shrivastava said...

बढिया और मजेदार।
घर बैठे बैठे सैर सपाटा हो गया हमारा भी।

Devendra Dutta Mishra said...

बहुत सुंदर व भावात्मक प्रस्तुति। कामना है आपका हर रविवार इसी तरह नवीन व सुखद बीते व हमसे इसी तरह सुंदर लेख व स्मरण साझा करती रहें।

Rahul Singh said...

दिन अच्‍छा बीतने का अंश पोस्‍ट में समाया है पूरी तरह.

Atul Shrivastava said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट्स पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

चंदन कुमार मिश्र said...

चावल के दाने से याद आया कि एक बार हम भी गिनीज बुक के लिए 2 सेंटीमीटर × 2 सेंटीमीटर के कागज पर 200 बार से ज्यादा राम लिख गये और वह आज भी है!

रेखा said...

सही कहा आपने ...हर दिन कुछ -न -कुछ नया सीखने को मिल जाय तो अच्छा है .

रचना दीक्षित said...

सैर बढ़िया रही यह चित्रों से भी झलक रहा है. सुंदर संस्मरण.

संजय भास्कर said...

भावात्मक प्रस्तुति
मार्गदर्शन कराती हुई

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