Sunday, February 09, 2014

ये कहानी है, पेड़ पर टंगी जि‍न्‍दा लाशों की...

बीता कुछ समय बहुत सारे काम के बीत बीता। इतना व्‍यस्‍त कि कभी-कभी लगा दि‍न 24 घंटे का क्‍यों होता है, उसे 30 या कुछ अधि‍क घंटों का होना चाहि‍ए। फि‍र कि‍सी ने कहा, इसलि‍ए मैनेजमेंट की पढ़ाई की जाती है और मैनजमेंट के साथ चलने की सलाह दी जाती है।

बहुत बार ब्‍लॉग पर कुछ नया प्रकाशि‍त करने का मन कि‍या लेकि‍न संभव नहीं हो सका। पर अब लगता है कि हर चीज का समय बंध गया है। उसी समय में से समय चुराना होगा...और अपने इस शौक को जि‍न्‍दा रखना होगा।

पर इस बात का एहसास हो गया कि जरूरतों की पूर्ति के चक्‍कर में हम अपने शौक भूल जाते हैं या फि‍र उन्‍हें उपेक्षि‍त कर देते हैं। पर कोशि‍श करूंगी अपने साथ ये अन्‍याय न करूं। ये हमारे प्रति‍स्‍पर्धी समाज की कड़वी सच्‍चाई है जहां पेट के चक्‍कर में मन मर जाता है।

इस समाज का एक क्रूर, स्‍याह चेहरा बीते दि‍नों मेरे सामने आया। सोनागाछी, संभव है ये नाम हर कोई जानता होगा। मैंने भी सुन रखा था लेकि‍न एक रि‍पोर्ट पढ़ने को मि‍ली, उसी के कुछ अंश यहां साझा कर रही हूं। 
ये कहानी है एक ऐसे सोने के पेड़ यानि सोनागाछी की, जि‍स पर न जाने कि‍तनी औरतें, लड़कि‍यां जि‍न्‍दा लाश बनकर टंगी हुई हैं। ये कहानी है पेड़ पर टंगी इन जि‍न्‍दा लाशों को नोचने वाले चील-कौओं की, जि‍न्‍हें हम दुनि‍या का सबसे प्रखर प्राणी मानते हैं।


हमारे देश में देह-व्यापार को ले‌कर कई कानून हैं लेकिन देश के कई हिस्सों में ये आज भी लाखों लड़कियों का भाग्य है। देश के कई हिस्सों में आज भी लड़कियां देह-व्यापार के अभिशाप को भुगतने के लिए मजबूर हैं। उन्हीं इलाकों में से एक है कोलकाता का सोनागाछी। जहां बच्ची के पैदा होते ही उसकी किस्मत का फैसला हो जाता है कि उसे आगे चलकर क्या काम करना है।

सोनागाछी स्लम भारत ही नहीं, एशिया का सबसे बड़ा रेड-लाइट एरिया है। इस स्लम में 18 साल से कम उम्र की करीब 12 हजार लड़कियां सेक्स व्यापार में शामिल हैं। उन्‍हें बचपन से ही वो सब देखना पड़ता है, जि‍सके बारे में हम और आप सोचना भी पसंद नहीं करेंगे। 

इसे बदनसीबी कहना गलत होगा, क्योंकि ये बदनसीबी से भी बुरा है। जिस उम्र में हमारी मां हमें दुनिया की रीति-रिवाज, लाज-शरम सिखाती हैं वहीं यहां कि बच्चियां खुद को बेचना सीखती हैं। 

12 से 17 साल की उम्र में ये लड़कियां मर्दों के साथ सोना सीख जाती हैं। उन्हें खुश करना सीख जाती हैं, जिसके बदले उन्हें 124 रुपए मिलते हैं। इन रूपयों के बदले यहां की औरतें तश्तरी का खाना बनकर मर्दों की टेबल पर बिछ जाती हैं।

आप सोच रहे होंगे कि इसमें नया क्‍या है, पर सवाल तो यही है जो बुराई, कुरीति सदि‍यों से चली आ रही है वो आज भी बनी हुई है। उसमें कोई नयापन नहीं आया है, न तो हमारी सोच में और न ही समाज के नि‍यमों में, जहां आज भी दो पैसे कमाने के लि‍ए एक औरत को अपनासबकुछ गंवाना पड़ता है।  

3 comments:

arvind mishra said...

फिर भी हम सभ्य और सुसंस्कृत होने का दावा करते आये हैं :-(


खुद अपने साथ ही नहीं पाठकों के साथ भी अन्याय न हो यह
एक संवेदनशील रचनाकार को नहीं भूलना चाहिए !

ब्लॉग बुलेटिन said...


ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन अलविदा मारुति - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

मैं फेसबुक छोड़कर (पता नहीं सही या ग़लत) ब्लॉग को समय देने के लिए मुड़ा. लोगों की उदासीनता बनी हुई है. लेकिन मेरा मानना है कि हम सिइरियस बातें यहीं कर सकते हैं. कृपया इसे सक्रिय रखिए, मेरा अनुरोध है!
बहुत साल कोलकाता में रहा... इस अंचल को देखने का साहस नहीं हुआ (एक सम्भ्रांत व्यक्ति का वहाँ पाया जाना कितना बड़ा कलंक होता है).. तब ब्लॉग नहीं था, वर्ना ज़रूर जाता. हाँ काली घाट में देखा है यह नज़ारा.
कहते हैं आदि काल से चलता आ रहा है यह व्यवसाय! लेकिन कब अंत होगा इसका?? एक परिचर्चा का विषय है!
इस विषय को चुननए के लिए आभार!!

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