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Wednesday, March 18, 2015

हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी : 3

आंटी  के पास चार झोले थे... एक उनका चमड़े वाला पर्स, दूसरा लंच-बाॅक्स का बैग, तीसरे में पानी और फल जैसा कुछ रहा होगा पर चौथा झोला बहुत चमकीला था. सुंदर भी. उसका टंगना लेस का था और और चमकीले गोटे से उस पर काम किया हुआ था.

आंटी ने मेट्रो में घुसने के साथ ही लेडीज़ सीट पर अटैक किया और उस पर बैठे लड़के को खड़ा कर दिया. इतने पर भी उन्हें अच्छा नहीं लगा तो उन्होंने कहा क्या तुम इधर हो जाओगी, थोड़ा शीशे से टेक ले लूंगी.

टेक लगाने के साथ ही उनके उस चमकीले झोले से एक रंग-बिरंगी किताब निकली. पाॅकेट-बुक. पाॅकेट बुक दरअसल हनुमान चालीसा थी. पर उसके हर पन्ने पर भावानुकूल चित्र था और सबसे नीचे उसका मतलब लिखा हुआ था. आंटी ने बहुत तल्लीनता के साथ हुनमान चालीसा पढ़नी शुरू की. पूरा ख़त्म करने में उन्हें 10 मिनट के आस-पास लगे होंगे. उसके बाद उन्होंने उसी झोले से शिव चालीसा निकाली और उसे पढ़ना शुरू कर दिया.
सामने ही खड़ा लड़का "बदला मिज़ाज मेरा फूंकते ही..."वाला गाना सुन रहा था. ईयरफोप फट चुका था, या फिर इतना तेज था कि आवाज़ हमें भी आ रही थी. लेकिन आंटी ध्यानमग्न बनी रहीं...

इस तरह से आज का सफ़र हनुमान जी और शिव शंकर के साथ करने का सौभाग्य मिला. इसका एक पहलू ये भी है कि हम इतने व्यस्त हो गए हैं कि भगवान का ध्यान भी करने में टाइम वेस्ट मानते हैं. ये सोचकर किताबें झोले में भर लेते हैं कि मेट्रो में बैठे-बैठे हनुमान चालीसा निपटा ली जाएगी, वैसे भी रास्ता करीब 15 से मिनट का है....

Tuesday, March 17, 2015

#हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमीः 2

उसके चेहरे के बदलते हाव-भाव देख रही थी. उसके हाथें में सोनी-एक्सपीरिया था. बड़ा वाला. कान में हेडफोन, लाल तारों वाला और एक बैक-बैग. जिसे उसने अपने पैरों के बीच में खड़ा कर रखा था. 

मेट्रो में कौन सवार हो रहा है, कौन उतर रहा है, कितनी भीड़ है, कौन छींक रहा है, कौन खांस रहा है...उसे कुछ भी मालूम नहीं चल रहा था. वो अपने में मस्त था. पर उसके चेहरे के हाव-भाव और हाथों की तेज़ी लगातार...पल-पल बदल रही थी.

सब-वे सर्फर खेल रहा था. सोने के सिक्के तो कुछ यूं बटोर रहा था जैसे वो असली हों. सोने के सिक्के छूट जाते तो पछतावा झलक जाता...मिल जाते तो...

आउट होने पर बड़ा दुखी हुआ, जैसे अलीबाबा ने जो खज़ाने का दरवाज़ा खोला था, वो उसके देखते-देखते बंद हो गया. 

एक और बात हुई....होती रोज़ होगी मैंने आज देखी.

मेट्रो में लोग दूसरे के पेपर को पढ़ने में खासा रूचि दिखाते हैं...और अचानक से अगर पन्ना बदल जाता है तो नाराज़गी भी दिखाते हैं....कि मैं तो अभी उसी आर्टिकल पर था, पलट क्यों दिया. जैसे पेपर उन्हीं का हो.
वैसे मेट्रो काॅर्पोरेशन चाहे तो किसी समाचार पत्र से कुछ ऐसा अनुबंध कर सकती है...कि मेट्रो में खबरों के डिस्प्ले की कुछ व्यवस्था हो जाए...

Monday, March 16, 2015

#हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी : 1

घर से निकलती अकेली हूं, पर सड़क पर कदम रखते ही न जाने कितनों का साथ मिल जाता है. आॅटो में बैठने से लेकर, मेट्रो और फिर आॅफिस....कहीं भी अकेलापन नहीं रहता. तमाम तरह के लोग आस-पास मौजूद होते हैं...कोई फोन पर बाॅस को अपनी ग़लत लोकेशन बता रहा होता है, कोई रिश्तेदारों को फोन करके आज का 'काम' पूरा कर रहा होता है तो कोई कुछ....

पर चारों ओर से घिरे होने के बावजूद हर रोज़ कोई एक ही कहानी आपके साथ जुड़ती है. ख़ासकर मेट्रो में. कोई एक ही शख़्स या समूह होता है, जिसे आप पूरे रास्ते फाॅलो करते हैं. आज एक ऐसा ही परिवार मिल गया.
औरत सीट पर बैठी हुई थी. गोद में 6 महीने का एक बच्चा था और उससे लिपटकर ही दूसरा, दो साल का लड़का खिड़की से बाहर देखने में व्यस्त था. गोद वाले बच्चे को वाकई काजल की कोठरी से निकालकर लाया गया था. उसके माथे पर लगा नज़र का टीका पूरे चेहरे पर, उसके नाक से बहते तरल के साथ मिलकर क्रीम बन चुका था. बड़ा बच्चा बार-बार अपनी मां के कान पर पीं-पीं बोलता और मां चिल्लाती. एकबार उसने थोड़ा ज़ोर से ही चिल्ला दिया. बच्चा रोया नहीं, पर नाटक करके, नीचे वाले होंठों को सिकोड़कर जताने लगा की उसे ये पसंद नहीं आया.

मां परेशान हुए जा रही थी...पिता सामने की ओर मुंह किए खड़ा था, वो बार-बार उसकी बुशर्ट खींचती की इन दो बच्चों में से किसी एक को देख लो और वो हर बार भौंहे सिकोड़कर उसे मना कर देता...
पर उसके चेहरे पर सोच की लकीरें इतनी गहरी थीं कि मानों भाग्य ने उसे जन्म से ही त्रिपुट लगाकर भेजा है...बच्चे को देखकर मुस्कुराई तो वो शरमा गया, मानो किसी ने उसकी शैतानी पकड़ ली. पर मेरी मुस्कान उसके लिए शायद कोई उपहार थी, उसने अपनी मां से कहा, देख उ दीदीया हंसत बिया...(देखो वो दीदी हंस रही है). मां ने भी एक फीकी मुस्कान मेरी ओर दी और दोबारा से अपने पति की ओर देखने लगी...

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